संध्योपासन-विधि

रात या दिनमें जो भी अज्ञानवश विकर्म हो जायँ, वे त्रिकाल-संध्या करनेसे नष्ट हो जाते है।


संध्योपासन द्विजमात्रके लिये बहुत ही आवश्यक कर्म है । इसके बिना पूजा आदि कार्य करनेकी योग्यता नही आती । अतः द्विजमात्रके लिये संध्या करना आवश्यक है ।

स्नानके बाद दो वस्त्र धारणकर पूर्व, ईशानकोण या उत्तरकि ओर मुँह कर आसनपर बैठ जाय । आसनकी ग्रन्थि उत्तर-दक्षिणकी ओर हो । तुलसी, रुद्राक्ष आदिकि माला धारण कर ले । दोनों अनामिकाओंमे पवित्री धारण कर ले । गायत्री मन्त्र पढ़्कर शिखा बाँधे तथा तिलक लगा ले और आचमन करे -

आचमन - 'ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः' -

इन तीन मन्त्रोंसे तीन बार आचमन करके 'ॐ ह्रषीकेशाय नमः' इस मन्त्रको बोलकर हाथ धो ले ।

पहले विनियोग पढ़ ले, तब मार्जन करे (जल छिड़के) ।

मार्जन-विनियोग- मन्त्र - 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीछन्दः ह्रदि पवित्रकरणे विनियोगः ।

इस प्रकार विनियोग पढ़कर जल छोड़े तथा निम्नलिखित मन्त्रसे मार्जन करे (शरीर एवं सामग्रीपर जल छिड़के)

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।

यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥

तदनन्तर आगे लिखा विनियोग पढ़े-

'ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतल छन्दः, कूर्मो देवता आसनपवित्रकरणे विनियोगः ।'

फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आसनपर जल छिड़के-

ॐ पृथ्वि ! त्वया धृता लोका देवि । त्वं विष्णुना धृता ।

त्वं च धार मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ॥

संध्याका संकल्प - इसके बाद हाथमें कुश और जल लेकर संध्याका संकल्प पढ़कर जल गिरा दे -

'ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य.....उपात्तदुरितक्षयपूर्वकश्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं संध्योपासनं करिष्ये ।

आचमन - इसके लिये निम्नलिखित विनियोग पढ़े-

ॐ ऋतं चेति माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषुरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्पर्शने विनियोगः । फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आचमन करे -

ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत । ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवी चान्तरिक्षमथो स्वः । (ऋग्वेद १०।१९०।१)

तदनन्तर दाये हाथमे जल लेकर बाये हाथसे ढककर 'ॐ' के साथ तीन बार गायत्रीमन्त्र पढ़कर अपनी रक्षाके लिये अपने चारों ओर जलकी धारा दे । फिर प्राणायाम करे ।

प्राणायामका विनियोग - प्राणायाम करनेके पूर्व उसका विनियोग इस प्रकार पढ़े-

'ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्दैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः ।'

ॐ सप्तव्याह्रतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवसिष्ठ-कश्यपा ऋषयो गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपङिक्तत्रिष्टुब्जगत्यश्छ्न्दांस्य-ग्निवाय्वादित्यबृहस्पतिवरुणेन्द्रविष्णवो देवता अनादिश्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः ।

ॐ तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता प्राणायामे विनियोगः ।

ॐ आपो ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतिऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः ।

(क) प्राणायामके मन्त्र - फिर आँखे बंद कर नीचे लिए मन्त्रोंका प्रत्येक प्राणायाममे तीन-तीन बार (अथवा पहले एक बारसे ही प्रारम्भ करे, धीरे-धीरे तीन-तीन बारका अभ्यास बढ़ावे) पाठ करे ।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भुर्भुवः स्वः स्वरोम् । (तै० आ० प्र० १० अ० २७)

(ख) प्राणायामकी विधि - प्राणायामके तीन भेद होते है - १. पूरक, २.कुम्भक और ३. रेचक ।

१. - अँगूठेसे नाकके दाहिने छिद्रको दबाकर बायें छिद्रसे श्वासको धीरे-धीरे खींचनेको 'पूरक प्राणायाम' कहते है । पूरक प्राणायाम करते समय उपर्युक्त मन्त्रोंका मनसे उच्चारण करते हुए नाभिदेशमें नीलकमलके दलके समान नीलवर्ण चतुर्भुज भगवान विष्णुका ध्यान करे ।

२- जब साँस खींचना रुक जाय, तब अनामिका और कनिष्ठिका अँगुलीसे नाकके बाये छिद्रको भी दबा दे । मन्त्र जपता रहे । यह 'कुम्भक प्राणायाम' हुआ । इस अवसरपर ह्रदयमें कमलपर विराजमान लाल वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माका ध्यान करे ।

३- अँगूठेको हटाकर दाहिने छिद्रसे श्वासको धीरे-धीरे छोड़नेको 'रेचक प्राणायाम' कहते है । इस समय ललाटमे श्वेतवर्ण शंकरका ध्यान करना चाहिये । मनसे मन्त्र जपता रहे । (दे० भा० ११।१६।२८-३६) ।

(ग) प्राणायामके बाद आचमन - (प्रातःकालका विनियोग और मन्त्र) प्रातःकाल नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वीपर जल छोड़ दे -

सूर्यश्च नेति नारायण ऋषिः अनुष्टुप‌छन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शेन विनियोगः ।

पश्चात नीचे लिखे मन्त्रको पढ़कर आचमन करे -

ॐ सूर्य्श्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्‌भ्यामुदरेण शिश्न अरात्रिस्तदवलुम्पतु । यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहपापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥ (तै० आ० प्र० १०, अ० २५)

मार्जन - इसके बाद मार्जनका निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बाये हाथमे जल लेकर कुशोंसे या दाहिने हाथकी तीन अँगुलियोंसे १ से ७ तक मन्त्रोंको बोलकर सिरपर जल छिड़के । ८वे मन्त्रसे पृथ्वीपर तथा ९ वेसे फिर सिरपर जल छिड़के ।

ॐ आपो हि ष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्दः आपो देवता मार्जने विनियोगः ।

१. ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः ।

२. ॐ ता न ऊर्जे दधातन ।

३. ॐ महे रणाय चक्षसे ।

४. ॐ यो वः शिवतमो रसः ।

५. ॐ तस्य भाजयतेह नः ।

६. ॐ उशतीरिव मातरः ।

७. ॐ तस्मा अरं गमम वः ।

८. ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ ।

९. ॐ आपो जनयथा च नः । (यजु० ११।५० - ५२)

मस्तकपर जल छिड़कनेके विनियोग और मन्त्र -

निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बाये हाथमे जल लेकर दाहिने हाथसे ढक ले और निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर सिरपर छिड़के ।

विनियोग - द्रुपदादिवेत्यस्य कोकिलो राजपुत्र ऋषिरनुष्टुप छन्दः आपो देवताः शिरस्सेके विनियोगः ।

मन्त्र - ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव ।

पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनश ॥

(यजु० २०।२०)

अघमर्षण और आचमनके विनियोग और मन्त्र - नीचे लिखा विनियोग पढ़कर दाहिने हाथमे जल लेकर उसे नाकसे लगाकर मन्त्र पढ़े और ध्यान करे कि 'समस्त पाप दाहिने नाकसे निकलकर हाथके जलमें आ गये है । फिर उस जलको बिना देखे बायी ओर फेंक दे ।

अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टप् छन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोगः ।

मन्त्र - ॐ ऋतञ्च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत । ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापुर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥

(ऋ० अ० ८ अ० ८ व० ४८)

पुनः निम्नलिखित विनियोग करे -

अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः ।

फिर इस मन्त्रसे आचमन करे -

ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः ।

त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् ॥

(कात्यायन, परिशिष्ट सूत्र)

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Last Updated : May 24, 2018

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