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सुखमनी साहिब - अष्टपदी १४

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


अष्टपदी १४
( गुरु ग्रंथ साहिब - पान क्र. २८१ )

श्लोक

तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ।
एक आस हरि मनि रखहु नानक दुखु भरमु भउ जाई ॥१॥

पद - १

मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ।
दे वन कउ एकै भगवानु ॥
जिस कै दीऐ रहै अघाइ ।
बहुरि न त्रिसना लागै आइ ॥
मारै राखै एको आपि ।
मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
तिस का हुकमु बुझि सुखु होइ ।
तिस का नामु रखु कंठि परोइ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ।
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ।
नानक बिघनु न लागै कोइ ॥१॥

पद २ रे

उसतति मन महि करि निरंकार ।
करि मन मेरे सति बिउहार ॥
निरमल रसना अंम्रित पीउ ।
सदा सुहेला करि लोहि जीउ ॥
नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ।
साध संगि बिनसै सभ संगु ॥
चरन चलउ मारगि गोबिंद ।
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ।
हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥२॥

पद - ३ रे

बडभागी ते जन जन माहि ।
सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
राम नाम जो करहि बीचार ।
से धनवंत गनी संसार ॥
मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ।
सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
एको एकु एकु पछानै ।
इत उत की ओहु सोझी जानै ॥
नाम संगि जिस का मनु मानिआ ।
नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥३॥

पद ४ थे

गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ।
तिस की जानहु त्रिसना बुजै ॥
साध संगि हरि हरि जसु कहत ।
सरब रोग ते ओहु हरि जनु रह्त ॥
अनदिनु कीरतनु केवल बख्यानु ।
ग्रिहसत महि सोई निरबानु ॥
एक उपरि जिसु जन की आसा ।
तिस की कटिऐ जम की फासा ॥
पारबहम की जिसु मनि भूख ।
नानक तिसहि न  लागहि दूख ॥४॥

पद ५ वे

जिस कउ हरि प्रभु मनि चिति आवै ।
सो संतु सुहेला नही डुलावे ॥
जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ।
सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ।
अपुने कारज महि आपि समाइआ ॥
सोधत सोधत सोधत सीझिआ ।
गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
जब देखउ तब सभु किछु मूलु ।
नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥५॥

पद - ६

नह किछु जनमै नह किछु मरै ।
आपन चलितु आप ही करै ॥
आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ।
आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
आपे आपि सगल महि आपि ।
अनिक जगुति रचि थापि उथापि ॥
अबिनासी नाही किछु खंड ।
धारण धारि रहिओ ब्रहमंड ॥
अलख अभेव पुरख परताप ।
आपि जपाए त नानक जाप ॥६॥

पद ७ वे

जिन प्रभु जाता सु सोभावंत ।
सगल संसारु उधरै तिन मंत ॥
प्रभ के सेवक सगल उधारन ।
प्रभ के सेवक दूख बिसारन ॥
आपे मेलि लए किरपाल ।
गुर का सबदु जपि भए निहाल ॥
उन की सेवा सोई लागै ।
जिस नो क्रिपा करहि बडभागै ॥
नामु जपत पावहि बिस्रामु ।
नानक तिन पुरख कउ ऊतम करि मानु ॥७॥

पद ८ वे

जो किछु करै सु प्रभ कै रंगि ।
सदा सदा बसै हरि संगि ॥
सहज सुभाइ होवै सो होइ ।
करणै हारू पछाणै सोइ ॥
प्रभ का कीआ जन मीठ लगाना ।
जैसा सा तैसा द्रिसटाना ॥
जिस ते उपजे तिसु माहि समाए ।
ओइ सुख निधान उनहू बनि आए ॥
आपस कउ आपि दीनो मानु ।
नानक प्रभ जनु एको जानु ॥८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2013-12-28T23:24:21.5270000

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