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शाकटायन

See also ŚĀKAṬĀYANA , शाकटायन II. , शाकटायन III. , शाकटायन IV.
n.  एक वैयाकरण, जो पाणिनि एवं यास्क आदि आचार्यों का पूर्वाचार्य, एवं ‘उणादिसूत्रपाठ’ नामक सुविख्यात व्याकरण ग्रंथ का कर्ता माना जाता है । पाणिनि के अष्टाध्यायी में इसे सारे व्याकरणकारों में श्रेष्ठ कहा गया है अनुशाकटायनं वैयाकरणाः;[ पा. सू. १.४.८६-८७] । इससे प्रतीत होता है कि, पाणिनि के काल में भी यह आदरणीय वैय्याकरण माना जाता था । केशवकृत ‘नानार्थार्णव’ में शाकटायन को ‘आदिशाब्दिक’ (शब्दशास्त्र का जनक) कहा गया है ।
नाम n.  पतंजलि के व्याकरण में इसके पिता का नाम शकट दिया गया है [महा. ३.३.१] । किंतु पाणिनि के अनुसार शकट इसके पिता का नाम न हो कर, इसके पितामह का नाम था [पा. सू. ४.१.९६] । पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ में एवं शुक्लयजुर्वेद प्रातिशाख्य में इसे काण्ववंशीय कहा गया है ।
गुरुपरंपरा n.  व्याकरण साहित्य में इसे काण्व ऋषि का शिष्य कहा गया है [शु. प्रातिशाख्य. ४.१२९] । किन्तु शैशिरि शिक्षा के प्रारंभ में इसे शैशिरि परंपरा का आचार्य कहा गया है, एवं इसे स्वयं शैशिरि ऋषि का शिष्य कहा गया है (शैशिरस्य तु शिष्यस्य शाकटायन एव च)
उणादि सूत्र n.  इस सुविख्यात व्याकरणशास्त्रीय ग्रंथ का शाकटायन प्रणयिता माना जाता है । संस्कृत भाषा में पाये जानेवाले सर्व शब्द ‘धातुसाधित’ (धातुओं से उत्पन्न) हैं, ऐसा इसका अभिमत था । इसी दृष्टि से लौकिक एवं वैदिक शब्दों का एवं पदों का अन्वाख्यान लगाने का सफल प्रयत्‍न इसने अपने ‘उणादिसूत्र’ में किया है । वैदिक साहित्यान्तर्गत ‘प्रातिशाख्य’ ग्रंथों में इसके व्याकरणविषयक मतों का निर्देश अनेक बार प्राप्त हैं [ऋ. पा. १७.७४७];[ अ. प्रा. ३.८, ९, १२, ४.५, १२७, १८९] । पाणिनि के सूत्रपाठ में ‘उणादिसूत्रों’ का निर्देश कई बार आता है, जिससे प्रतीत होता है कि, इसका यह ग्रंथ पाणिनि से भी पूर्वकालीन था । पाणिनि के पूर्वकालीन चाक्रायण चाक्रवर्मण नामक आचार्य का निर्देश भी उणादिसूत्रों में प्राप्त है । ‘प्रकृति प्रत्यय’ कथन करने की पद्धति सर्वप्रथम इसने ही शुरू की, जिसका अनुकरण आगे चल कर पाणिनि ने किया । फिर भी शब्दों की सिद्धि के संबंध में, पाणिनि अनेक बार अपने स्वयं का स्वतंत्र मत प्रतिपादन करता हुआ प्रतीत होता है । गार्ग्य को छोड़ कर समस्त ‘नैरुक्त’ आचार्य शाकटायन को अपना आद्य आचार्य मानते हैं, एवं संस्कृत भाषा में प्राप्त समस्त नाम ‘आख्यातज’ समझते हैं। इसका उपसर्गविषयक एक मत ‘बृहद्देवता’ में पुनरुध्दृत किया गया है [बृहद्दे. २.९] । उणादि सूत्र के उपलब्ध संस्करण में ‘मिहिर’ ‘दीनार’ ‘स्तूप’, आदि अनेकानेक बुद्धोत्तरकालीन असंस्कृत शब्दों का निर्देश प्राप्त है । इससे प्रतीत होता है कि, इस ग्रंथ का उपलब्ध संस्करण प्रक्षेपयुक्त है । इस ग्रंथ की उज्ज्वलदत्त के द्वारा लिखित टीका ऑफ्रेक्ट के द्वारा प्रकाशित की गयी है, उसमें भी यही अभिमत व्यक्त किया गया है । इसी ग्रंथ की श्र्वेतवनवासिन् एवं नारायण के द्वारा लिखित टीकाएँ मद्रास विश्र्वविद्यालय के द्वारा प्रकाशित की गयी है । उणादि सूत्रों का रचयिता शाकटायन न हो कर स्वयं पाणिनि ही था, ऐसा सिद्धान्त स्व. प्रा. का. बा. पाठक के द्वारा प्रतिपादित किया गया है ।
दैवतशास्त्रज्ञ n.  बृहद्देवता में शाकटायन के अनेकानेक दैवताशास्त्रविषयक उद्धरण प्राप्त हैं [बृहद्दे. २.१.६५, ३.१५६, ४.१३८, ६.४३, ७.६९, ८.११.९०] । इससे प्रतीत होता है कि, शाकटायन के द्वारा ‘दैवतशास्त्र’ विषयक कोई ग्रंथ की रचना की गयी होगी। किंतु इसके इस ग्रंथ का नाम भी आज उपलब्ध नहीं है । इसके अतिरिक्त शौनक के ‘चतुर्वर्गचिंतामणि’ में शाकटायन के अभिमतों का निर्देश प्राप्त है ।
अन्य ग्रंथ n.  उपर्युक्त ग्रंथ्ज्ञों के अतिरिक्त, इसके नाम पर निम्नलिखित ग्रंथ भी प्राप्त हैः-- १. शाकटायन स्मृति; २. शाकटायन-व्याकरण (C.C) ।

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