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सुखमनी साहिब - अष्टपदी १५

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


अष्टपदी १५
( गुरु ग्रंथ साहिब -  पान क्र. २८२ )

श्लोक

सरब कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ।
जा कै सिमरनि उधरीऐ नानक तिसु बलिहार ॥१॥

पद १ ले

टूटी गाढनहार गोपाल ।
सरब जीआ आपे प्रतिपाल ॥
सगल की चिंता जिसु मन माहि ।
तिस ते बिरथा कोई नाहि ॥
रे मन मेरे सदा हरि जापि ।
अबिनासी प्रभु आपे आपि ॥
आपन कीआ कछू न होइ ।
जे सउ प्रानी लोचै कोइ ॥
तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम ।
गति नानक जपि एक हरि नाम ॥१॥

पद २ रे

रुपवंतु होइ नाही मोहै ।
प्रभ की जोति सगल घट सोहै ॥
धनवंता होइ किआ को गरबै ।
जा सभु किछु तिस का दिआ दरबै ॥
अति सूरा जे कोऊ कहावै ।
प्रभ की कला बिना कह धावै ॥
जे को होइ बहे दातारु ।
तिसु देनहारु जानै गावारु ॥
जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु ।
नानक सो जनु सदा अरोगु ॥२॥

पद ३ रे

जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ।
तिउ गुर का सबदु मनहि असथंमनु ॥
जिउ पाखाणु नाव चड़ि तरै ।
प्राणी गुर चरण लगतु निसतरै ॥
जिउ अंधकार दीपक परगासु ।
गुर दरसनु देखि मनि होइ बिगासु ॥
जिउ महा उदिआन महि मारगु पावै ।
तिउ साधू संगि मिलि जोति प्रगटावै ॥
तिन संतन की बाछउ धूरि ।
नानक की हरि लोचा पूरि ॥३॥

पद ४ थे

मन मूरख काहे बिललाईऐ ।
पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥
दूख सूख प्रभ देवनहारु ।
अवर तिआगि तू तिसहि चितारु ॥
जो कछु करै सोई सुखु मानु ।
भूला काहे फिरहि अजान ॥
कउन बसतु आई तेरै संग ।
लपटि रहिओ रसि लोभी पंतग ॥
राम नाम जपि हिरदे माहि ।
नानक पति सेती घरि जाहि ॥४॥

पद ५ वे

जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ।
राम नामु संतन घरि पाइआ ॥
तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ।
राम नामु हिरदे महि तोलि ॥
लादि खेप संतह संगि चालु ।
अवर तिआगि बिखिआ जंजाल ॥
धंनि धंनि कहै सभु कोह ।
मुख ऊजल हरि दरगह सोइ ॥
इहु वापारु विरला वापारै ।
नानक ता कै सद बलिहारै ॥५॥

पद ६ वे

चरन साध के धोइ धोइ पीउ ।
अरपि साध कउ अपना जीउ ॥
साध की धूरि करहु इसनानु ।
साध ऊपरि जाईऐ कुरबानु ॥
साध सेवा वडभागी पाईऐ ।
साध संगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
अनिक बिघन ते साधू राखै ।
हरि गुन गाइ अंम्रित रसु चाखै ॥
ओट गही संतह दरि आइआ ।
सरब सूख नानक तिह पाइआ ॥६॥

पद ७ वे

मिरतक कउ जीवालनहार ।
भूखे कउ देवत अधार ॥
सरब निधान जा की द्रिसटी माहि ।
पुरब लिखे का लहणा पाहि ॥
सभु किछु तिस का ओहु करनै जोगु ।
तिसु बिनु दूसर होआ न होगु ॥
जपि जन सदा सदा दिनु रैणी ।
सभ ते ऊच निरमल इह करणी ॥
करि किरपा जिस कउ नामु दीआ ।
नानक सो जनु निरमलु थीआ ॥७॥

पद ८ वे

जा कै गुर की परतीति ।
तिसु जन आवै हरि प्रभु चीति ॥
भगतु भगतु सुनीऐ तिहु लोइ ।
जा कै हिरदै एको होइ ॥
सचु करणी सचु ता की रहत ।
सचु हिरदै सति मुखि कहत ॥
साची द्रिसटि साचा आकारु ।
सचु वरतै साचा पासारु ॥
पारब्रहमु जिनि सचु करि जाता ।
नानक सो जनु सचि समाता ॥८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2013-12-28T23:35:04.4000000

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