भजन - वह पुरुषोत्तम मेरा प्यार ...

हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।


वह पुरुषोत्तम मेरा प्यार । नेह लगी टूटै नहिं तार ॥१॥

तीरथ जाऊँ न बर्त करूँ । चरनकमलको ध्यान धरूँ ॥२॥

प्रानपियारे मेरेहिं पास । बन-बन माहिं न फिरूँ उदास ॥३॥

पढूँ न गीता-बेद-पुरान । एकहिं सुमिरूँ श्रीभगवान ॥४॥

औरनकों नहिं नाऊँ सीस । हरि ही हरि हैं बिस्वे बीस ॥५॥

काहूकी नहिं राखूँ आस । तृस्ना काटि दई है फाँस ॥६॥

उद्यम करूँ न राखूँ दाम । सहजहिं ह्वै रहैं पूरन काम ॥७॥

सिद्धि मुकति फल चाहौं नाहिं । नित ही रहूँ हरि संतन माहिं ॥८॥

गुरु सुकदेव यही मोहिं दीन । चरनदास आनँद लवलीन ॥९॥

N/A

References : N/A
Last Updated : December 20, 2007

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP