नामरूप - ॥ समास आठवा - कर्तानिरूपणनाम ॥

इस ग्रंथराज के गर्भ में अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों के अंतर्गत सर्वांगीण निरूपण समाया हुआ है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
श्रोता कहे वक्ता से । कौन कर्ता निश्चय से । सकल सृष्टि ब्रह्मांड ऐसे । किसने रचाया ॥१॥
तब बोले सभानायक । जो बोलिक एक से बढकर एक । इस कथन का कौतुक । श्रोताओं सुनें सादर ॥२॥
एक कहता कर्ता देव । कोई कहता कौन देव । अपना अपना अभिप्राव । कहते गये ॥३॥
उत्तम मध्यम कनिष्ठ । भावार्थ से बोलते स्पष्ट । अपनी अपनी उपासना श्रेष्ठ । मानते जनों में ॥४॥
ऐसा कहता एक कोई । कर्ता देव मंगलमूर्ति । कोई कहता सरस्वती । सर्व करे ॥५॥
कोई कहता कर्ता भैरव । कोई कहता खंडेराव । कोई कहता बीरदेव । कोई कहता भगवती ॥६॥
कोई कहता नरहरी । कोई कहता बनशंकरी । कोई कहता करे सर्व ही नारायण ॥७॥
कोई कहता श्रीराम कर्ता । कोई कहता श्रीकृष्ण कर्ता । कोई कहता भगवंत कर्ता । केशवराज ॥८॥
कोई कहता पांडुरंग । कोई कहता श्रीरंग । कोई कहता झोटिंग । सर्व करे ॥९॥
कोई कहता मुंज्या कर्ता । कोई कहता सूर्य कर्ता । कोई कहता अग्नि कर्ता । सब कुछ ॥१०॥
कोई कहता लक्ष्मी करे । कोई कहता मारूति करे । कोई कहता धरत्री करे । सब कुछ ॥११॥
कोई कहता तुकाई । कोई कहता यमाई । कोई कहता षटवाई । करे सब ॥१२॥
कोई कहता भार्गव कर्ता । कोई कहता वामन कर्ता । कोई कहता परमात्मा कर्ता । एक ही है ॥१३॥
कोई कहता वीरण्णा कर्ता । कोई कहता बसवण्णा कर्ता । कोई कहता रेवण्णा कर्ता । सब कुछ ॥१४॥
कोई कहता रवलिया कर्ता । कोई कहता स्वामी कार्तिक कर्ता । कोई कहता वेंकटेश कर्ता । सब कुछ ॥१५॥
कोई कहता गुरू कर्ता । कोई कहता दत्त कर्ता । कोई कहता मुख्य कर्ता । वोढ्या जगन्नाथ ॥१६॥
कोई कहता ब्रह्मा कर्ता । कोई कहता विष्णु कर्ता । कोई कहता महेश कर्ता । निश्चित ही ॥१७॥
कोई कहता पर्जन्य कर्ता । कोई कहता वायु कर्ता । कोई कहता करके अकर्ता । निर्गुण देव ॥१८॥
कोई कहता माया करे । कोई कहता जीव करे । कोई कहता सर्व करे । प्रारब्धयोग ॥१९॥
कोई कहता प्रयत्न करे । कोई कहता स्वभाव करे । कोई कहता कौन करे । कौन जाने ॥२०॥
ऐसा कर्ता का विचार । पूछने पर भरा बाजार । अब किसका उत्तर । सही मानें ॥२१॥
जिसने भी देव माना जिसे । कर्ता कहते उसे । लोगों का कोलाहल ऐसे । न होता कम ॥२२॥
अपने अपने साभिमान से । निश्चय ही किया मन से । इसे विचारपूर्वक देखें ऐसे । होता ही नहीं ॥२३॥
बहुत लोगों के बहु विचार । सारा रहने दो बाजार । परंतु इसका विचार । ऐसा है ॥२४॥
श्रोताओं होकर सावधान । निश्चय से तोड़े अनुमान । प्रत्यय को मानें प्रमाण । ज्ञाता पुरुष ॥२५॥
जो जो कर्ता ने किया । वह सब उसके बाद हुआ । कर्ता से पूर्व मिल गया । न होता कभी ॥२६॥
जो किया वह पंचभूतिक । और पंचभूतिक ब्रह्मादिक । फिर भूतांश ने किया पंचभूतिक । यह तो होये ना ॥२७॥
पंचभूतों को अलग करें । फिर कर्ता को पहचानें । पंचभूतिक सहजही वे । रहते कर्ता में ॥२८॥
पंचभूतों से अलग निर्गुण । वहां नहीं कर्तापन । निर्विकार को विकार कौन । जोड़ सके ॥२९॥
निर्गुण को कर्तव्य न रहे । सगुण इस जाल में फंसे । अब कर्तव्यता किस ओर जाये । देखो अच्छे से ॥३०॥
झूठे का कर्ता कौन । यह पूछना ही अप्रमाण । इसका यही प्रमाण । जो सहज ही हुआ ॥३१॥
एक सगुण एक निर्गुण । कहां लगायें कर्तापन । इस अर्थ का विवरण । देखो ठीक से ॥३२॥
सगुण ने सगुण किया । फिर भी वह पहले से ही है हुआ । निर्गुण को कर्तव्य जोड़ दिया । नहीं कहा जा सकता ऐसे ॥३३॥
यहां कर्ता ही दिखे ना । प्रत्यय में लायें अनुमान । दृश्य सत्यत्त्व में रहे ना । इस कारण ॥३४॥
किया वह सारा झूठा । फिर कर्ता यह बोलना ही हुआ फीका । वक्ता कहे रे विवेक द्वारा । देखो अच्छे से ॥३५॥
सही देखें तो प्रत्यय आये । फिर क्यों शोर मचाये । प्रचित जो स्वयं को आये । अंतर्याम में ॥३६॥
अस्तु अब रहने दो कहना ये । विवेकी ही यह जाने । पूर्वपक्ष उड़ाना पड़ता है । अन्यथा यह अनिर्वाच्य ॥३७॥
तब श्रोता करे प्रश्न । देह में सुखदुःखभोक्ता कौन । आगे यही निरूपण । है कहा ॥३८॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे कर्तानिरूपणनाम समास आठवां ॥८॥

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Last Updated : December 08, 2023

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