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सुखमनी साहिब - अष्टपदी १३

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


अष्टपदी १३
( गुरु ग्रंथ साहिब - पान क्र. २७९ )

संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहारु ॥
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ॥१॥

पद १ ले

संत कै दूखनि आरजा घटै ।
संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ।
संत कै दूखनि नरक महि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ।
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत कै हते कउ रखै न कोइ ।
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
संत क्रिपाल क्रिपा जै करै ।
नानक संत संगि निंदकु भी तरै ॥१॥

पद २ रे

संत के दूखन ते मुखु भवै ।
संत कै दूखनि काग जिउ लवै ॥
संत कै दूखनि सरप जोनि पाइ ।
संत कै दूखनि त्रिगद जोनि किरमाइ ॥
संत कै दूखनि त्रिसना महि जलै ।
संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ।
संत कै दूखनि नीचु निचाइ ॥
संत दोखी का थाऊ को नाहि ।
नानक संत भावै तोओइ भी गति पाहि ॥२॥

पद ३ रे

संत का निंदकु महा अतताई ।
संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
संत का निंदक महा हतिआरा ।
संत का निंदक परमेसुरि मारा ॥
संत का निंदक राज ते हीनु ।
संत का निंदुक दुखीआ अरु दीनु ॥
संत के निदक कउ सरब रोग ।
संत की निंदक कउ सदा बिजोग ॥
संत की निंदा दोख महि दोखु ।
नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु ॥३॥

पद ४ थे  

संत का दोखी सदा अपवितु ।
संत का दोखी किसै का नही मितु ॥
संत के दोखी कउ डानु लागै ।
संत के दोखी कऊ सभ तिआगै ॥
संत का दोखी माह अहंकारी ।
संत का दोखी जनमै मरै ।
संत की दूखना सुख ते टरै ॥
संत के दोखी कउ नाही ठाउ ।
नानक संत भावै ता लए मिलाइ ॥४॥

पद ५ वे

संत का दोखी अध बीच ते टूटै ।
संत का दोखी कितै काजि न पहूचै ॥
संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ।
संत का दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
संत का दोखी अंतर ते थोथा ।
जिउ सास बिना मिरतक की लोथा ॥
संत के दोखी की जड़ किछु नाहि ।
आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
संत के दोखी कउ अवरु न राखन हारु ।
नानक संत भावै ता लए उबारि ॥५॥

पद ६ वे

संत का दोखी इउ बिललाइ ।
जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
संत का दोखी भूखा नही राजै ।
जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै ॥
संत का दोखी छुटै इकेला ।
जिउ बूआडु तिलु खेत माहि दुहेला ॥
संत को दोखी धरम ते रहत ।
संत का दोखी सद मिथिआ कहत ॥
किरतु निंदक का धुरि ही पइआ ।
नानक जा तिसु भावै सोई थिआ ॥६॥

पद ७ वे

संत का दोखी बिगड़ रुपु होइ जाइ ।
संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
संत का दोखी सदा सहाकाईऐ ।
संत का दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
संत के दोखी की पुजै न आसा ।
संत का दोखी उठि चलै निरासा ॥
संत कै दोखि न त्रिसटै कोइ ।
जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
पइआ किरतु न मेटै कोइ ।
नानक जानै सचा सोइ ॥७॥

पद ८ वे

सभ घट तिस के ओहु करनैहारु ।
सदा सदा तिस कउ नमसकारु ॥
प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ।
तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
सभु कछु वरतै तिस का कीआ ।
जैस करे तैसा को थीआ ॥
अपना खेलु आपि करनैहारु ।
दूसर कउनु कहै बीचारु ॥
जिस नो क्रिपा करै तिसु आपन नामु देइ ।
बडभागी नानक जन सेइ ॥८॥१३॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2013-12-28T23:23:45.2930000

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