गुणरूपनाम - ॥ समास दसवां - स्थितिनिरूपणनाम ॥

श्रीसमर्थ ने इस सम्पूर्ण ग्रंथ की रचना एवं शैली मुख्यत: श्रवण के ठोस नींव पर की है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
मंदिर में जगन्नायक । और मंदिर पर बैठा काग । परंतु उसे देव से अधिक । ना कहें कि ॥१॥
सभा बैठी राजद्वार पर । और मर्कट चढा स्तंभ पर । परंतु उसे सभा से श्रेष्ठ चतुर । कैसे मानें ॥२॥
ब्राह्मण स्नान कर गये । और बक वैसे ही बैठे रहे । मगर उन्हें ब्राह्मणों से अच्छे । कैसे मानें ॥३॥
ब्राह्मणों में कोई नेमस्त । कोई हुये अस्त-व्यस्त । और श्वान सदा ध्यानस्थ । तो भी वो उत्तम नहीं कि ॥४॥
ब्राह्मण लक्ष्यमुद्रा न जाने । मार्जर लक्ष्य के प्रति सयाने । मगर उसे विशेष ब्राह्मण से । कौन कहेगा ॥५॥
ब्राह्मण देखे भेदाभेद । मक्षिका के लिये सभी अभेद । मगर उसे हुआ ज्ञानबोध । यह तो होता नहीं ॥६॥
नीच कीमती वस्त्र पहने । और समर्थ वस्त्रहीन बैठे । परंतु परखा है उसे । परीक्षावंतो ने ॥७॥
बाह्याकार किया अधिक । परंतु वह सारा लौकिक । यहां चाहिये मुख्य एक । अंतर्निष्ठा ॥८॥
लौकिक अच्छा कमाया । परंतु भीतर नहीं सावध हुआ । मुख्य देव को चूक गया । वह आत्मघातकी ॥९॥
देव को भजने पर देवलोक । पितरों को भजने पर पितृलोक । भूतों को भजने पर भूतलोक । प्राप्त होता ॥१०॥
जो जिसका भजन करे । वह उस लोक में जाये । निर्गुण का भजन करने पर होये । निर्गुण स्वयं ॥११॥
निर्गुण का कैसा भजन । निर्गुण में रहें अनन्य । अनन्य होते ही होंगे धन्य । निश्चय से ॥१२॥
सकल करने का सार्थक । देव पहचानें एक । स्वयं कौन यह विवेक । देखना चाहिये ॥१३॥
देव देखने पर निराकार । अपना तो मायिक विचार । सोहं आत्मा यह निर्धार । दृढ होकर रह गया ॥१४॥
अब अनुमान कुछ भी नहीं । वस्तु है वस्तु के ठाई । देहभाव न रहा कुछ भी । खोजने पर ॥१५॥
सिद्ध के लिये और साधन । यह तो सारा ही अनुमान । मुक्त के लिये और बंधन । यह तो दिखे ना ॥१६॥
जो कुछ सधे साधन से । वह तो स्वयं ही स्वभाव से । अब साधक के नाम से । शून्याकार ॥१७॥
राजपदवी पाया कुम्हार । अब गधे पाले क्यों कर । कुम्हारपन का कारोबार । चाहिये किस कारण ॥१८॥
वैसा सारा वृत्तिभाव । नाना साधनों का उपाय । साध्य होने पर कैसा ठाव । साधनों को ॥१९॥
क्या सधे साधनों से । क्या फल पाये नियमों से । स्वयं ही वस्तु गलत मार्गो से । क्यों जाये ॥२०॥
देह है पांच भूतों का । जीव है अंश ब्रह्म का । परमात्मा है परतु अनन्य का । ठांव देखो ॥२१॥
यूंही देखें तो मैंपन दिखे । खोजने जाओ तो कुछ भी ना रहे । तत्त्व से तत्त्व का निरसन होये । आगे शुद्ध आत्मा ॥२२॥
आत्मा है आत्मपन से । जीव है जीवपन से । माया है मायापन से । विस्तारित हुई ॥२३॥
ऐसा ये सारा ही है । और स्वयं भी कोई एक है । यह सकल खोजकर देखें । वही ज्ञानी ॥२४॥
सभी कुछ खोजना जाने । परतु स्वयं को देखना ना जाने । ऐसा ज्ञानी एकदेशीय रहे । वृत्तिरूप से ॥२५॥
यह वृत्तिरूप भी यदि देखा । तो कुछ भी ना रहता । प्रकृति निरसन से सारा ही जाता । विकारवंत ॥२६॥
बचा वह केवल शुद्ध निर्गुण । विवेचन किया तो वही स्वयं । ऐसी यह परमार्थ की पहचान । अगाध है ॥२७॥
फल एक स्वयं एक । ऐसा नहीं यह विवेक । फल का फल कोई एक । स्वयं ही होइये ॥२८॥
रंक था राजा हुआ । भली तरह देखो तो प्रत्यय आया । कोलाहल रकपन का । रंक ही करे ॥२९॥
वेदशास्त्र पुराण । नाना साधन निरूपण । सिद्ध साधु जिसकारण । नाना सायास करते ॥३०॥
वह ब्रह्मरूप हम ही स्वयं । सारासारा विचार प्रसंगनुरूप । करना न करना अनुचित । कुछ भी नहीं ॥३१॥
रंक राजाज्ञा से डर गया । वही आगे राजा हुआ । फिर वह भय भी उड़ गया । रंकपन के साथ ॥३२॥
वेद वेदाज्ञा से चलायें । शास्त्र शास्त्रों का अभ्यास करें । तीर्थ तीर्थ को जायें । किस प्रकार ॥३३॥
अमृत पियें अमृत । अनंत देखें अनंत । भगवंत लक्ष्य करें भगवंत । किस प्रकार ॥३४॥
संत असंत त्यागें । निर्गुण निर्गुण का भंग करें । स्वरूप स्वरूप में रंगें । किस प्रकार ॥३५॥
अंजन लगायें अंजन । धन से साधें धन । निरंजन से निरंजन । कैसे अनुभव करें ॥३६॥
साध्य करें साधन को । ध्येय धरें ध्यान को । उन्मन से संवारे मन को । किस प्रकार ॥३७॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे स्थितिनिरूपणनाम समास दसवां ॥१०॥

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Last Updated : December 04, 2023

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