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वररुचि n. एक सुविख्यात प्राकृत व्याकरणकार, जिसके द्वारा रचित ‘ प्राकृतप्रकाश ’ नामक ग्रंथ प्राकृत व्याकरण का आद्य ग्रंथ माना जाता है । यह पाणिनीय व्याकरण के सुविख्यात वार्तिककार कात्यायन वररुचि से भिन्न, एवं उससे काफी उत्तरकालीन था । विक्रम संवत् के प्रवर्तक सम्राट् विक्रमादित्य के विद्वत्सभा का यह एक सभासद, एवं उसका धर्माधिकारी था [वाररुच निरुक्त सम्मुच्चय पृ. ४२] । वार्तिककार वररुचि के समान इसका गोत्र भी कात्यायन ही था, एवं इसे श्रुतिधर नामान्तर भी प्राप्त था [सदुक्तिकरणामृत पृ. २९७] । इसने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर एक वृत्ति लिखी थी, जिसका निर्देशहस्तलेखों के सूचि में प्राप्त है ( C.C. ) । कातंत्र व्याकरण के वृत्तिकर दुर्गसिंह के अनुसार, उस व्याकरण का कृदंत नामक उत्तरार्ध इसके द्वारा विरचित था । वररुचि के द्वारा यास्क के निरुक्त पर ‘ निरुक्त समुच्चय ’ नामक टीका का निर्माण किया गया था । स्कंदस्वामिन् के द्वारा विरचित निरुक्त टीका में ‘ वाररुच निरुक्त समुच्चय ’ की पर्याप्त सहाय्यता ली गयी हैं, एवं इसके अनेकानेक उद्धरण भी लिये गयें हैं ।
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वररुचि n. वररुचि का ‘ प्राकृतप्रकाश ’ उपलब्ध प्राकृत व्याकरणों में सब से अधिक प्राचीन माना जाता है । इस ग्रंथ में बारह परिच्छेद हैं, जिनमें से पहले नौ परिच्छेदों में ‘ महाराष्ट्री ’ प्राकृत के नक्षणों का वर्णन है । दसवें परिच्छेद में ‘ पैशाची ’ , एवं ग्यारहवें परिच्छेद में ‘ मागधी ’ के लक्षण बतायें गये हैं । बारहवें परिच्छेद में ‘ शौरसेनी ’ का विवेचन प्राप्त है । इस ग्रंथ में से आखिरी तीन परिच्छेद उत्तरकालीन माने जातें हैं, जो स्वयं वररुचि के द्वारा नहीं, बल्कि भामह अथवा अन्य कोई टीकाकार के द्वारा लिखे गये होंगे । इस ग्रंथ की प्राचीनतम टीका कात्यायन द्वारा विरचित ‘ प्राकृतमंजरी ’ है, जिसका रचनाकाल लगभग ई. स. ६ वी ७ वीं शताब्दी माना जाता है । इस ग्रंथ की अन्य सुविख्यात टीकाऍं निम्न है : - भामहकृत ‘ मनोरमा ’ ; वसंतराजकृत ‘ प्राकृत संजीवनी ’ तथा सदानंद कृत ‘ सदानंदा ’ । प्राकृत व्याकरण का सर्वमान्य संस्करण कॉवेल द्वारा संपादित, एवं ई. स. १८६८ में लंदन में प्रकाशित किया गया है, जिसमें भामह की टीका के साथ अंग्रेजी अनुवाद एवं टिप्पणियां भी प्राप्त है : -
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वररुचि n. वररुचि का नाम पर निम्नलिखित ग्रंथ प्राप्त है - १. तैत्तिरीयप्रातिशाख्यव्याख्या [त्रिभाष्यरत्न. १.१८.२.१४] ; २. निरुक्तसमुच्चय; ३. लिंगविशेषविधि ( लिंगानुशासन ); ४. प्रयोगविधि; ५. कातंत्र उत्तरार्ध; ६. प्राकृतप्रकाश; ७. उपसर्गसूत्र; ८. पत्रकौमुदी; ९. विद्यासुंदर काव्य; १०. यंत्रकौमुदी ।
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वर—रुचि mfn. mfn. taking pleasure in boons (
N. of शिव), [Śivag.]
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