Dictionaries | References

परशुराम

A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
परशु—राम  m. m.रम with the axe’, N. of one of the three रामs (son of जमद्-अग्नि and sixth अवतार of विष्णु, he was a typical Brāhman and his history typifies the contests between the ब्रह्मन्s and क्षत्रियs), [Kāv.]; [Pur.]; [MWB. xiii, 1]; [RTL. 110; 270] (also -क)
गर्जर   N. of a prince and of sev. authors (also with , देव, मिश्र, मुनि), [Cat.]

Shabda-Sagara | sa  en |   | 
परशुराम  m.  (-मः) A hero and demigod; the first of the three RĀMAS, and the sixth Avatāra or descent of the deity VISHṆU: who appeared in the world as the saint JAMADAGNI, for the purpose of repressing the tyranny and punishing the violence of the Kshetriya, or military tribe; PARASURĀMA appears to typify the tribe of Brāmhans and their contests with the Kshetrityas.
E. परशु an axe, and राम who delights in; also
with कन् added, परशुरामक; and with the first member, पर्शु, पर्शुराम, q. v.

A dictionary, Marathi and English | mr  en |   | 
A hero and demigod; the first of the three Rámas; and the sixth Avatár of विष्णु. He appeared for the purpose of punishing the violence of the Kshatriya or military tribe.

परशुराम (जामदग्न्य) n.  महर्षि जमदग्नि का महान् पराक्रमी पुत्र, जिसने इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया था । भृगुवंश में पैदा होने के कारण, जमदग्नि एवं परशुराम ‘भार्गव’ पैतृक नाम से ख्यातनाम थे । भार्गव वंश के ब्राह्मण पश्चिम भारत पर राज्य करने वाले हैहय राजाओं के कुलगुरु थे । भार्गववंश के ब्राह्मण आनर्त (गुजरात) देश के रहनेवाले थे । पश्चात् हैहय राजाओं से भार्गवों का झगडा हो गया एवं वे उत्तरभारत के, कान्यकुब्ज देश में रहने गये । फिर भी, बारह पीढियों तक हैहय एवं भार्गव का वैर चलता रहा । इसीलिये प्राचीन इतिहास में २५५० ई. पू. से २३५० ई.पू. तक यह काल ‘भार्गव-हैहय’ नाम से पहचाना जाता है । हैहय एवं भार्गवों के वैर की चरम सीमा परशुराम जामदग्न्य के काल में पहुँचे गयी, एवं परशुराम ने हैहयों का और संबंधित क्षत्रियों का इक्कीस बार संहार किया । इसी कारण ब्राह्मतेज की मूर्तिमंत एवं ज्वलंत प्रतिमा बन कर, परशुराम इस विशिष्ट काल के इतिहास में अमर हो गया है । ‘राम भार्गवेय’ नामक एक वैदिक ऋषि का नाम एक सूक्तद्रष्टा के रुप में आया है [ऋ.१०.११०] । ‘सर्वानुक्रमणी’ के अनुसार यही परशुराम है । ‘राम भार्गवेय’ श्यापर्ण लोगों का पुरोहित था । ‘राम भार्गवेय’ एवं परशुराम एक ही था यह निश्चित से नहीं कहा जा सकता । हैहय राजा कार्तवीर्य एवं परशुराम के युद्ध का निर्देश अथर्ववेद में संक्षिप्त रुप में आया है [अ.वे.५.१८.१०] । अथर्ववेद के अनुसार, कार्तवीर्य राजा ने जमदग्नि ऋषि की धेनु हठात् ले जाने का प्रयत्न किया । इसलिये परशुराम द्वारा कार्तवीर्य एवं उसके वंश का पराभव हुआ । परशुराम महर्षि जमदग्नि के पॉंच पुत्रों में से कनिष्ठ पुत्र था । इसकी माता का नाम ‘कामली रेणुका’ था जो इक्ष्वाकु वंश के राजा की पुत्री थी । परशुराम धनुर्विद्या में ही नहीं, बल्कि अन्य सभी अस्त्र-शस्त्र सम्बन्धी विद्याओं में प्रवीण था [ब्रह्म.१०] । यह विष्णु का अवतार था [पद्म.उ.२४८];[ मत्स्य.४७.२४४];[ वायु.९१.८८,३६.९०] । इसका जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था [रेणु.१४] । यह १९ वें त्रेतायुग में उत्पन्न हुआ था [दे.भा.४.१६] । त्रेता तथा द्वापर युगों के संधिकाल में परशुराम का अवतार हुआ था [म.आ.२.३]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  उपनयन के उपरांत यह शालग्राम पर्वत पर गया । वहॉं कश्यप ने इसे मंत्रोपदेश दिया [पद्म.३.२४१] । इसके अतिरिक्त इसने शड्कर को प्रसन्न कर धनुर्वेद, शस्त्रास्त्रविद्या एवं मंत्र प्रयोगादि का ज्ञान प्राप्त किया [रेणु.१५];[ ब्रह्मांड.३.२२-५६-६०]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  तपस्या से वापस आते समय, राह में शालग्राम शिखर पर शान्ता के पुत्र को लकडबग्घे से मुक्त करा कर यह उसे अपने साथ ले आया । वही आगे चल कर, अकृतव्रण नाम से परशुराम का शिष्य प्रसिद्ध हुआ ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  जमदग्नि का आश्रम नर्मदा के तट पर था [ब्रह्मांड.३.२३.२६] । परशुराम का आश्रम भी वही था ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  एक बार जमदग्नि रेणुका पर क्रोधित हुये तथा परशुराम को उसका वध करने की आज्ञा दी, जिसका परशुराम ने तुरन्त पालन किया [म.व.११६.१४] । जमदग्नि इस पर प्रसन्न हुये तथा इनकी इच्छानुसार रेणुका को पुनः जीवित कर इसे वरदान दिया-तुम अजेय हो, तथा स्वेच्छा पर ही मृत्यु को प्राप्त हो सकते हो [विष्णुधर्म.१.३६.११]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम को निम्नलिखित अस्त्र-शस्त्रों की जानकारी प्राप्त थीः---
  1. ब्रह्मास्त्र,
  2. वैष्णव,
  3. रौद्र,
  4. आग्नेय,
  5. वासव,
  6. नैऋत,
  7. याम्य,
  8. कौबेर,
  9. वारुण,
  10. वायव्य,
  11. सौम्य,
  12. सौर,
  13. पार्वत,
  14. चक्र,
  15. वज्र,
  16. पाश,
  17. सर्व,
  18. गांधर्व,
  19. स्वापन,
  20. भौत,
  21. पाशुपत,
  22. ऐशीक,
  23. तर्जन,
  24. प्रास,
  25. भारुड,
  26. नर्तन,
  27. अस्त्ररोधन,
  28. आदित्य,
  29. रैवत,
  30. मानव,
  31. अक्षिसंतर्जन,
  32. भीम,
  33. जृम्भण,
  34. रोधन,
  35. सौपर्ण,
  36. पर्जन्य,
  37. राक्षस,
  38. मोहन,
  39. कालास्त्र,
  40. दानवास्त्र,
  41. ब्रह्मशिरस
[विष्णुधर्म १.५०]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  हैहय राजा कृतवीर्य ने अपने कुलगुरु ’ऋचीक और्व भार्गव’ को बहुत धन दिया था । पश्चात् वह धन वापस करने का ऋचीक ने इन्कार कर दिया । उस कारण कृतवीर्य का पुत्र सहस्त्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) ने ऋचीक के उपर हाथ चलाया, जिस कारण अपने अन्य भार्गव बांधवों के साथ वह कान्यकुब्ज को भाग गया । ऋचीक स्वयं अत्यंत स्वाभिमानी एवं अस्त्रविद्या में कुशल था । कान्यकुब्ज पहुँचते ही, हैहयों से अपमान का बदला लेने की वह कोशिश करने लगा । उस कार्य के लिये, इसने नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र इकठ्ठा किये एवं उत्तर भारत के शक्तिशाली राजाओंको अपने पक्ष में लाने का प्रयत्न करने लगा । इस हेतु से, कान्यकुब्ज देश के गाधि राजा की कन्या सत्यवती के साथ विवाह किया एवं अपने पुत्र जमदग्नि का विवाह अयोध्या के राजवंश में से रेणु राजा की कन्या रेणुका के साथ कराया । इस तरह, कान्यकुब्ज एवं अयोध्या के ये दो देश भार्गवों के पक्ष में आ गये ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  जमदग्नि पराक्रमी एवं अस्त्रविद्यानिपुण था । पर उसका पुत्र परशुराम उससे भी अधिक पराक्रमी था । एक बार परशुराम जब तप करने गया था, तब कार्तवीर्य अर्जुन जमदग्नि से मिलने उसके आश्रम में आया । तपश्चर्या को जाने के पहले, अपनी कामधेनु नामक गौ परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के पास अमानत रुप मे रखी थी । कार्तवीर्य ने उसे जमदग्नि से छीनने की कोशिश की । कामधेनु के शरीर से उत्पन्न हुये हजारों यवनों ने कार्तवीर्य का वध करने का प्रयत्न किया । किंतु अंत में जमदग्नि को घूंसे लगा कर, एवं उसका आश्रम जला कर कार्तवीर्य कामधेनु के साथ अपने राज्य में वापस चला गया । तपश्चर्या से लौटते ही, परशुराम को कार्तवीर्य की दुष्टता ज्ञात हुई, एवं इसने तुरंत कार्तवीर्य के वध की प्रतिज्ञा की । हुइ पुराणों के अनुसार, कार्ववीर्यवध की इस प्रतिज्ञा से इसको परावृत्त करने का प्रयत्न जमदग्नि ऋषि ने किया । उसने कहा-‘ब्राह्मणों के लिये यह कार्य अत्याधिक अशोभनीय है’। परंतु परशुराम ने कह ‘दुष्टों का दमन न करने से परिणाम बुरा हो सकता है’। फिर जमदग्नि ने इस कृत्य के लिये ब्रह्मा की, तथा ब्रह्मा ने शंकर की संमति लेने के लिये कहा । संमति प्राप्त कर यह सरस्वती के किनारे, अगस्त्य ऋषि के पास आया, तथा उसकी आज्ञा से गंगा के उद्‌गम के पास जा कर, इसने तपश्चर्या की । इस तरह देवों का आशीर्वाद प्राप्त कर, परशुराम नर्मदा के किनारे आया । वहॉं से कार्तवीर्य के पास दूत भेज कर, इसने उसे युद्ध का आह्रान किया । हैहय एवं भार्गवों के शत्रुत्व का इतिहास जान लेने पर, जमदग्नि ने परशुराम को कार्तवीर्य से परावृत्त करने की कोशिश की थी, यह कथा अविश्वसनीय लगती है ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम की प्रतिज्ञा सुन कर, कार्तवीर्य ने भी युद्ध का आह्रान स्वीकार किया, एवं सेनापति को सेना सजाने के लिये कहा । अनेक अक्षौहिणी सेनाओं के सहित कार्तवीर्य युद्धभूमि पर आया । उसका परशुराम ने नर्मदा के उत्तर किनारे पर मुकाबला किया । युद्ध के शुरु में कार्तवीर्य की ओर से मत्स्य राजा ने परशुराम पर जोरदार आक्रमण किया । बडी सुलभता के साथ परशुराम ने उसका वध किया । बृहद्वल, सोमदत्त एवं विदर्भ, मिथिला, निषध, तथा मगध देश के राजाओं का भी परशुराम ने वध किया । सात अक्षौहिणी सैन्य तथा एक लाख क्षत्रियों के साथ आये हुये सुर्यवंशज सुचन्द को परशुराम ने भद्रकाली की कृपा से परास्त दिया । सुचन्द्र के पुत्र पुष्कराक्ष को भी सिर से पैर तक काट कर, इसने मार डाला ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  बाद में प्रत्यक्ष कार्तवीर्य तथा उसके सौ पुत्रों के साथ परशुराम का युद्ध हुआ । शुरु में कार्तवीर्य ने परशुराम को बेहोश कर दिया । किन्तु, अन्त में परशुराम के कार्तवीर्य एवं उसके पुत्रों का सौ अक्षोहिणी सेनासहित नाश कर दिया [ब्रह्माड३.३९.११९];[ म.द्रो.परि.१क्र .८] । महाभारत के अनुसार, परशुराम ने कार्तवीर्य के सहस्त्र बाहू काट दियेो, एवं एक सामान्य श्वापद जैसा उसका वध किया [म.शां.४९.४१] । कार्तवीर्य के शूर, वृषास्य, वृष, शोरसेन तथा जयध्वज नामक पुत्रों ने पलायन किया । उन्होंने हिमालय की तराई में स्थित अरण्य में आश्रय लिया । परशुराम ने युद्ध समाप्त किया । पश्चात् यह नर्मदा में स्नान कर के शिवजी के पास गया । वहॉं गणेशजी ने इसे कहा ‘शिवजी के पास जाने का यह समय नहीं है’। फिर क्रुद्ध हो कर अपने फरसे से इसने गणेशजी का दॉंत तोड दिया [ब्रह्मांड.३.४२] । पश्चात् जगदाग्नि के आश्रम में आ कर, इसने उसे कार्तवीर्यवध का सारा वृत्तांत सुनाया । क्षत्रियहत्या के दोषहरण के लिये, जमदग्नि ने परशुराम को बारह वर्षो तक तप कर के प्रायश्चित्त करने के लिये कहा । फिर परशुराम प्रायश्चित करने के लिये महेंद्र पर्वत चला गया । मत्स्य के अनुसार, यह कैलास पर्वत पर गणेशजी की आराधना करने गया [मत्स्य.३६] । जिघर जिधर यह जाता था, वहॉं क्षत्रिय डर के मारे छिप जाते थे, तथा अन्य सारे लोग इसकी जयजयकार करते थे [ब्रह्मांड.३.४४]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम तपश्चर्या में निमग्न ही था कि, इधर कार्तवीर्य के पुत्रों ने तपस्या के लिये समाधि लगाने हुबे जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया, तथा वे उसका सिर ले कर भाग गये । ब्रह्मांड के अनुसार, जमदग्नि का वध कार्तवीर्य के अमात्य चंद्रगुप्त ने किया [ब्रह्मांड. ३.२९.१४] । बारह वर्षों के बाद, परशुराम जब तपश्चर्या से वापस आ रहा था, तब मार्ग में इसे जमदग्नि के वध की घटना सुनायी गयी । जमदग्नि के आश्रम में आते ही, रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीट कर जमदग्निवध की कथा फिर दोहरायी । फिर क्रोधातुर हो कर, परशुराम ने केवल हैहयों का ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर से सारे क्षत्रियों के वध करने की, एवं पृथ्वी को निःक्षत्रिय बनाने की दृढ प्रतिज्ञा की ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम के प्रतिज्ञा की यह कथा ‘रेणुकामहात्म्य’ में कुछ अलग ढंग से दी गयी है । कार्तवीर्य जब जमदग्नि से मिलने उसके आश्रय में गया, तब कामधेनु की प्राप्ति के लिये उसने जमदग्नि का वध किया । फिर अपने पिता का और्ध्वदैहिक करने के लिये, परशुराम एक डोली में जमदग्नि का शव, एवं रेणुका को बैठा कर, ‘कन्याकुब्जाश्रम’ से बाहर निकला । अनेक तीर्थस्थान एवं जंगलों को पार करता हुआ, यह दक्षिण मार्ग से पश्चिम घाट के मल्लकी नामक दत्तात्रेयक्षेत्र में आया । वहॉं कुछ काल तक विश्राम करने के उपरांत यह चलनेवाला ही था, कि इतने में आकाशवाणी हुयी ‘अपने पिता का अग्निसंस्कार तुम इसी जगह करों’। आकाशवाणी के कथनानुसार, परशुराम ने दत्तात्रेय की अनुमती से, जमदग्नि का अंतिम संस्कार किया । रेणुका भी अपने पति के शव के साथ अग्नि में सती हो गयी । बाद में परशुराम ने मातृ-पितृप्रेम से विह्रल हो कर इन्हें पुकारा । फिर दोनों उस स्थान पर प्रत्यक्ष उपस्थित हो गये । इसी कारण उस स्थान को ‘मातृतीर्थ’ (महाराष्ट्र में स्थित आधुनिक माहूर) नाम दिया गया । इस मातृतीर्थ में परशुराम की माता रेणुका स्वयं वास करती है । इस स्थान पर रेणुका ने परशुराम को आज्ञा दी, ‘तुम कार्तवीर्य का वध करो, एवं पृथ्वी को निःक्षत्रिय बना दो’। नर्मदा के किनारे मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम था । वहॉं मार्कण्डेय ऋषि का आशीर्वाद लेकर, परशुराम ने कार्तवीर्य का वध किया एवं पृथ्वी निःक्षत्रिय करने की अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिये, यह आगे बढा [रेणु. ३७-४०]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिये, परशुराम ने सर्वप्रथम अपने गुरु अगस्त्य का स्मरण किया । फिर अगस्त्य ने इसे उत्तम रथ एवं आयुध दिये । सहसाह इसका सारथि बना [ब्रह्मांड.३.४६.१४] । रुद्रद्वारा दिया गया ‘अभित्रजित्’ शंख इसने फूँका । कार्तवीर्य के शूरसेनादि पॉंच पुत्रों ने अन्य राजाओं को साथ ले कर, परशुराम का सामना करने का प्रयत्न किया । उनको वध कर, अन्य क्षत्रियों का वध करने का सत्र इसने शुरु किया । हैहय राजाओं की राजधानी माहिष्मती नगरी को इसने जला कर भस्म कर दिया । हैहयों में से वीतिहोत्र केवल बच गया, शेष हैहय मारे गये । हैहयविनाश का यह रौद्र कृत्य पूरा कर, परशुराम महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने के लिये चला गया । नये क्षत्रिय पैदा होते ही, उनका वध वरने की इसकी प्रतिज्ञा थी । उस कारण यह दस वर्षो तक लगातार तपस्या करता था, एवं दो वर्षों तक महेंद्र पर्वत से उतर कर, नये पैदा हुए क्षत्रियों को अत्यंत निष्ठुरता से मार देता था । इस प्रकार इक्कीस बारा इसने पृथ्वी भर के क्षत्रियों का वध कर, उसे निःक्षत्रिय बना दिया [ब्रह्मांड.३.४६]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  इस तरह परशुराम ने चौसठ्ग कोटि क्षत्रियों का वध किया । उनमें से चौदह कोटि क्षत्रिय सरासर ब्राह्मणों का द्वेष करनेवाले थे । बचे हुए क्षत्रियों को इसने नाना प्रकार की सजाएँ दी । दंतक्रूर का इसने वध किया । एक हजार वीरों को इसने मूसल से मार डाला । हजारों कों तलवार से काट डाला । हजारों को पेड पर टॉंग कर मार डाला, तथा उतने ही लोगों को पानी में डुबो दिया । हजारों के दॉंत तोड कर कर नाक तथा कान काट लिये । सात हजार क्षत्रियों को मिर्च की धुनी दी । बचे हुये लोगों को बॉंधकर, मार कर, तथा मस्तक तोडकर नष्ट कर दिया । गुणावती के उत्तर में तथा खांडवारण्य के दक्षिण में जो पहाडियॉं हैं, उनकी तराई में क्षत्रियों से इसका युद्ध हुआ । वहॉं इसने दस हजार वीरों का नाश किया । उसके बाद कश्मीर, दरद, कुंति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग कलिंग, विदेह, ताम्रलिप्त, रक्षोवाह, वीतिहोत्र, त्रिगर्त, मार्तिकावत, शिबि इत्यादि अनेक देश के राजाओं को कीडेमकोडे के समान इसने वध कर दिया । इसी निर्दयता से जंगली लोगों का भी वध किया । इस प्रकार परशुराम ने बारह हजार मूर्धानिषिक्त राजाओं के सिर काट डाले । बाद में हजारों राजाओं को पकड कर, यह कुरुक्षेत्र ले आया । वहॉं पॉंच बडे कुण्ड खोद कर इसने उसे कैदी राजाओं के रक्त से भर दिया । पश्चात् उन कुंडों में परशुराम ने ‘रुधिस्नान’ किया एवं अपने पितरों को तर्पण दिया । वे कुंड ‘समंतपंचक तीर्थ’ था ‘परशुरामह्रद’ नाम से आज भी प्रसिद्ध है । बाद में गया जाकर चन्द्रपाद नामक स्थान पर इसने श्राद्ध किया [पद्म.स्व.२६] । इस प्रकार अद्‌भुत कर्म कर के परशुराम प्रतिज्ञा से मुक्त हुआ । पितरों को यह क्षत्रियहत्या पसन्द न आई । उन्हों ने इस कार्य से छुटकारा पाने तथा पाप से मुक्ति प्राप्त करने के लिये, प्रायश्चित करने के लिये कहा [म.आ.२.४.१२] । पितरों की आज्ञा का पालन कर, यह अकृतव्रण के साथ सिद्धवन की ओर गया । रथ, सारथि, धनुष आदिको त्याग कर इसने पुनः ब्राह्मणधर्म स्वीकार किया । सब तीर्थो पर स्नान कर इसने तीन बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा की, और महेन्द्र पर्वत पर स्थायी निवास बनाया ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  पश्चात् जीती हुयी सारी, पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान देने के लिये, परशुराम ने एक महान् अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया । उस यज्ञ के लिये, बत्तीस हॉंथ सुवर्णवेदी इसने बनायी, एवं निम्नलिखित ऋषिओं को यज्ञधिकार दिये---काश्यप (अश्वर्यु), गौतम (उद्नातृ), विश्वामित्र (होतृ) तथा मार्कण्डेय (ब्रह्मा), भरदाज, अग्निवेश्यादि ऋषियों ने भी इस यज्ञ में भाग लिया । इस प्रकार यज्ञ समाप्त कर परशुराम ने महेन्द्र पर्वत को छोड कर, शेष पृथ्वी कश्यप को दान दे दी [म.शां.४९];[ अनु. १३७.१२] । पश्चात् ‘दीपप्रतिष्ठाख्य’ नामक व्रत किया [ब्रह्मांड ३.४७]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  इस व्यवहार के कारण, परशुराम के बारे में लोगों के हृदय में तिरस्कार की भावना भर गयी । कुछ दिनों के उपरांत विश्वमित्र-पौत्र तथा रैम्यपुत्र परावसु ने भरी सभा में इसे चिढाया तथा कहा ‘पृथ्वी निःक्षत्रिय करने की प्रतिज्ञा तुमने की । परन्तु ययाति के यज्ञ के लिये एकत्रिप्र प्रतर्दन प्रभृति लोग क्या क्षत्रिय नहीं है । तुम मनचाही बकबास कहते हो । सच बात यह है कि सब ओर फैल क्षत्रियों के डर से तुम वन में मुँह छिपा कर बैठे हो’। इससे संतप्त हो कर परशुराम ने पुनः शस्त्र हाथ में लिया, तथा पहले निरपराधी मानकर छोडे गये क्षत्रियों का वध किया । छोटों का विचार न कर, इसने मॉं के गर्भ में स्थित बच्चों का भी नाश किया । अन्त में सम्पूर्ण पृथ्वी का दान कर स्वयं महेन्द्र पर्वत पर रहने के लिये चला गया [म.द्रो.परि,.क्र.२६ पंक्ति ८६६] । अभिमन्यु की मृत्यु से शोकग्रस्त युधिष्ठिर को यह कथा बताकर नारद ने शांत किया ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम के हत्याकांड से बहुत ही थोडे क्षत्रिय बच सके । उनके नाम इस प्रकार हैः---
  1. हैहय राजा वीतिहोत्र---यह अपने स्त्रियों के अंतःपुर में छिपने से बच गया ।
  2. पौरव राजा ऋक्षवान---यह यक्षवान् पर्वतों के रीघों में जाकर छिपने से बच गया ।
  3. अयोध्या का राजा सर्वकर्मन्---पराशर ऋषि ने शूद्र के समान सेवा कर इसे बचाया ।
  4. मगवराज बृहद्रथ---गृध्रकुट पर्वत पर रहने वाले बंदरों ने इसकी रक्षा की ।
  5. अंगराज चित्ररथ---गंगातीर पर रहने वाले गौतम’ ने इसकी रक्षा की ।
  6. शिबीराजा गोपालि---गायों ने इसकी रक्षा की ।
  7. प्रतर्दनपुत्र वत्स---इसकी रक्षा गोवत्सों ने की ।
  8. मरुत्त--इसे समुद्र ने बचाया । 
इन राजाओं के वंश के लोग क्षत्रिय होते हुये भी, शिल्पकार, स्वर्णकार आदि कनिष्ठ श्रेणी के व्यवसाय करने पर विवश हुये । इस प्रकार परशुराम के कारण, चारों ओर अराजकता फैल गया । उस अराजकता को नष्ट करने के लिये, कश्यप ने चारों ओर के क्षत्रियों को ढूंढना पुनः प्रारंभ किया, एवं उनके राज्याभिषेक कर सुराज्य स्थापित करने की कोशिश की [म.शां.४९-५७-६०]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  अवशिष्ट क्षत्रियों के बचाव के लिये, कश्यप ने परशुराम को दक्षिण सागर के पश्चिमी किनारे जाने के लिये कहा । ‘शूर्पारक’ नामक प्रदेश समुद्र से प्राप्त कर, परशुराम वहॉं रहने लगा । भृगुकच्छ (भडोचि) से ले कर कन्याकुमारी तक का पश्चिम समुद्र तट का प्रदेश ‘परशुराम देश’ या ‘शूर्पारक’ नाम से प्रसिद्ध हुआ । शूर्पारक प्रंत की स्थापना के कई अन्य कारण भी पुराणों में प्राप्त हैं । सगरपुत्रों द्वारा गंगा नदी खोदी जाने पर, ‘गोकर्ण’ का प्रदेश समुद्र में डूबने का भय उत्पन्न हुआ । वहॉं रहनेवाले शुष्क आदि ब्राह्मणों ने महेंद्र पर्वत जा कर, परशुराम से प्रार्थना की । फिर गोकर्णवासियों के लिये नयी बस्ती बसाने के लिये, इसने समुद्र पीछे हटा कर, दक्षिणोत्तर चार सौ योजने लम्बे शूर्पारक देश की स्थापना की [ब्रह्मांड.३.५६.५१-५७]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम द्वारा पृथ्वी निःक्षत्रियकारण की प्राचीन कथा में कुछ अतिशयोक्ति जरुर प्रतीत होती है । अयोध्या एवं कान्यकुब्ज के राजा अपनी माता रेणुका एवं मातामही सत्यवती के तरफ से परशुराम के रिश्तेदार थे । उन राजाओं को साथ ले कर परशुराम ने हैहयों को एवं हैहयपक्षीय राजाओं को इक्कीस बार युद्धभूमियों पर पराजित किया, इस ‘परशुराम कथा’ के अन्वयार्थ लगा जा सकता है । हैहयविरोधी इस युद्ध में, अयोध्या एवं कान्यकुब्ज के अतिरिक्त, वैशाली, विदेह, काशी आदि देशों के राजा भी परशुराम के पक्ष में शामिल थे । इसी कारण, परशुराम एवं हैहयों का युद्ध, प्राचीन भारतीय इतिहास का पहला महायुद्ध कहा जाता है । कई अभ्यासकों के अनुसार, भार्गव लोग एवं स्वयं परशुराम ‘नाविक’ व्यवसाय के लोग थे, एवं पश्चिम समुद्र किनारे रह कर, योरप, अफ्रीका आदि देशों से व्यापारविनिमय करते थे । इस व्यापार के कारण उन्होंने बहुत संपत्ति इकठ्ठा की थी । पश्चिम भारतवर्ष पर राज्य करनेवाले हैहय लोग, विदेशी व्यापारविनिमय आर्य लोगों के कब्जे में लाना चाहते थे । इस कारण, कार्तवीर्य अर्जुन ने ‘अत्रि’ नामक नाविक व्यवसायी लोगों से दोस्ती की, एवं उनसे एक सहस्त्र युद्धनौकाएँ बन लीं। उसी एक हजार नौकाओं के कारण, कार्तवीर्य को सहस्त्र हाथोंवाला (‘सह्स्त्रार्जुन’) नामक उपाधि मिली । पश्चात् कार्तवीर्य ने, भार्गवों से उनकी संपूर्ण संपति मॉंगी । इस कारण कुद्ध हो कर परशुराम ने हैहयों का नाश किया, एवं नर्मदा नदी के प्रदेश में से सारे हैहय राज्य का विध्वंस किया । यही विध्वंस पुराणों में ‘निःक्षत्रिय पृथ्वी’ के नाम से वर्णित है । इस तरह ध्वस्त हैहय प्रदेश में परशुराम ने नया राज्य स्थापित किया, एवं पश्चिम समुद्र किनारे के भृगुकच्छ से लेकर कन्याकुमारी तक सारी प्रदेश नया बसाया । यही प्रदेश ‘शूर्पारक’ नाम से प्रसिद्ध हुआ, एवं पश्चिम के व्यापारविनिमय का केंद्रस्थान बन गया । हैहयों के विनाश से, पश्चिमी विदेशों का व्यापार उत्तर हिंदुस्थान के आर्य लोगों के हाथों से निकल गया, एवं दाक्षिणत्य द्रविडों के हाथों में वह चला गया [करंदीकर-‘नवाकाळ’ निबंध, १९३२-३३ ई.] । फिर भी परशुराम हैहयों का संपूर्ण विनाश न कर सका । परशुराम के पश्चात्, हैहय लोग ‘तालजंघ’ सामूहिक नाम से पुनः एकत्र हुये । ‘तालजंघ’ सामूहिक नाम से पुनः एकत्र हुये । तालजंघों में पॉंच उपजातियों का समावेश था, जिनके नाम थेः---वीतहोत्र, शर्यात, भोज, अवन्ति, कुण्डरिक [मत्स्य.४३.४८-४९];[ वायु. ९४.५१-५२] । उन लोगों ने कान्यकुब्ज, कोमल, काशी आदि देशों पर बार बार आक्रमण किये, एवं कान्यकुब्ज राज्य का संपूर्ण विनाश किया । ऐतिहासिक दृष्टि से, परशुराम जामदग्न्य ,राम दाशर्थि एवं पांडवों से बहुत ही पूर्वकालीन हैं । फिर भी ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ के अनेक कथाओं में परशुराम की उपस्थिति का वर्णन प्राप्त है ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  सौभपति शाल्व के हाथों से परशुराम पराजित हुआ । फिर कृष्ण ने शाल्व का वध किया [म.स.परि.१.क्र.२१. पंक्ति. ४७४-४८५] । करवीर श्रुंगाल के उन्मत्त कृत्यों की शिकायत परशुराम ने बलराम एवं कृष्ण के पास की । फिर उसका वध भी कृष्ण ने किया [ह.वं.२.४४] । सैंहिकेय शाल्व का वध भी कृष्ण ने परशुराम के कहने पर ही किया [ह.वं.२.४४] । सैंहिकेय शाल्व के वध के बाद, शंकर ने परशुराम को ‘शंकरगीता’ का ज्ञान कराया [विष्णु-धर्म.१.५२.६५] । जरासंघ के आक्रमण से डर कर, बलराम तथा कृष्ण राजधानी के लिये नये स्थान ढूँढ रहे थे । उसे समय उनकी भेंट परशुराम से हुयी थी । परशुराम ने उन्हें गोमंत पर्वत पर रह पर जरासंध से दुर्गयुद्ध करने की सलाह दी [ह.वं,.२.३९] । महेंद्र पर्वत पर जब यह रहता था, तब अष्टमी तथा चतुर्दशी के ही दिन केवल अभ्यागतों से मिलता था [म.व.११५.६] । पूर्व समुद्र की ओर भ्रमण करते हुये युधिष्ठिर की भेंट एक दिन परशुराम से हुयी थी । बाद में युधिष्ठिर गोदावरी नदी के मुख की ओर चला गया [म.व.११७-११८] । शूर्पारक बसाने के पूर्व परशुराम महेंद्र पर्वत पर रहता था । उसके उपरांत शूर्पारक में रहने लगा [ब्रह्मांड. ३.५८] । भीष्माचार्य को परशुराम ने अस्त्रविद्या सिखायी थी । भीष्म अम्बा का वरण करे, इस हेतु से इन गुरुशिष्यओं का युद्ध भी हुआ था । एक महीने तक युद्ध चलता रहा. अन्त में परशुराम ने भीष्म को पराजित किया [म.उ.१८६.८] । परशुराम ने क्षत्रियों की हिंसा की । उसके विषय में भीष्म ने इसे मुँहतोड जवाब दिया था । अपने को ब्राह्मण बताकर कर्ण ने परशुराम से शिक्षा प्राप्त की थी । बाद में परशुराम को यह भेद पता चला, और उन्होंने उसे शाप दिया । परशुराम ने द्रोण को ब्रह्मास्त्र सिखाया था । दंभोद्‌भव राक्षस की कथा सुनाकर, परशुराम ने दुर्योधन को युद्ध से परावृत्त करने का प्रयत्न किया था [म.उ.८४] । बम्बई के वाल्‌केश्वर मंदिर के शिवलिंग की स्थापना परशुराम ने की थी [स्कंद. सह्याद्रि.२-१]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  रामायण में भी परशुराम क निर्देश कई बार आया है । सीता-स्वयंवर के समय राम ने शिव के धनुष को तोड दिया । अपने गुरु शिव का, अपमान सहन न कर, परशुराम राम से युद्ध करने के लिये तत्पर हुआ । किंतु उस युद्ध में राम ने परशुराम को पराजित किया, एवं परशुराम के तपसामर्थ्य नष्ट होने का उसे शाप दिया [वा.रा.बा.७४-७६]
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम के महाभारत एवं रामायण में प्राप्त निर्देश कालविपर्यास हैं अतएव अनैतिहासिक प्रतीत होते है । जैसे पहले ही कहा है, परशुराम रामायण एवं महाभारत के बहुत ही पूर्वकालीन थे । इस कालविषर्यास का स्पष्टीकरण महाभारत एवं पुराणों में, परशुराम को चिरंजीव कह कर दिया गया है । संभव है कि, प्राचीन काल के परशुराम की महत्ता एवं ब्रह्मतेज का रिश्ता महाभारत एवं रामायण के पात्रों से जोडने के लिये यह ‘चिरंजीवत्व’ की कल्पना प्रसृत की गयी है ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  परशुराम के जीवन से संबंधित अनेक स्थान भारतवर्ष में उपलब्ध हैं । वहॉं परशुराम की उपासना आज भी की जाती है । उनमें से कई स्थान इस प्रकार हैं---
  1. जमदाग्नि आश्रम (पंचतीर्थी)---परशुराम का जन्मस्थान एवं सहस्त्रार्जुन का वधस्थान । यह उत्तरप्रदेश में मेरठ के पाद हिंडन (प्राचीन ‘हर’) नदी के किनारे है । यहॉं पॉंच नदियों का संगम है । इसलिये इसे ‘पंचतीर्थी’ कहते है । यहॉं ‘परशुरामेश्वर’ नामक शिवमंदिर है ।
  2. मातृतीर्थ (महाराष्ट्र में स्थित आधुनिक ‘माहुर’ ग्राम)---रेणुका दहनस्थन । 
  3. महेंद्रपर्वत (आधुनिक ‘पूरबघाट)---परशुराम का तपस्यास्थान क्षत्रियों का संहर करने के पश्चात् परशुराम यहॉं रहता था । परशुराम ने समस्त पृत्घ्वी कश्यप को दान में दी, उस समय महेंद्रपर्वत भी कश्यप को दान में प्राप्त हुआ । फिर परशुराम’ शूर्पारक’ के नये बस्ती में के लिये गया ।
  4. शूर्पारक (बंबई के पास स्थित आधुनिक ‘सोपारा’ग्राम)---परशुराम का तपस्यास्थान । समुद्र को हटा कर, परशुराम ने इस स्थान को बसाया था ।
  5. गोकर्णक्षेत्र (दक्षिण हिंदुस्थान में कारवार जिले में स्थित ‘गोकर्ण’ग्राम)---परशुराम का तपस्यास्थान । समुद्र में डुबते हुये इस क्षेत्र का रक्षण परशुराम ने किया था ।
  6. जंबुवन (राजस्थान में कोटा के पास चर्मण्वती नदी के पास स्थित आधुनिक ‘केशवदेवराय-पाटन’ ग्राम)---परशुराम का तपस्यास्थान । इक्कीस बार पृथ्वी निःक्षत्रिय करने के बाद परशुराम ने यहॉं तपस्या की थी ।
  7. परशुरामतीर्थ (नर्मदा नदी के मुख में स्थित आधुनिक ‘लोहार्‍या’ ग्राम)---परशुराम का तपस्या स्थान ।
  8. परशुरामताल (पंजाब में सिमला के पास ‘रेणुका-तीर्थ’ पर स्थित पवित्र तालाव)---परशुराम के पवित्रस्थान । यहॉं के पर्वत का नाम ‘जमदग्निपर्वत’ है ।
  9. रेणुकागिरि (अलवार-रेवाडी रेलपार्ग पर खैरथल से ५ मील दूर स्थित आधुनिक ‘रैनागिरि’ ग्राम)--परशुराम का आश्रमस्थान ।
  10. चिपलून (महाराष्ट्र में स्थित आधुनिक चिपलून ग्राम)---परशुराम का पवित्रस्थान । यहॉं परशुराम का मंदिर है ।
  11. रामह्रद (कुरुक्षेत्र के सीमा में स्थित एक तीर्थस्थान)---परशुराम का तीर्थ स्नान । यहॉं परशुराम ने पॉंच कुंडों की स्थापना की थी [म.व.८१.२२-३३] । इसे ‘संपतपंचक’ भी कहते है ।

परशुराम (जामदग्न्य) n.  वैशाख शुध तृतीया के दिन, रात्रि के पहले ‘प्रहर’ में परशुरामजयंती का समारोह किया जाता है [धर्मसिंधु. पृ.९] । यह समारोह अधिक तर दक्षिण हिंदुस्थान में होता है, सौराष्ट्र में यह नहीं किया जाता है । इस समारोह में, निम्नलिखित मंत्र के साथ, परशुराम को ‘अर्घ्य’ प्रदान किया जाता है--- जमदग्निसुतो वीर क्षत्रियान्तकरः प्रभो । ग्रहाणार्घ्य मया दत्तं कृपया परमेश्वर ॥
परशुराम (जामदग्न्य) n.  ‘परशुरामकल्पसूत्र’ नामक एक तांत्रिकसांप्रदाय का ग्रंथ परशुराम के नाम से प्रसिद्ध है । ‘परशुरामप्रताप’ नामक और भी एक ग्रंथ उपलब्ध है ।
परशुराम (जामदग्न्य) n.  मलाबार में अभी तक ‘परशुराम शक’ चालू है । उस शक का वर्ष सौर रीति का है, एवं वर्षारंभ ‘सिंहमास’ से होता है । इस शक का ‘चक्र’ एक हजार साल का होता है । अभी इस शक का चौथा चक्र चालू है । इस शक को ‘कोल्लमआंडु’ (पश्चिम का वर्ष) कहते है [भा. ज्यो. ३७७]

Puranic Encyclopaedia  | en  en |   | 
PARAŚURĀMA   An incarnation of Mahāviṣṇu, as man.
1) Genealogy.
Descending in order from Māhāviṣṇu-- Brahmā-Bhṛgu-Cyavana-Ūrva-Ṛcīka-Jamadagni- Paraśurāma.
2) Cause for incarnation.
Once god Agni went to Kārtavīryārjuna and begged for food. The king allowed him to take from his vast territory as much food as he wanted from anywhere he liked. Agni started burning forests and mountains and consuming them. Deep inside. one of the forests a sage named Āpava was performing penance and the fire burnt the āśrama of Āpava also. Enraged at this the sage cursed thus: “Kārtavīryārjuna is at the root of this havoc. The arrogance of Kṣatriyas has increased beyond limits. Mahāviṣṇu would therefore be born on earth as Paraśurāma to destroy this arrogance of the Kṣatriyas.” Accordingly Māhāviṣṇu was born as Paraśurāma in the Bhārgava race. [Chapter 40, Harivaṁśa]. Brahmāṇḍa Purāṇa gives another version: Viṣṇu promised Bhūmidevī (mother earth) that he would be born on earth as Paraśurāma when Bhūmidevī went to him in the form of a cow and complained to him about the atrocities of the wicked Kṣatriya kings.
3) Birth.
Paraśurāma was born as the son of sage Jamadagni of his wife Reṇukā. Their āśrama was on the shores of the Narmadā river. Reṇukā, mother of Paraśurāma, was the daughter of King Prasenajit. She had four sons even before the birth of Paraśurāma [Chapter 58, Brahmāṇḍa Purāṇa].
4) Boyhood and education.
Paraśurāma spent his boyhood with his parents in the āśrama. An important event in his life then was his slaying his mother at the behest of his father. (See under Jamadagni, Para 6). Though Paraśurāma was a brahmin there is nothing on record to show that he did study the Vedas. Perhaps he might have had the Vedic instructions from his father during his life with him. He had even from the beginning shown an interest in learning Dhanurvidyā (archery). For obtaining proficiency in archery he went to the Himālayas and did penance to please Śiva for many years. Pleased at his penance Śiva on several occasions extolled the virtues of Paraśurāma. At that time the asuras (demons) acquired strength and attacked the devas. The devas complained to Śiva. Śiva called Paraśurāma and asked him to fight with and defeat the semdon. Paraśurāma was without weapons and he asked Śiva how he could go and fight the demons without weapons. Śiva said: “Go with my blessings end you will kill your foes.” Para urāma did not wait for a moment. When Śiva thus assured him of success, on he went straight to fight with the demons. He defeated the asuras and came back to Śiva when the latter gave him many boons and divine weapons. Till that time his name was only Rāma and he became Paraśurāma because among the weapons given to him by Śiva was a weapon named Paraśu (axe). There is a story behind this weapon Paraśu. Once Śiva was not invited for a Yāga conducted by Dakṣa. An angered Śiva threw his spike into the Yāgaśālā (sacrifical hall). The spike spoiled the Yāga and smashed the hall and after that roamed about aimlessly for sometime and then turned towards Badaryāśrama where at that time Naranārāyaṇas were engaged in penance. The spike went straight to the heart of sage Nārāyaṇa. Nārāyaṇa made the defiant sound ‘hum’ (huṁkāra) and the spike turned away. Śiva felt angry for thus showing disrespect to his spike and he attacked the sage. At once Nararṣi plucked a grass and reciting a mantra threw it at Śiva. The grass became a Paraśu (axe) and it attacked Śiva. Śiva broke it into two. Then Nara- Nārāyaṇas bowed before him and worshipped him. Thereafter the two pieces of the Paraśu remained with Śiva. It was one of these that Śiva gave to Paraśurāma. When Paraśurāma was returning happy and glorious with boons and weapons he got on his way a disciple named Akṛtavraṇa. (See under Akṛtavraṇa). Guru and disciple lived in an āśrama and Paraśurāma became a noted Guru in dhanurveda (archery). [Chapter 34, Karṇa Parva];[ Chapter 49, Śānti Parva ];[ Chapter 18, Anuśāsana Parva].
5) Instruction in archery.
According to Purāṇas Paraśurāmā did not spend his life as an instructor in archery. There are statements, however, mentioning that Karṇa and Droṇa took instructions from him. Pretending to be a brahmin Karṇa commenced taking instructions in archeṛy from Paraśurāma. When his education was complete Paraśurāma taught him Brahmāstra. One day tired after a long walk in the forests Paraśurāma took rest placing his head on the lap of Karṇa and soon fell asleep. At that time a beetle came and started sucking blood from the thigh of Karṇa. Karṇa remained still, bearing the pain, lest any movement of his body should disturb the sleep of his Guru. Blood was oozing from his thinghs and it slowly made the body of the Guru also wet. Paraśurāma woke up and the sight of the bleeding thigh and the calm demeanour of Karṇa raised doubts in him. He questioned Karṇa saying that no brahmin could ever bear such a pain with such calmness and Karṇa had to tell the truth. Then Paraśurāma cursed him for deceit against his Guru saying that he would never be able to remember the Brahmāstra when the time to use it came. There is a story behind Alarka, the beetle that bit Karṇa. This beetle was in his previous birth a demon named Daṁśa. Daṁśa once tried to molest the wife of the sage Bhṛgu. The Maharṣi cursed him and made him into a beetle. On his request for mercy he said he would get release from the curse by Paraśurāma. So the beetle became the Rākṣasa again and left the place. Karṇa took leave of Paraśurāma and went to Hastināpura. [Śānti Parva, Chapter 3]. Another famous disciple of Paraśurāma was Droṇa. There is a story behind Droṇa getting Dhanurveda from Paraśurāma. After travelling throughout the world exterminating the Kṣatriya race Paraśurāma gave all his wealth to Kaśyapa. On hearing that Paraśurāma was giving away all his riches as gifts to brahmins Droṇa rushed to Mahendraparvata to see Paraśurāma. By then Paraśurāma had distributed all his wealth excepting Dhanurveda. Paraśurāma called Droṇa to his side and said that only two things remained with him, his body and Dhanurveda. Droṇa, he added, could take anyone of the two and then Droṇa took Dhanurveda from him. After that Paraśurāma went to Mahāraṇya for the sake of penance. [Chapter 130, Ādi Parva]. There are some apparent inconsistencies in the above stories: It is said Droṇa taught Dhanurveda to Karṇa. Droṇa was the last person to receive Dhanurveda from Paraśurāma because the latter, surrendering his Dhanurveda in entire, left for the forests for doing penance. Then, when did Karṇa learn Dhanurveda from Paraśurāma? Could it be before Droṇa went to Paraśurāma? Then it must be accepted that Droṇa had not studied under Paraśurāma when he was teaching the the Pāṇḍavas and Kauravas. He learnt it from somewhere before he became the preceptor of the Pāṇḍavas. Karṇa after studying under Droṇa for some time went to Paraśurāma for higher studies and Droṇa approached Paraśurāma after Karṇa had left him.
6) The destruction of the Kṣatriyas.
The most important event of his life was the total extermination of the Kṣatriya race. The Purāṇic belief is that he went round the world eighteen times to massacre the Kṣatriyas. In many places in the Purāṇas it is stated that Paraśurāma fought against the Kṣatriyas eighteen times. But in chapter 29 of Aśvamedha Parva it is stated that Paraśurāma fought against the Kṣatriyas twentyone times So it is to be surmised that Paraśurāma fought eighteen big battles and three minor ones. There are some old stories to explain this revengeful enmity of Paraśurāma towards the Kṣatriyas.
(1) Family enmity.
The Hehaya dynasty was the most powerful kingly race then. Paraśurāma was a descendant of Bhṛgu, a brahmin sage. That is why he gets the name Bhārgava also. The Bhārgavas were for generations the family preceptors of the Hehaya kings. Taking advantage of their supreme position in the royal palace the Bhārgavas accumulated great wealth at the cost of the royal riches. Gradually the Bhārgavas rose in prosperity in inverse proportion to the decline of the Hehaya wealth. It was at the time of Ṛcīka, grandfather of Parasurāma that they touched the rock-bottom of their wealth and they found funds lacking even for the day to day administration of the state. In despair they went and requested the Ṛcīkas to lend them some money. But they hid their money and refused to give them anything. The Kṣatriya kings got angry and killed the brahmins. What stock was left of them went to the base of the Himālayas. The wife of Ṛcīka who was pregnant then kept the child in her womb for twelve years afraid to bring forth the child. After that the child came out breaking open the thigh (ūru) and so the child was called Aurva. Even at the time of his birth Aurva shone like a brilliant torch and not only that; the child cried aloud “Oh, wicked Kṣatriyas, I will kill every one of you. I heard from my mother's womb the din of the swords you raised to kill my ancestors. I will never wait for another moment to wreak vengeance on you.” The fire that emanated from the face of Aurva burnt even Devaloka. Kṣatriyas as a class came and prostrated before him. The devas came and requested him to abandon his anger and Aurva agreed. The devas picked up the fire sparks from Aurva's face and deposited them in the ocean. From those sparks put in the ocean was born Baḍavāgni alias Aurva.
(i
i) Curse of the sage.
From Aurva was born Jamadagni and from Jamadagni was born Paraśurāma. In the race of the Hehayas was born at that time a very valorous king named Kārtavīryārjuna. Once Kārtavīryārjuna gave a dinner to Agnibhagavān. Agni began to devour all the mountains and forests in the world. The burning was so indiscriminate that it burnt the āśrama of a sage named Āpava also. The sage cursed Kārtavīryārjuna saying that the thousand hands of the latter would be cut off by Pasaśurāma born in the family of Bhārgavas. From that day onwards the latent feud in him against the Bhārgavas was roused into action.
(ii
i) Varuṇa's ridicule.
Kārtavīryārjuna who got a thousand hands by a boon from a sage named Dattātreya subdued all enemies of his status and not satisfied with that he went to the shores of the ocean and challenged Varuṇa for a fight. Varuṇa came before him and very modestly admitted that he was incapable of meeting the challenge thrown and suggested that perhaps Jamadagni's son, Paraśurāma might accept the challenge and give him a fight. Hearing this Kārtavīryārjuna turned towards the āsrama of Jamadagni on the shores of the Narmadā river.
(i
v) Causes of the war (immediate).
Kārtavīryārjuna went for hunting in the forests and feeling exhausted after some time went to the āsrama of Jamadagni with his retinue. Jamadagni received them well and with the help of the Kāmadhenu (wish-yielding cow) named Suśīlā, Jamadagni gave a sumptuous feast to the King and his followers. When after the meals were over they started to take leave of the sage, Candragupta, a minister of Kārtavīryārjuna brought to the notice of the king the superior powers of the Kāmadhenu, Suśīlā. The king wanted to get the cow and asked Candragupta to tell the sage about it. Though the minister told Jamadagni about the royal desire the sage refused to part with the cow. Then the minister with the help of the other royal servants took the cow by force and the sage followed the cow weeping. On the way Candragupta beat Jamadagni to death and brought the cow to the presence of the king. The king was pleased and the royal hunting party returned to the palace happy. Jamadagni's wife Reṇukā went in search of her husband and to her grief found him lying dead. Reṇukā wept beating her breast twentyone times and by that time her son Para urāma came there and he declared that he would travel round the world twentyone times, the number of times his mother beat her breast, to kill and exterminate the Kṣatriyas from this world. Then the dead body of Jamadagni was placed on a pyre and they were singing Viṣṇugītā before placing fire on the pyre when Śukramuni appeared there and brought Jamadagni to life by invoking the art of Mṛtasañjīvanī. By that time Suśīlā somehow escaped from the custody of the King and came there without the calf. Then Paraśurāma vowed that he would bring the calf soon and taking with him his disciple Akṛtavraṇa he left for the city of Māhiṣmatī the abode of Kārtavīryārjuna. There they fought a grim battle and after killing Kārtavīryārjuna and many of his followers brought back the calf. To atone for the sin of this massacre Jamadagni advised his son to go and perform penance in Mahendragiri. Taking advantage of the absence of Paraśurāma from the āśrama, Śūrasena son of Kārtavīryārjuna, with his followers went to the āśrama of Jamadagni and chopped off his head. Paraśurāma returned from Mahendragiri at once and cremated the dead body of his father. Reṇukā, his mother, jumped into the funeral pyre and abandoned her life. From that moment onwards started Paraśurāma's fierce programme of mass massacre of the Kṣatriyas.
(v) Victory march.
Paraśurāma's world-tour was confined to an all-Bhārata tour. The wars of Paraśurāma are not described in detail in the Purāṇas. They mention thaṭ Paraśurāma killed the Kings of Cola, Cera and Pauṇḍra. To stop the birth of Kṣatriyas in future Paraśurāma destroyed even the embryo in the wombs of Kṣatariya women. Then the Bhārgava ancestors like Ṛcīka and others came to the sky and requested Paraśurāma to stop this slaughter. They said: “Oh son, Rāma, stop this slaughter. What good do you get by killing innocent Kṣatriyas?” By that time Paraśurāma had made twentyone rounds around Bhārata killing the Kṣatriyas. [Chapter 64, Ādi Parva];[ Chapter 38, Sabhā Parva];[ Chapter 116, Vana Parva];[ Chapter 49, Śānti Parva ];[ 10 chapters from chapter 83 of Brahmāṇḍa Purāṇa].
7) Samantapañcakanirmāṇa.
Samantapañcaka is Kurukṣetra itself where the great battle was conducted. This is a holy place and it was Paraśurāma who constructed it. He stored the blood of the Kṣatriyas he killed in the twentyone rounds of killing in five lakes in Samantapañcaka. He offered blood to the Manes in those lakes. The Manes led by Ṛcīka appeared before him and asked him to name any boon he wanted. Then Paraśurāma said, “Revered Manes, if you are pleased with me you must absolve me from the sin of this mass massacre of the Kṣatriyas and declare the five lakes where I have stored their blood as holy.” The Manes declared, “Let it be so.” From then onwards the place became holy under the name Samantapañcaka. At the end of the Dvāparayuga and the beginning of Kaliyuga a great battle lasting for eighteen days took place at this holy place between the Pāṇḍavạs and the Kauravas. [Chapter 2, Ādi Parva].
8) Atonement.
To atone for the sin of slaughtering even innocent Kṣatriyas, Paraśurāma gave away all his riches as gifts to brahmins. He invited all the brahmins to Samantapañcaka and conducted a great Yāga there. The chief Ṛtvik (officiating priest) of the Yāga was the sage Kaśyapa and Paraśurāma gave all the lands he conquered till that time to Kaśyapa. Then a platform of gold ten yards long and nine yards wide was made and Kaśyapa was installed there and worshipped. After the worship was over according to the instructions from Kaśyapa the gold platform was cut into pieces and the gold pieces were offered to brahmins. When Kaśyapa got all the lands from Paraśurāma he said thus:--“Oh Rāma, you have given me all your land and it is not now proper for you to live in my soil. You can go to the south and live somewhere on the shores of the ocean there.” Paraśurāma walked south and requested the ocean to give him some land to live. Varuṇa then asked him to throw a winnow into the ocean. There is a legend saying that it was a Paraśu that Paraśurāma threw. Paraśurāma threw the sieve (śūrpa) and the ocean gave way to land for a distance where the winnow fell from where he stood. This is the place Śūrpāraka now known as Kerala. (Śūrpa = Winnowing basket). After giving this land also to the brahmins, Paraśurāma went and started doing penance at Mahendragiri. [Chapter 130, Ādi Parva];[ Chapter 117, Vana Parva ];[ Chapter 49, Śānti Parva].
9) Other exploits of Paraśurāma.
(i) Meets Śrī Rāma.
Śrī Rāma and Lakṣmaṇa were returning to Ayodhyā from Mithilāpurī after the marriage along with the sage Vasiṣṭha through a deep forest when Paraśurāma blocked their way and addressing Śrī Rāma said thus, ‘Oh Rāma, son of Daśaratha, I heard that you broke during the marriage of Sītā the great Śaiva bow of the palace of Janaka. It was a Śaiva bow and I have now come here to test your prowess. I am giving you a Vaiṣṇava bow now. Can you string this bow?” Vasiṣṭha tried his best to pacify Paraśurāma. But Paraśurāma without heeding it started describing the story and greatness of the Śaiva bow and the Vaiṣṇava bow. (See under Vaiṣṇava bow). Then Śrī Rāma took the bow from Paraśurāma and started to string it. The brilliance of Śrī Rāma dazzled him and he stood dumbfounded at his skill. Paraśurāma was immensely pleased and he blessed Śrī Rāma. After that he went again to Mahendragiri to perform penance. This same story is told in Kamba Rāmāyaṇa with some slight changes:--Paraśurāma did not like Śrī Rāma breaking the bow of his Guru Śiva. So an angered Paraśurāma blocked the way of Śrī Rāma and challenged him to string and take aim with the mighty Vaiṣṇava bow he (Paraśurāma) was carrying with him then. Śrī Rāma with perfect ease took the bow, strung it, and taking the missile asked Paraśurāma to show the target. Paraśurāma was astonished and was in a fix. The missile could destroy even the entire Universe. So Paraśurāma asked Rāma to aim at the accumulated tapobala (power accrued by penance) of his self and Rāma did so. Then Paraśurāma surrendered to Śrī Rāma the Vaiṣṇava bow and arrow and the Vaiṣṇava tejas (divine brilliance) in him. Paraśurāma after having carried out the purpose of his incarnation gave instructions to Śrī Rāma to continue the purpose of his incarnation and then after blessing Śrī Rāma went again to do penance at his holy āśrama. This same story is told by the sage Lomaśa to the Pāṇḍavas during their exile in the forests. This story is much different from the previous ones: “When the fame that Śrī Rāma was the best of Kings spread far and wide Paraśurāma once went to see Śrī Rāma. Giving him the bow and arrow with which he had done the mass massacre of the Kṣatriyas he challenged him to string it and take aim. With a smile Śrī Rāma did so and then Paraśurāma said Rāma should draw the string up to his ears. Śrī Rāma got angry and then on the face, which became fierce, by his anger, Paraśurāma saw besides himself, Āditya-Vasu-Rudras, Sādhyas, Bālakhilyas, Devarṣis, oceans, mountains, the Vedas and all such things of this universe. Śrī Rāma sent out his missile from the bow. The whole universe was thrown into chaos. Thunder and lightning rocked the world. Heavy rains flooded the whole land space. Burning stars and meteors fell to the ground. Paraśurāma then knew that Śrī Rāma was the incarnation of Mahāviṣṇu and he stood bowing before him. Ashamed of his defeat he took leave of Śrī Rāma and went to Mahendragiri. When he reached there he found he had lost all his brilliance. Then the manes appeared and advised him to go and bathe in the river Vadhūsarā. Accordingly Paraśurāma went and bathed in the river and regained his lost brilliance. [Chapter 99, Vana Parva].
(i
i) Paraśurāma and Śrī Kṛṣṇa.
The Purāṇas describe two important occasions when Paraśurāma met Śrī Kṛṣṇa. The first meeting was at the mountain of Gomanta. Once Śrī Kṛṣṇa and Balarāma with a view to enjoying the abundance of Nature went to the beautiful mountain of Gomanta and ascended to its top. On their way they met Paraśurāma engaged in penance there. They exchanged greetings and talked to each other for some time. Then Paraśurāma requested Śrī Kṛṣṇa to kill Śṛgālavāsudeva, King of Karavīra on the base of that mountain. Śrī Kṛṣṇa promised to do so and left the place carrying with him the blessings of the sage. The second meeting was when Kṛṣṇa was going to the court of the Kauravas as a messenger of the Pāṇḍavas. On his way Śrī Kṛṣṇa saw a company of sages coming and, alighting from his chariot Kṛṣṇa talked with them. Paraśurāma who was in that company then embraced Kṛṣṇa and said that he should give a true picture of the situation to the Kauravas when he was conducting his mission. The sages blessed Kṛṣṇa and wished Kṛṣṇa all success in his mission. [Chapter 83, Udyoga Parva];[ 10th Skandha, Bhāgavata].
10) Other details.
(i) Paraśurāma along with a few other sages was present at the Sabhāpraveśa of Dharmaputra. [Śloka 11, Chapter 53, Sabhā Parva].
(ii) Paraśurāma was present at the course of the Kauravas when Śrī Kṛṣṇa was speaking to Dhṛtarāṣṭra on behalf of the Pāṇḍavas. When the Kauravas did not reply the questions put by Śrī Kṛṣṇa, Paraśurāma rose up to tell a story to illustrate the evils resulting from the arrogance of man. There was once a King called Dambhodbhava who was very arrogant because of his great strength. He wanted to diffuse his energy by fighting and laboured much to get good opponents and roamed about in search of fighters. One day the brahmins directed him to Naranārāyaṇas and accordingly Dambhodbhava went to their āśrama at Badarikā and challenged them for a fight. They refused to fight and yet the King showered arrows on them. Then the sages took a few blades of the iṣīkā grass and threw them at him. They filled the sky as great missiles and the King begged to be pardoned and prostrated before the sages. They sent back the be- fooled King to his palace. [Chapter 96, Udyoga Parva].
(iii) Once a grim battle was waged between Paraśurāma and Bhīṣma. (See under Ambā).
(iv) Paraśurāma sits in the court of Yama. [Śloka 19, Chapter 8, Sabhā Parva].

Aryabhushan School Dictionary | mr  en |   | 
 m  A hero and demigod; and the sixth Avatar of विष्णु.

Related Words

: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Keyword Pages

  |  
  |  

Related Pages

  |  
  |  
: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP