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सुखमनी साहिब - अष्टपदी १८

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


अष्टपदी १८
( गुरु ग्रंथ साहिब - पान क्र. २८६ )

श्लोक

सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥
तिस कै संगि सिखु उधरै नानक हरि गुन गाउ ॥१॥

पद १ ले

सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ।
सेवक कउ गुरु सदा दइआल ॥
सिख की गुरु दुरमति मलु हिरै ।
गुर बचनी हरि नामु उचरै ॥
सतिगुरु सिख के बंधन काटै ।
गुर का सिखु बिकार ते हाटै ॥
सतिगुरु सिख कउ नाम धनु देइ ।
गुर का सिखु वडभागी हे ॥
सतिगुरु सिख का हलतु पलतु सवारै ।
नानक सतिगुरु सिख कउ जीअ नालि समारै ॥१॥

पद २ रे

गुरु के ग्रिहि सेवकु जो रहै ।
गुर की आगिआ मन महि सहै ॥
आपस कउ करि कछु न जनावै ।
हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
मनु बेचै सतिगुरु कै पासि ।
तिसु सेवक के कारज रासि ॥
सेवा करत होइ निहकामी ।
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
अपनी क्रिपा जिसु आपि करेइ ।
नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ ॥२॥

पद ३ रे

बीस बिसवे गुर क मनु मानै ।
सो सेवक परमेसुर की गति जानै ॥
सो सतिगुरु जिसु रिदै हरि नाउ ।
अनिक बार गुर कउ बलि जाउ ॥
सरब निधान जीअ का दाता ।
आठ पहर पारब्रहम रंगि राता ॥
ब्रहम महि जनु जन महि पारब्रहमु ।
एकहि आपि नही कछु भरमु ॥
सहस सिआनप लइआ न जाईऐ ।
नानक ऐसा गुरु बडभागी पाईऐ ॥३॥

पद ४ थे

सफल दरसनु पे खत पु नीत ।
परसत चरन गति निरमल रीति ॥
भेटत संगि राम गुन र वे ।
पारब्रहम की दरगह गवे ॥
सुनि करि बचन करन आघाने ।
मनि संतोखु आतम पतीआने ॥
पूरा गुरु अख्यओ जा का मंत्र ।
अंम्रित द्रिसटि पेखै होइ संत ॥
गुण बिअंत कीमति नही पाइ ।
नानक जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥४॥

पद ५ वे

जिहबा एक उसतति अनेक ।
सति पुरख पूरन बिबेक ॥
काहू बोल न पहुचत प्रानी ।
अगम अगोचर प्रभ निरबानी ॥
निराहार निरवैर सुखदाई ।
ता की कीमति किनै न पाई ॥
अनिक भगत बंदन नित करहि ।
चरन कमल हिरदै सिमरहि ॥
सद बलिहारी सतिगुर अपने ।
नानक जिसु प्रसादि ऐसा प्रभु जपने ॥५॥

पद ६ वे

इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ।
अंम्रितु पीवै अमरु सो होइ ॥
उसु पुरख का नाही कदे बिनास ।
जा कै मनि प्रगटे गुनतास ॥
आठ पहर हरि का नामु लोइ ।
सचु उपदेसु सेवक कउ देइ ॥
मोह माइआ कै संगि न लेपु ।
मन महि राखै हरि हरि एकु ॥
अंधकार दीपक परगासे ।
नानक भरम मोह दुख तह ते नासे ॥६॥

पद ७ वे

तपति माहि ठाढि वरताई ।
अनदु भइआ दुख नाठे भाई ॥
जनम मरन के मिटे अंदेसे ।
साधू के पूरन उपदे से ॥
भउ चूका निरभउ होइ बसे ।
सगल बिआधि मन ते खै नसे ॥
जिस का सा तिनि किरपा धारी ।
साध संगि जपि नामु मुरारी ॥
थिति पाई चूके भ्रम गवन ।
सुनि नानक हरि हरि जसु स्रवन ॥७॥

पद ८ वे

निरगुन आपि सरगुनु भी ओही ।
कला धारि जिनि सगली मोही ॥
अपने चरित प्रभि आपि बनाए ।
अपुनी कीमति आपे पाए ॥
हरि बिनु दुजा नाही कोइ ।
सरब निरंतरि एको सोइ ॥
ओति पोति रविआ रुप रंग ।
भए प्रगास साध कै संग ॥
रचि रचना अपनी कल धारी ।
अनिक बार नानक बलिहारी ॥८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2013-12-28T23:36:52.7770000

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