एकादशस्कन्धपरिछेदः - चतुर्नवतितमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


शुद्धा निष्कामधर्मेः प्रवरगुरुगिरा तत्स्वरूपं परं ते

शुद्धं देहेन्द्रियादिव्यपगतखिलव्याप्तमावेदयन्ते ।

नानात्वस्थौल्यकार्श्यादि तु गुणजवपुस्सङ्गतोऽध्यासितं ते

वह्नेर्दारुप्रभेदेष्विव महदणुतादीप्तताशान्ततादि ॥१॥

आचार्याख्याधरस्थारणिसमनुमिलच्छिष्यरूपोत्तरार -

ण्यावेधोद्भासितेन स्फुटतरपरिबोधाग्नि दह्यमाने ।

कर्मालीवासनातत्कृततनुभुवनभ्रान्तिकान्तारपूरे

दाह्याभावेन विद्याशिखिनि च विरते त्वन्मयी खल्ववस्था ॥२॥

एवं त्वत्प्राप्तितोऽन्यो न हिल खलु निखिलक्लेशहानेरुपायो

नैकान्तात्यन्तिकास्ते कृषिवदगदषाड्गुण्यषट्कर्मयोगाः ।

दुवेर्र्कल्येरकल्या अपि निगमपथास्तत्फलान्यप्यवाप्ता

मत्तास्त्वां विस्मरन्तः प्रसजित पतने यान्त्यनन्तान् विषादान् ॥३॥

त्वल्लोकादन्यलोकः क्व नु भयरहितो यत् परार्द्धद्वयान्ते

त्वद्भीतः सत्यलोकेऽपि न सुखवसतिः पद्मभूः पद्मनाभ ।

एवाम्भावे त्वधर्मार्जितबहुतमसां का कथा नारकाणां

तं मे त्वं छिन्धि बन्धं वरद कृपणबन्धो कृपापूरसिन्धो ॥४॥

याथार्थ्यात् त्वन्मयस्यैव हि मम न विभो वस्तुतो बन्धमोक्षौ

मायाविद्यातनुभ्यां तव तु विरचितौ स्वप्नबोधोपमौ तौ ।

बद्धे जीवद्विमुक्तिं गतवति च भिदा तावती तावदेको

भुङ्क्ते देहद्रुमस्थो विषयफलरसान्नापरो निर्व्यथात्मा ॥५॥

जीवन्मुक्तत्वमेवंविधमिति वचसा किं फलं दूरदूरे

तन्नामाशुद्धबुद्धेर्न च लघु मनसः शोधनं भक्तितोऽन्यत् ।

तन्मे विष्णो कृषीष्ठास्त्वयि कृतसकलप्रार्पणं भक्तिभारं

येन स्यां मङ्क्षु किंचिद्गुरुवचनमिलत्त्वत्प्रबोधस्त्वदात्मा ॥६॥

शब्दब्रह्मण्यपीह प्रयतितमनसस्त्वां न जानन्ति केचित्

कष्टं बन्ध्यश्रमास्ते चिरतरमिह गां बिभ्रते निष्प्रसूतिम् ।

यस्यां विश्र्वाभिरामाः सकलमलहरा दिव्यलीलावताराः

सच्चित्सान्द्रं च रूपं तव न निगदितं तां न वाचं भ्रियासम् ॥७॥

यो यावान् यादृशो वा त्वमिति किमपि नैवावगच्छामि

भूमन्नेवं चानन्यभावस्त्वदनुभजनमेवाद्रिये चैद्यवैरिन् ।

त्वल्लिङ्गानां त्वदङ्घ्रिप्रियजनसदसां दर्शनस्पर्शनादि -

भूर्यान्मे त्वत्प्रपूजानतिनुतिगुणकर्मानुकीर्त्यादरोऽपि ॥८॥

यद्यल्लभ्येत तत्तत्तव समुपहृतं देव दासोऽस्मि तेऽहं

त्वद्गेहोन्मार्जनाद्यं भवतु मम मुहुः कर्म निर्मायमेव ।

सूर्याग्निब्राह्मणात्मादिषु लसितचतुर्बाहुमाराधये त्वां

त्वत्प्रमार्द्रत्वरूपो मम सततमभिष्यन्दतां भक्तियोगः ॥९॥

ऐक्य ते दानहोमव्रतनियमतपस्सांख्ययोगैर्दुरापं

त्वत्सङ्गैनैव गोप्यः किल सुकृतितमाः प्रापुरानन्दसान्द्रम् ।

भक्तेष्वन्येषु भूयस्स्वपि बहु मनुषे भक्तिमेव त्वमासां

तन्मे त्वद्भक्तिमेव द्रढय हर गदान् कृष्ण वातालयेश ॥१०॥

॥ इति तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकारादिवर्णनं चतुर्नवतितमदशकं समाप्तम् ॥

निष्काम -धर्मोंके अनुष्ठानसे शुद्ध हुए भक्तजन श्रेष्ठ गुरुके उपदेशसे आपके उस शुद्ध परब्रह्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं , जो देह -इन्द्रिय आदिसे व्यतिरिक्त तथा सबमें व्याप्त है । आपके उस स्वरूपकी जो स्थूलता और कृशतारूपसे नानात्वकी प्रतीति होती है , वह तो मायामय शरीरोपाधिद्वारा उसी प्रकार कल्पित है , जैसे विभिन्न काष्ठोंमें स्थित अग्निमें अपने आधारानुकूल महत्त्व , अणुत्व , दीप्तिमत्त्व तथा शान्तत्वकी प्रीतीति होती है ॥१॥

आचार्य नामक नीचेके मन्थनकाष्ठसे जब शिष्यरूप ऊपरका मन्थनकाष्ठ सम्मिलित होता है , तब दोनोंके संघर्षसे सम्यगू ज्ञानरूप अग्नि प्रकट हो जाती है । उस ज्ञानाग्निके द्वारा जब सजातीयकर्मोत्पादक संस्कारजनित शरीरादिप्रपञ्चविषयक अज्ञानरूप वनसमूह भस्म हो जाता है , तब इन्धनाभावके कारण वह ज्ञानाग्नि स्वयं ही शान्त हो जाती है । उस समय केवल त्वन्मयी अवस्था शेष रह जाती है अर्थात् भक्त सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है ॥२॥

इस प्रकार आपकी प्राप्तिके अतिरिक्त सम्पूर्ण क्लेशोंकी निवृत्तिका कोई अन्य उपाय नहीं है । जो आरोग्य आदिके उपाय औषध , अर्थोपार्जनके उपाय षाड्गुण्य , षट्कर्म तथा वेदोक्त उपाय हैं , वे सभी कृषिकी भॉंति न तो सकल दुःखोंका निवारण ही कर सकते हैं , न दुःखोंकी पुनरावृत्तिको ही रोक सकते हैं तथा जो वैदिक मार्ग हैं , वे भी अपरिहरणीय विगुणताके कारण क्लेश -निवारणमें असमर्थ हैं । यदि किसी प्रकार किन्हींको उसके फलस्वरूप स्वर्गकी प्राप्ति हो भी गयी तो वे स्वर्ग -सुखसे उन्मत्त होकर आपको भूल जाते हैं जिससे पुण्यक्षय होनेसे पतनका प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर असंख्य विषादोंके भागी होते हैं ॥३॥

पद्मनाभ ! आपके वैकुण्ठलोकके अतिरिक्त कौन ऐसा लोक है जो भयसे रहित है ? दो परार्ध बीतनेपर जिसका अन्त हो जाता है उस सत्यलोकमें भी कलमयोनि ब्रह्मा (कालस्वरूप ) आपसे भयभीत रहनेके कारण सुखपूर्वक निवास नहीं कर पाते हैं । दिनबन्धो ! जब ब्रह्माकी यह दशा हैं , तब जिन्होंने अधर्मोंद्वारा बहुत -से क्लेशोंकी राशि इकट्ठी कर रखी है उन नारकी जनोंकी कथा क्या कही जाय ? अतः कृपाके अथाह सागर वरदानी भगवन् ! आप मेरे बन्धनको काट दीजिये अर्थात् मुझे मोक्ष प्रदान कीजिये ॥४॥

विभो ! यथार्थमें तो मैं आपका ही अभिन्न स्वरूप हूँ , अतः मेरे लिये वस्तुतः बन्ध -मोक्ष हैं ही नहीं ; तथापि आपकी माया और विद्यारूप दोनों शक्तियोंद्वारा इन (बन्ध -मोक्ष )-का निर्माण हुआ है । अतः ये दोनों स्वप्न और जाग्रत् -अवस्थाके समान हैं । इन दोनों बद्ध -मुक्त जीवोंमें विलक्षणता यह है कि संसारी (बद्ध ) जीव तथा जीवन्मुक्त अवस्थाको प्राप्त हुआ मुक्त जीव —— ये दोनों शरीररूपी वृक्षपर बैठे हैं । इनमेंसे एक तो विषयरूपी फलोंके रसको चख रहा है , परंतु दूसरा नहीं । वह अपनी ज्ञानशक्तिके प्रभावसे पीड़ाका भी अनुभव नहीं कर रहा है ॥५॥

जीवन्मुक्तत्व ऐसा प्रभावशाली है —— यों कथनमात्रसे क्या फल है ? उसकी प्राप्ति तो हो सकती नहीं ; क्योंकि अशुद्ध बुद्धिवाले पुरुषके लिये जीवन्मुक्ति बहुत दूर है । तथा मनकी शुद्धिके लिये भक्तिके सिवा कोई अन्य सरल उपाय है भी नहीं । अतः विष्णो ! जिसमें शरीर तथा तत्सम्बन्धी सभी पदार्थोंका समर्पण हो जाता है , वह अपनी अनपायिनी भक्ति मुझे प्रदान कीजिये ; जिसके प्रभावसे मैं शीघ्र ही गुरूपदेशद्वारा उत्पन्न हुए ब्रह्मज्ञानसे युक्त होकर आपके सारूप्यको

प्राप्त कर लूँ ॥६॥

इस जगत्में कुछ ऐसे लोग भी है , जो शब्दब्रह्म (साङ्गवेद )- में परिश्रम करनेपर भी परब्रह्मस्वरूप आपको नहीं जानते हैं अर्थात् आपकी उपासना नहीं करते हैं । कष्ट है कि उनका वह परिश्रम व्यर्थ ही गया । वे दीर्घकालतक भक्ति -ज्ञानरूप फलोत्पादनसे रहित जल्प -वितण्डारूप वाणीको धारण करते हैं अथवा प्रसवरहित अतएव दुग्धहीन गौका पोषण करते हैं । परंतु जिस वाणीमें सबको आनन्दित करनेवाली , समस्त पापापहारिणी अवतारसम्बन्धी दिव्य लीलाओंका वर्णन नहीं है तथा आपके सच्चिदानन्दस्वरूपका निरूपण नहीं है , उस वाणीको मैं व्यवहारमें न लाऊँ ॥७॥

भूमन् ! आप जिस स्वरूपवाले हैं , आपकी जैसी महिमा है और आप जिस धर्मवाले हैं —— यह सब मैं कुछ भी नहीं जानता । इसलिये शिशुपालके शत्रु ! मैं अनन्यभावपूर्वक आपके भजनमें ही मन लगाये हुए हूँ । अतः मुझे आपकी प्रतिमाओं तथा आपके चरणसेवी प्रियजनोंकी सभाओंके दर्शन -स्पर्श आदिका सौभाग्य प्राप्त हो और आपके समग्रोपचारयुक्त पूजन , नमस्कार , स्तवन तथा सत्त्वादि गुणोंद्वारा किये गये सृष्टि आदि कर्मोंके अनुकीर्तनमें भी मेरा मन

सादर लगा रहे ॥८॥

देव ! जो -जो वस्तु मुझे प्राप्त हो , वह सब आपके अर्पण करता रहूँ । मैं आपका दास हूँ । मेरे द्वारा बारंबार आपके मन्दिरमें झाडू लगाने आदिका कार्य निश्छलभावसे चलता रहे । मैं सूर्य , अग्नि , ब्राह्मण और आत्मा आदिमें चार भुजाओंसे सुशोभित आपकी आराधना करता रहूँ और मेरे हृदयमें आपके प्रेमसे आर्द्रस्वरूप भक्तियोग निरन्तर प्रवाहरूपसे बहता रहे ॥९॥

श्रीकृष्ण ! आपका घनीभूत आनन्दरूप सारूप्य -मोक्ष दान , हवन , व्रत , नियम , तप और सांख्ययोगद्वारा भी दुष्प्राप्य है , परंतु पुण्यशालिनी गोपिकाओंने उसे आपके सङ्गसे ही प्राप्त कर लिया । इसी कारण अन्य उद्धवादि बहुत -से भक्तोंके उपस्थित रहनेपर भी आप गोपिकाओंकी ही भक्तिको अधिक आदर देते हैं । अतः अपने चरणोंमें मेरी भक्तिको सुदृढ़ कर दीजिये । वातालयेश ! मेरे रोगोंको हर लीजिये ॥१०॥


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Last Updated : November 11, 2016

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