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पुरंदरः [purandarḥ] [पुरः शत्रूणां नगराणि दारयति खच्]
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पुरंदर n. वैवस्वत मन्वन्तर के इन्द्र का नामांतर (इन्द्र देखिये) । मत्स्य पुराण में निर्दिष्ट अठारह वास्तुशास्त्रकारों में पुरंदर का निर्देश प्राप्त है [मत्स्य. २५२. २-३] । अन्य वास्तशास्त्रकारों के नाम इस प्रकार हैः--भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद,न ग्नजित्, विशालाक्ष, ब्रह्म, कुमार, नन्दीश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, शुक्र, बृहस्पति, अनिरुद्ध । महाभारत के अनुसार, भगवान् शिव ने धर्म, अर्थ, एवं काम शास्त्र पर ‘वैशालाक्ष’ नामक एक ग्रन्थ की रचना की, जिसकी अध्यायसंख्या कुल दस हजार थी । उस बृहद्ग्रन्थ का संक्षिप्तीकरण, आचार्य पुरंदर ने किया । इसके इस ग्रन्थ का नाम ‘बाहुदंतक’ था, जिसमें अध्यायों की संख्या पॉंच सहस्त्र थी । संभवतः आचार्य पुरंदर की माता का नाम बहुदंती था । हो सकता है इसी कारण, इसने अपने इस ग्रन्थ का नाम ‘बाहुदंतक’ रक्खा हो [म.शां.५९-८९-९०] ।
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N. N. of Indra; पुरन्दरश्रीः पुरमुत्पताकं प्रविश्य पौरैरभिनन्द्यमानः [R.2.74.]
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An epithet of Śiva.
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