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पु. १ एक ऋषि . २ यजुर्वेदाची एक शाखा व त्या शाखेचे ब्राह्मण ; कण्व व काण्णव हीं उपनांवें यापासून झालीं आहेत . ( सं .)
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कण्व कांटा, आश्र्वलायन दाता आणि माध्यंदिन खोटा
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कण्व n. एक गोत्रपवर्तक तथा सूक्तद्रष्टा । घोर के कण्व तथा प्रगाथ नाम के दो पुत्र थे । बन में एक बार प्रगाथ ने कण्व की स्त्री को छेदा । इसलिये कण्व शाप देने लगा । तब प्रगाथ ने इन्हें माता एवं पिता माना । कालांतर में इसके वंशजों ने ऋग्वेद वा आठवॉं मंडल तैयार किया [बृहद्दे.६.३५-३९] । कण्व शब्द का अर्थ सुखमय होता है (नीलकंठ टीका) । यह यदुतुर्वश का पुरोहित रहा होगा क्यों कि, कण्वकुलोत्पन्न देवातिथि इंद्र से प्रार्थना करता है कि यदु तथा तुर्वश तुम्हारी कृपा से मुझे सदैव सुखी दिखाई दें [ऋ. ८.४.७] । इस पुरातन ऋषि कण्व का ऋग्वेद तथा इतरत्र बार बार उल्लेख आता है [ऋ.१.३६.८] ;[आदि. १०.११] ;[अ. वे.७.१५. १, १८. ३.१५] ;[वा. सं १७. ७४] ;[पं. ब्रा. ८.१.१, ९.२.६] ;[सां. ब्रा. २८.८] । इसके पुत्र तथा वंशजो का नाम बारबार आता है । यह सूक्तद्रष्टा था [ऋ. १.३६-४३,८, ९,९४] । अंगिरसकुल में कण्व मंत्रकार थे । कण्व का वंशज उसके अकेले के कण्व नाम से [ऋ.१.४४.८,४६.९,४७.१०,४८.४,८.४३.१] तथा पैतृकनामसहित, जैसे कण्व नार्षद [ऋ.१.११७.८] ;[अ. वे. ४.१९.२] तथा कण्व श्रायस [तै सं. ५.४.७.५] ;[क.सं.२१.८] ;[मै. सं ३.३.९] ऐसा संबोधित है । इसके अतिरिक्त इसका अनेकवचनी (बहुवचन) उल्लेख कण्वा; सौश्रवसाः नाम से होता है [क.सं. १३.१२] ;[सां श्रौ. १६.११.२०] । अथर्ववेद के [अ. वे. २.२५] एक उद्धरण से प्रतीत होता है कि, उनसे शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया जाता था । क्षत्रियों के गायत्रीमंत्र में कण्व ने, सूर्य से प्राप्त की विश्वकल्याणकारक सद्बुद्धि हमें मिले, ऐसा उल्लेख मिलता है [वा.सं. १७.७४] । ऋग्वेद में [ऋ. १.११९.८] निम्नलिखित कथा एक कण्व के संबंध में आयी है । ब्राह्मणत्व की परीक्षा लेने के लिये असुरों ने कण्व को, अंधकारमय स्थान पर रख कर कहा कि, तुम यदि ब्राह्मण होगे तो, उषःकाल कब होगा, पहचानोगे । इसे अश्वियों ने आकर बताया कि, जिस समय उषःकाल होगा उस समय हम लोग वीणावादन करते हुए आयेंगे । उस शब्द के सुन कर तुम कह देना कि उषःकाल हो गया है । विष्णु मतानुसार यह ब्रह्मरात तथा भागवत मतानुसार देवराज के पुत्र याज्ञवल्क्य के पंद्रह शिष्यों में से एक था (व्यास देखिये) । आगे चल कर इसने यजुर्वेद में कण्व शाखा स्थापित कर उसके ग्रंथ निर्माण किये [भा. १२.६] । वे ग्रंथ बहुत सी बातों में याज्ञवल्क्य के विरुद्ध है । कण्व अंगिरस गोत्रोत्पन्न है तथा इनका कुल पूरुओं से उत्पन्न हुआ । कुछ स्थानों पर मतिनार पुत्र अप्रतिथ से यह उत्पन्न हुआ [ह. वं. १.३२] ;[विष्णु.४.१९] ऐसा मिलता है, परंतु कुछ अन्य स्थानों पर कण्व को अजमीढपुत्र कहा गया है [वायु. ९९.१६९-१७० कण्ठ] ;[मत्स्य.४९] । पीढियों की दृष्टि से इन दोनों में काफी भेद है । विष्णु पुराण में दोनों वंश दिये गये है । प्रगाथ काण्व दुर्गह के नातियों का समकालीन था [ऋ. ८.६५.१२] ; दुर्गह देखिये । कण्व वंश की वंशावलि बहुत से स्थानों पर मिलती है [मत्स्य.५०] ;[ह. वं. १.३२] ;[भा.९.२१] ; प्ररकण्व तथा मेघातिथि देखिये । कण्व गोत्र गोत्रियों को दक्षिणा नहीं देनी चाहिये, ऐसा [स. श्रौ. १०.४] में दिया गया है । क्यों कि गोपीनाथ भटट ने भाष्य में “कण्वं तु बधिरं विद्यात्” ऐसा कहा है, परंतु उसे भी यह जँचा नहीं । ब्रह्मदेव के पुष्कर क्षेत्र के यज्ञ में यह था [पद्म. सृ ३४] ।
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कण्व व माध्यंदिन या शुक्ल यजुर्वेदाच्या दोन शाखा असून आश्र्वालायन ही ॠग्वेदाची एक शाखा आहे. या शाखांच्या अनुयायी ब्राह्मणांची परस्परांबद्दलची समजूत या म्हणीत व्यक्त केली आहे. बहुधा ही म्हण आश्र्वलायन शास्त्रीय ब्राह्मणानें रचली असावी.
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