अध्याय ग्यारहवाँ - श्लोक ४१ से ५९

देवताओंके शिल्पी विश्वकर्माने, देवगणोंके निवासके लिए जो वास्तुशास्त्र रचा, ये वही ’ विश्वकर्मप्रकाश ’ वास्तुशास्त्र है ।


फ़िर वास्तुहोम करे और भूमि आदिकोंके निमित्त होम करे और भैरवी भैरव सिध्दिग्रह नाग और उपग्रह ॥४१॥

जो भैरवके समीपमें स्थित हैं उनका यथाविधि पूजन करके विधिसे क्षेत्रपालके मन्त्रसे होमको करे ॥४२॥

होमके अंतमें पांच बेल वा बेलके बीजोंसे कोटपालके नामसे वास्तुहोमको करे ॥४३॥

ॐकार है आदिमें जिसके ऐसे स्वामीके उस नाममंत्रसे जिसके आदिमें भूर्भुव: स्व: हों पूजा वा होमको करे, दुष्टग्रहोंके मन्त्रोंसे अष्टोत्तरशत १०८ आहुति दे. बुध्दिमान मनुष्य प्रत्येक ग्रहके नामसे तिल वा घृतसे होम करे ॥४४॥

मध्यमें एक सहस्त्र वा शत उष्ट्रिमन्त्रका जप करे और उससे अष्टोत्तरशत होमको करके बलिको दे ॥४५॥

पूर्व दिशामें पूरीकी बलि दे. दक्षिण कृशरअन्नकी, पश्चिममें पायसकी, उत्तरमें घी और पायसकी बलि दे ॥४६॥

दिक्पालोंकी बलि, फ़िर क्षेत्रपालकी बलिको, फ़िर कोटपालकी बलिको, फ़िर कोटस्वामीकी बलिको दे ॥४७॥

पूरके ऊपर पशुकी बलिको दे और द्वारके आगे महिष ( भैसे ) की बलि दे. एकसहस्त्रके प्रमाणके पहिले यमश्लोकको जपे ॥४८॥

विधिसे पूर्णाहुतिको देकर अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणको दे फ़िर ब्राम्हणोंको भोजन करावे. इस प्रकार करनेसे राजाकी सिध्दि होती है ॥४९॥

फ़िर पुरके कर्मको समाप्त करके सन्धाकालके समय नैऋतमें विधिसे बलिको दे और पूर्वोक्त मन्त्रोंको पढै ॥५०॥

मांस ओदनकी बलि दे और मन्त्रको पढ कि ( ॐ ह्रीं सर्वविघ्नान उत्सारय न न न न न न न मोहिनी स्तंभिनि मम शत्रून मोहय मोहय स्तंभय स्तंभय अस्य दुर्गस्य रक्षां कुरु २ स्वाहा ) और इस मन्त्रसे भी बलिको देकर मनुष्य कृतकृत्य होता है और दुष्ट नक्षत्रका जो स्वामी है उसके मन्त्रसे भी बलि और होम करवावे ॥५१॥

बारह अंगुलके प्रमाणकी जो खदिरवृक्षकी कील है उसका मृत्युंजय मन्त्रसे सहस्त्रवार १००० अभिमन्त्रण करके ॥५२॥

स्थिर लग्न और स्थिरलग्नके नवांशकमें, शोभनदिन और शोभनलग्नमें दुगक मध्यमें रोपण करे ( गाडदे ) ऐसा करनेसे सिध्दि हो जाती है ॥५३॥

सब कालमें कोटका स्वामी सुखका भागी होता है, उष्ट्रीमन्त्र यह है कि- ॐ उष्ट्रि विकृतदंष्ट्रानने त्रुंफ़ट स्वाहा ॥५४॥

इस उष्ट्रीमन्त्रको दशसहस्त्र जपकर घॄत मधु पुषोंसे एकसहस्त्र मन्त्रसे होम करै फ़िर मन्त्र सिध्द हो जाता है ॥५५॥

द्वात्रिंशत ३२ हैं अक्षर जिसमें ऐसे यमश्लोकको द्वात्रिंशतसहस्त्र जपै फ़िर सिध्द होता है ॥५६॥

तिसी प्रकार पूर्वविधिसे शत शत १०००० मन्त्रोंसे होम करे फ़िर सिध्द होता है और तिस २ सम्पूर्ण कर्मको करता है ॥५७॥

द्वादश हैं और जिसमें ऐसे चक्रको तीन वृत्तोंसे विभूषित लिखै. उस यन्त्रके बाह्य देशमें उष्ट्रिमन्त्रको, मध्यमें यमके श्लोकोंको लिखे ॥५८॥

दुर्गकी रक्षाके लिये वज्रार्गलविधानको करे. भजनकरनेमें यमराजनामके विधानको करे यह ब्रम्हयामलमें कहा है ॥५९॥

मृत्युंजयका मन्त्र यह है कि ॐ जू स: ॥

इति मिहिरचन्द्रकृतभषाविवृतिसहिते वास्तुशास्त्रे कोटवास्तुनाम एकदशोध्याम: ॥११॥

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Last Updated : January 20, 2012

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