छब्बीसवाँ पटल - कौलतर्पण

रूद्रयामल तन्त्रशास्त्र मे आद्य ग्रथ माना जाता है । कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


हे महादेव ! जो तत्त्वतीर्थ में तर्पण करता है उसने सारे त्रिलोकी को तृप्त कर दिया , हे प्रभो अब उस तर्पण के प्रकार को सुनिए मूलाधार रुप कमल में रहने वाली चन्द्र सूर्याग्नि स्वरुपा कुण्डलिनी को ऊपर उठाकर उसमें पर बिन्दु ( सहस्त्रार चक्र में स्थित चन्द्र मण्डल से झरने वाली सुधा ) सन्निविष्ट कर उसमें रहने वाले अमृतमय देह मेंर रहने वाली कुलेश्वरी महाविद्या स्वरुप देवता को तृप्त करे तो वह निश्चय ही सिद्ध हो जाता है ।९७ - ९९॥

चन्द्रमा सूर्य तथा महाग्नि से उत्पन्न हुई अमृतधारा से नित्या कौलिनी का तर्पण करे । तदनन्तर अमृत से भीङ्गी हुई उन देवता का ध्यान करे । यह पर - पद में निवास करने वाली , काली स्त्रीविद्यादि का तर्पण कर साधक योगी हो जाता है । हे कुलेश्वर ! यह सत्य है यह सत्य है ॥१०० - १०१॥

मूलाधार रुप पात्र के ललाटस्थ चन्द्रमण्डल से निर्गत अमृत से ज्ञानमार्ग द्वारा पूर्ण करे । फिर उससे खेचरी देवता का तर्पण करे । सुधा - सिन्धु के मध्य देश में कुल कन्या का तर्पण मदिरा रुप अमृत धारा से करे तो वह योगिराज सिद्ध हो जाता है ॥१०२ - १०३॥

उस तीर्थ में महाज्ञानी प्रयत्नपूर्वक ध्यान करे और उसके बाद सगर्भ प्राणायाम करे - यही योगियों का ध्यान है । अपनी कन्या को अथवा दूसरों की कन्या को भोजन करावे । अथवा सबको तृप्त करने के लिए युवती को संतुष्ट करे ॥१०४ - १०५॥

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Last Updated : July 30, 2011

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