कामाख्या सिद्धी - जप नियम

कामरूप कामाख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह इसी सृष्टीकर्ती त्रिपुरसुंदरी का है ।

इसके बाद ( १ ) ' ऐं ह्लीं क्ली चामुण्डायै विच्चे ' ( यह मन्त्र राज है ) या ( २ ) ' ॐ ऐं ह्लीं क्लीं कामाख्यै स्वाहा ' ( यह कामाख्या देवी का दशाक्षर मन्त्र है ) या ( ३ ) 'ॐ भूः भुवः स्वः ॐ कामाक्ष्यै चामुण्डायै विदमहे भगवत्यै धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् । ' ( यह कामाख्या देवी का गायत्री मन्त्र है ) इसका प्रतिदिन यथाशक्ति बराबर से जप करें । मन्त्र में जितने अक्षर हैं उतने लाख का मन्त्र जप एक पुरश्चरण कहलाता है । पुरश्चरणहीन मन्त्र भी निष्प्राण समझा जाता है । एक पुरश्चरण समाप्त होने पर हवनादि करना चाहिए । जप संख्या का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण किया जाता है । हवन द्रव्यों में विशेषकर घृत, खीर, तिल, बिल्व पत्र, यव मधु आदि लेकर दशांश हवन करे । तब देवी की सिद्धि प्राप्त होती है ।
तत्पश्चात् अन्य मन्त्रों की सिद्धि के लिए उपरोक्त किसी एक मन्त्र को, अथवा किसी दो या तीनों को १०८ बार जपे । यह साधक के मनोबल और इच्छा के ऊपर है और तब मन्त्र के विधि और संख्यानुसार वह मन्त्र जपे । पश्चात् संख्यानुसार जप समाप्त होने पर हवन करें । शेष नियम पहले जैसा ही है अर्थात् उपरोक्त मन्त्रों के जप के १० हवन के और १ तर्पण के हुआ और जो अन्य कामनार्थ मन्त्र जपा गया है उसकी संख्यानुसार दशांश हवन और दशांश तर्पण करे तब वह मन्त्र भी सिद्ध हो जाता है । इसमें तनिक भी संशय नहीं हैं ।

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Last Updated : July 16, 2009

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