प्रायश्चित्तव्रत - विशेष बाते

व्रतसे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है ।


पाप और पुण्य - दोनोंका स्वरुप अत्यन्त सूक्ष्म है । इनमें अज्ञानवश पाप और ज्ञानवश पुण्य स्वतः संचित होते हैं और समय पाकर बढ़ जानेसे दोनों प्रत्यक्ष देखनेमें आ जाते है । उस समय पापका बुरा और पुण्यका अच्छा फल होता ही है । उसमें भी मनुष्य स्वभावतः अच्छेकी इच्छा और बुरेसे ग्लानि करता है । इसी कारण त्रिकालदर्शी महर्षियोंने मनुष्यको पापमुक्त रखनेके लिये प्रायश्चित निश्चित किये हैं । इनके करनेसे सदभावनावाले मनुष्य तो अपने अज्ञानवश किये पापोंसे मुक्त होकर सुप्रकाशित प्रतिभासे युक्त होते ही है; किंतु असदभावनावाले मनुष्योंके ज्ञानपूर्वक किये हुए पाप भी यथोचित प्रायश्चितोंसे दुर हो जाते हैं । अङ्गिराने प्रायस ( तप ) और चित्त ( निश्चय ) को ' प्रायश्चित्त ' १ बतलाया है । हारीतके मतसे शुद्धिद्वारा संचित पापोंकें नाशका नाम ' प्रायश्चित ' २ है और वैसे किसी प्रकारसे किये गये पापसे अन्तःकरणमें ग्लानि होते ( या पछताने ) और उसके मिटानेका शास्त्रसम्मत ( या परम्परागत ) कर्म करनेका नाम भी प्रायश्चित ही है ।

पाप और पुण्यके अनेक भेद, अनेक लक्षण, अनेक कारण और अनेक नाम होनेपर भी वेदव्यासजीने इनका लक्षण दो शब्दोंमें स्पष्ट कह दिया है । उनका मत है कि दूसरेका उपकार करना ' पुण्य ' ३ और दूसरेको पीड़ित करना ' पाप ' ४ है । शास्त्रकारोंनें पाप तीन प्रकारके बतलाये हैं - ( १ ) धर्मशास्त्रोने जिस जातिके लिये जो कर्म बतलाया है, उसको न करना, ( २ ) शास्त्रोंमें जिस कर्मको बुरा बतलाया है, उसको करना और ( ३ ) इन्द्रियोंको वशमें न रखकर मनमाने कर्म ( खान - पान, पहिरान या दुर्व्यवहार ) करना - इन तीनों प्रकारके पापोंसे ही पीछे जाकर प्रकीर्णक, जातिभ्रंशकर, संकरीकरण, अपात्रीकरण, मलिनीकरण, उपपातक, अनुपातक और महापातक बन जाते हैं और इनके करनेसे मनुष्य निजपदसे गिर जाता है । अतः शास्त्रकारोंनें जिस कर्मका निषेध किया है, उसका त्याग और जिसको ग्राह्य बतलाया है, उसका ग्रहण करना मनुष्यमात्रके लिये श्रेयस्कर है । कदाचित् कुसङ्गवश कोई पाप बन जाय तो उसकी निवृत्तिके निमित्त यथोचित प्रायश्चित्त करना आवश्यक है । यदि प्रायश्चित न किया जाय तो दूसरे जन्ममें दूषित योनि प्राप्त होती है या अङ्ग - भङ्ग, भगन्दर आदि दोषोंसे युक्त मनुष्ययोनि मिलती है । किस पापसे मनुष्य किस योगमें उत्पन्न होता है अथवा अङ्गोमें किस प्रकारकी विकृति होती है - ये सब विषय ' प्रायश्चित्तेन्दुशेखर ' आदिमें विस्तारसे वर्णित हैं ।

प्रायश्चित्तके अनेक भेद हैं । जैसा पाप हो, वैसा ही प्रायश्चित होता है । उसमें भी ज्ञात, अज्ञात, अवस्था - भेद और तत्काल या कालाति - क्रमण आदिके विचारानुसार यथोचित प्रयश्चित्तमें कमी - बेशी भी की जाती है । यथा - सामान्यके लिये जप या हवन, विशेषके लिये ( पूर्वाङ्गमें लिखे हुए ) एकभुक्त, नक्त, अयाचित या उपवास और ताड्न - मारण आदिके लिये कृच्छ्र या अतिकृच्छ्र नियत किये जाते हैं । इस विषयमें ' प्राजापत्य 'और ' चान्द्रायण ' का विशेष प्राधान्य है । अधिकांश पापोंके प्रायश्चित प्रायः इन्होंके ( कृच्छ्र - अतिकृच्छ्र आदि ) विभिन्न भेदोंसे सम्पन्न होते हैं । इनमें भी पापोंकी गुरुता और लघुताके अनुसार कठोरता और सरलता की जाती है । यथा -

१. प्रायो नाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते ।

तपोनिश्चयसंयुक्तं प्रायश्चित्तमिति स्मृतम् ॥ ( अङ्गिरा )

२. ' प्रयतत्वाद्वोपचितमशुभं नाशयतीति प्रायश्चित्तम् ' ॥ ( हारीत )

३. परोपकारः पुण्याय ।

४. पापाय परपीडनम् । ( वेदव्यास )

५. त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् ।

परं त्र्यहं च नाश्र्नीयात् प्राजापत्यं चरेद् द्विजः ॥ ( मनु )

६. अनृतं मद्यगन्धं च दिवामैथुमेव च ।

पुनाति वृषलान्नं च संध्या बहिरुपासिता ॥

शतजप्ता तु सावित्री महापातकनाशिनी ।

सहस्त्रजप्ता तु तथा पातकेभ्यः प्रमोचिनी ॥

दशसाहस्त्रजाप्येन सर्वकिल्बिषनाशिनी ।

लक्षं जप्ता तु सा देवी महापातकनाशिनी ॥ ( शङ्ग )

७. तिलान् ददाति यः प्रातस्तिलान् स्पृशति खादति ।

तिलस्त्रायी तिलाञ्जुह्वन् सर्वं तरति दुष्कृतम् ॥ ( यम )

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Last Updated : January 16, 2012

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