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अध्याय ५ - मंगलमहादशान्तर्दशाफलम्

मानसागरी - अध्याय ५ - मंगलमहादशान्तर्दशाफलम्

सृष्टीचमत्काराची कारणे समजून घेण्याची जिज्ञासा तृप्त करण्यासाठी प्राचीन भारतातील बुद्धिमान ऋषीमुनी, महर्षींनी नानाविध शास्त्रे जगाला उपलब्ध करून दिली आहेत, त्यापैकीच एक ज्योतिषशास्त्र होय.

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मंगलमहादशान्तर्दशाफलम्

शस्त्राभिघातो नृपतेश्च पीडा चौर्याग्निरोगाश्च धनस्य हानिः ।

कार्याभिघातश्च नरस्य दैन्यं भवेद्दशायां धरणीसुतस्य ॥१॥

मंगलमध्ये मंगलफलम् ।

कौज्यां शत्रुविमर्दश्च विग्रहो बन्धुभिः सह ।

रक्तपित्तकृता पीडा परस्त्रीसङ्गमो भवेत् ॥२॥

मंगलमध्ये राहुफलम् ।

शस्त्राणि चोरशत्रूणामापदा च भयं भवेत् ।

अर्थनाशं रुजा पीडा राहौ मङ्गलवर्तिनि ॥३॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2009-04-03T04:50:01.2300000

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वीरभद्र

  • n. एक शिवपार्षद, जो शिव के क्रोध से उत्पन्न हुआ था । 
  • दक्षयज्ञप्रसंगीं दक्षास मारण्याकरितां शंकरानें उत्पन्न केलेला वीर मानसपुत्र. यावरुन अत्यंत भेसूर स्वरुपाचा, दुराग्रही व नाशकारक मनुष्य. 
  • जन्म n. स्वायंभुव मन्वंतर में दक्ष प्रजापति के द्वारा किये गये यज्ञ में शिव का अपमान हुआ। इस अपमान के कारण क्रुद्ध हुए शिव ने अपने जटाओं को झटक कर, इसका निर्माण किया [भा. ४.५];[ स्कंद. १.१-३];[ शिव. रुद्र. ३२] । इसके जन्म के संबंध में विभिन्न कथाएँ पद्म एवं महाभारत में प्राप्त है । क्रुद्ध हुए शिव के मस्तक से पसीने का जो बूँद भूमि पर गिरा, उसीसे ही यह निर्माण हुआ [पद्म. सृ. २४] । यह शिव के मुँह से उत्पन्न हुआ था [म. शां. २७४. परि.१. क्र. २८. पंक्ति ७०-८०];[ वायु. ३०.१२२] । भविष्य में स्वयं शिव ही वीरभद्र बनने की कथा प्राप्त है [भवि. प्रति. ४.१०] 
  • दक्षयज्ञविध्वंस n. उत्पन्न होते ही इसने शिव से प्रार्थना की, ‘मेरे लायक कोई सेवा आप बताइये’। इस पर शिव ने इसे दक्षयज्ञ का विध्वंस करने की आज्ञा दी। इस आज्ञा के अनुसार, यह कालिका एवं अन्य रुद्रगणों को साथ ले कर दक्षयज्ञ के स्थान पर पहुँच गया, एवं इसने दक्षपक्षीय देवतागणों से घमासान युद्ध प्रारंभ किया। रुद्र के वरप्रसाद से इसने समस्त देवपक्ष के योद्धाओं को परास्त किया। तदुपरांत इसने यज्ञ में उपस्थित ऋषियों में से, भृगु ऋषि की दाढी एवं मूँछे उखाड़ दी, भग की आँखे निकाल ली, पूषन् के दॉंत तोड़ दिये। पश्र्चात् इसने दक्ष प्रजापति का सिर खङ्ग से तोड़ना चाहा। किंतु वह न टूटने पर, इसने धूँसे मार कर उसे कटवा दिया, एवं वह उसीके ही यज्ञकुंड में झोंक दिया। तत्पश्र्चात् यह कैलासपर्वत पर शिव से मिलने चला गया [भा. ४.५];[ म. शां. परि. १. क्र. २८];[ पद्म. सृ. २४];[ स्कंद. १.१.३-५];[ कालि. १७];[ शिव. रुद्र. स. ३२.३७] । भविष्य के अनुसार, दक्षयज्ञविध्वंस के समय दक्ष एवं यज्ञ मृग का रूप धारण कर भाग रहे थे । उस समय वीरभद्र ने व्याध का रूप धारण कर उनका वध किया, एवं एक ठोकर मार कर दक्ष का सिर अग्निकुंड में झोंक दिया [भवि. प्रति. ४.१०];[ लिंग. १.१६];[ वायु. ३०] । इसने अपने रोमकुपों से ‘रौम्य’ नामक गणेश्र्वर निर्माण किये थे [म. शां. परि. १.२८] 
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