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चंद्रशर्मन्


चंद्रशर्मन् n.  मायापुरी का अग्निगोत्रज ब्राह्मण । यज देवशर्मन् का शिष्य था । देवशर्मन् की कन्या गुणवती इसकी पत्नी थी । एक बार देवशर्मन् तथ यह अरण्य में दर्भ समिधा लाने के लिये गये । एक राक्षस ने इन दोनों के प्राण लिये । अत्यंत धार्मिक होने के कारण यह वैकुंठ गया । यह कृष्ण के समय अक्रूर नाम से प्रसिद्ध हुआ [पद्म. कु. ८८-८९]
चंद्रशर्मन् II. n.  सूर्यवंश का एक राजा । यह कुरुक्षेत्र में रहता था । एक बार सूर्यग्रहण के समय, तुलापुरुषदान देने की इछा से, इसने एक ब्राह्मण को बुलाया । परंतु वह निंद्य दान होने के कारण, तुलापुरुषदान करते ही उस में से एक चंडालयुग्म उत्पन्न हुआ । इसीमें बाह्मण ने गीता के नवम अध्याय का पाठ प्रारंभ किया था । अतः उसके प्रत्येक अक्षर से एकेक विष्णुदूत उत्पन्न हो कर, उन्होनें इस चांडालयुग्म को भगा दिया । वह चंडालयुग्म मनुष्यवेषधारों पाप एवं निंदा थे [पद्म. उ. १८३]
चंद्रशर्मन् III. n.  मागध देश का ब्राह्मण । इसने गुरुहत्या की थी । विदुर के साथ कलिंजर पर्वत जाने पर उसे एक सिद्ध मिला । उसके उपदेश से इसने सोमवती अमावास्या के दिन, पुष्करतीर्थ में स्नान किया तथा यह शुद्ध हुआ [पद्म. भो. ९१-९२]

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