स्तवणनाम - ॥ समास तीसरा शारदास्तवननाम ।

इस ग्रंथ के श्रवण से ही ‘श्रीमत’ और ‘लोकमत’ की पहचान मनुष्य को होगी.


॥ श्रीरामसमर्थः ॥
अब वंदन करुं वेदमाता । श्रीशारदा ब्रह्मसुता । शब्दमूल वाग्देवता । महामाया ॥१॥
जो उपजे शब्दांकुर । वैखरी बोले अपार । जो शब्दों का अभ्यंतर । उकलन करे ॥२॥
जो योगियों की समाधि है । जो धीरों की कृतबुद्धि । जो विद्या अविद्या उपाधि । को तोड़े ॥३॥
जो महापुरुष की भार्या । अति संलग्न अवस्था तुर्या । जिसके कारण महत्कार्य । प्रवर्तित साधु ॥४॥
जो महतो की शांति । जो ईश्वर की निज शक्ति । जो ज्ञानियों की विरक्ति । नैराष्यशोभा ॥५॥
जो अनंत ब्रह्माण्ड रचती । लीला विनोद से नष्ट करती । स्वयं आदिपुरुष में छुपती । लीन होकर ॥६॥
जो प्रत्यक्ष दृष्टिगत होती । विचार करने पर भी न दिखती । जिसका पार न पाये मति । ब्रह्मादिकों की ॥७॥
जो सर्व नाटक अंतर्कला । ज्ञातृत्व स्फूर्ति निर्मला । जिससे ही स्वानंदोत्सव मेला । ज्ञानशक्ति ॥८॥
जो लावण्यस्वरुप की शोभा । जो परब्रह्मसूर्य की प्रभा । शब्द वदन से सारा । संसार नष्ट करे ॥९॥
जो मोक्षश्रिया महामंगला । जो सत्रहवीं जीवनकला । जो सत्वलीला सुशीत कला । लावण्य की खदान ॥१०॥
जो अव्यक्त पुरुष की व्यक्ति । विस्तार से बढ़ गयी इच्छाशक्ति । जो कलिकाल की नियंति । सद्गुरूकृपा ॥११॥
जो परमार्थ मार्गो का विचार । चुनकर दिखाये सारासार । भवसिंधु का पार । प्राप्त करायें शब्दबल से ॥१२॥
ऐसे बहुवेष से सजी । माया शारदा अकेली । सिद्ध के अंदर में फैली । चतुर्विधा प्रकार से ॥१३॥
तीनों वाचा में अंतर प्रकट । वही वैखरी से किया प्रकट । अतः जितने भी हुये कर्तृत्व । वह शारदा गुण से ॥१४॥
जो ब्रह्मादिकों की जननी । हरिहर जिससे ही । सृष्टि रचना लोक तीनों भी । विस्तार जिसका ॥१५॥
जो परमार्थ का मूल । अथवा जो सद्विद्या ही केवल । प्रशांत निर्मल निश्चल । स्वरूपस्थिति ॥१६॥
जो योगियों के ध्यान में । जो साधकों के चिंतन में । जो सिद्धों के अंतःकरण में । समाधिरूप में ॥१७॥
जो निर्गुण की पहचान । जो अनुभव के चिन्ह । जो व्यापकता संपूर्ण सर्व घटों में ॥१८॥
शास्त्र पुराण वेद श्रुति ये । अखंड जिसका स्तवन करते । नाना रूप में जिसको भजते । प्राणिमात्र ॥१९॥
जो वेदशास्त्रों की महिमा । जो निरूपम की उपमा । जिसको ही परमात्मा । ऐसे बोलते ॥२०॥
नाना विद्या कला सिद्धि । नाना निश्चय की बुद्धि । जो सूक्ष्म वस्तु की शुद्धि । ज्ञप्तिमात्र ॥२१॥
जो हरीभक्तों की निजभक्ति । अंतरनिष्ठों की अंतरस्थिति । जो जीवनमुक्तों की मुक्ति । सायुज्यता वह ॥२२॥
जो अनंत माया वैष्णवी । न समझ मे आये नाटक चतुराई । जो बड़ो बड़ो को भुलाते आई । ज्ञातृत्व से ॥२३॥
जो जो देखा दृष्टि ने । जो जो शब्दों से पहचाने । जो भास किया मन ने । उतने ही रूप उसके  ॥२४॥
स्तवन भजन भक्तिभाव । माया के बिना नहीं उपाय । इस वचन का अभिप्राय । अनुभवी जानते ॥२५॥
इस कारण श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर । जो ईश्र्वरों का भी ईश्र्वर । उसे मेरा नमस्कार. तदंश से ही अब ॥२६॥
इति श्रीदासबोधे गुरूशिष्यसंवादे शारदास्तवननाम समास तीसरा ॥३॥

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Last Updated : November 27, 2023

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