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अशिलता

( प्र . ) असिलता . तरवार पहा . दळ अशिलता धरुन करा पाई । - ऐपो २६८ . [ सं . असि + लता ]

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व्यास (पाराशर्य)

  • n. एक सुविख्यात आचार्य, जो वैदिक संहिताओं का पृथक्करणकर्ता, वैदिक शाखाप्रवर्तकों का आद्य आचार्य, ब्रह्मसूत्रों का प्रणयिता, महाभारत पुराणादि ग्रंथो का रचयिता, एवं वैदिक संस्कृति का पुनरुज्जीवक तत्त्वज्ञ माना जाता है । यह सर्वज्ञ, सत्यवादी, सांख्य, योग, धर्म आदि शास्त्रों का ज्ञाता एवं दिव्यदृष्टि था [म. स्व. ५. ३१-३३] । वैदिक, पौराणिक एवं तत्त्वज्ञान संबंधी विभिन्न क्षेत्रों में व्यास के द्वारा किये गये अपूर्व कर्तुत्व के कारण, यह सर्व दृष्टि से श्रेष्ठ ऋषि प्रतीत होता है । प्राचीन ऋषिविषयक व्याख्या में, असामान्य प्रतिभा, क्रांतिदर्शी द्रष्टापन, जीवनविषयक विरागी दृष्टिकोण, अगाद्य विद्वत्ता, एवं अप्रतीम संगठन-कौशल्य इन सारे गंणों का सम्मिलन आवश्यक माना जाता था । इन सारे गुणों की व्यास जैसी मूर्तिमंत साकार प्रतिमा प्राचीन भारतीय इतिहास में क्वचित् ही पायी जाती है । इसी कारण, पौराणिक साहित्य में इसे केवल ऋषि ही नहीं, किन्तु साक्षात् देवतास्वरूप माना गया है । इस साहित्य में इसे विष्णु का [वायु. १.४२-४३];[ कूर्म. १.३०.६६];[ गरुड. १.८७.५९]; शिव का [कूर्म. २.११.१.३६]; ब्रह्मा का [वायु. ७७.७४-७५];[ ब्रह्मांड. ३.१३.७६]; एवं ब्रह्मा के पुत्र का [लिंग. २.४९.१७] अवतार कहा गया है । 
  • सनातन हिंदूधर्म का रचयिता n. श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त सनातन हिंदू धर्म का व्यास एक प्रधान व्याख्याता कहा जाता है । व्यास महाभारत का केवल रचयिता ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का एक ऐसा आचार्य था कि, जिसने वैदिक हिंदूधर्म में निर्दिष्ट समस्त धर्मतत्त्वों को बदलते हुए देश काल-परिस्थिति के अनुसार, एक बिल्कुल नया स्वरूप दिया। भगवद्गीता जैसा अनुपम रत्न भी इसकी कृपा से ही संसार को प्राप्त हो सका, जहाँ इसने श्रीकृष्ण के अमर संदेश को संसार के लिए सुलभ बनाया। इसी कारण युधिष्ठिर के द्वारा महाभारत में इसे ‘भगवान्’ उपाधि प्रदान की गयी है-- भगवानेव नो मान्यो भगवानेव नो गुरुः।। भगवानस्य राज्यस्य कुलस्य च परायणम् ।। [म. आश्र. ८.७] ।(भगवान् व्यास हमारे लिये अत्यंत पूज्य, एवं हमारे गुरु है । हमारे राज्य एवं कुल के वे सर्वश्रेष्ठ आचार्य हैं) । 
  • वैदिक साहित्य में n. वैदिक-संहिता साहित्य में व्यास का निर्देश अप्राप्य है । ‘सामविधान ब्राह्मण’ में इसे ‘पाराशर्य’ पैतृक नाम प्रदान किया गया है, एवं इसे विष्वकूसेन नामक आचार्य का शिष्य कहा गया है [सा. ब्रा. १.४.३३७] । तैत्तिरीय आरण्यक में भी महाभारत के रचयिता के नाते व्यास एवं वैशंपायन ऋषियों का निर्देश प्राप्त है [तै. आ. १.९.२] । वेबर के अनुसार, शुक्ल-यजुर्वेद की आचार्यपरंपरा में पराशर एवं उसके वंशजों का काफ़ी प्रभुत्व से ही प्रतीत होता है । बौद्धसाहित्य में बुद्ध के पूर्वजन्मों में से एक जन्म का नाम ‘कण्ह दीपायन’ (कृष्ण द्वैपायन) दिया गया है [वेबर. पृ. १८४] । इससे प्रतीत होता है कि, बौद्ध साहित्य की रचनाकाल में व्यास का कृष्ण द्वैपायन नाम काफ़ी प्रसिद्ध हो चुका था । 
  • पाणिनीय व्याकरण में n. पाणिनि के अष्टाध्यायी में व्यास का निर्देश अप्राप्य है, एवं महाभारत शब्द का भी वहाँ एक ग्रंथ के नाते नहीं, बल्कि भरतवंश में उत्पन्न युधिष्ठिर, आदि श्रेष्ठ व्यक्तियों को उद्दिश्य कर प्रयुक्त किया गया है [पा. सू. ६.२.३८] । पतंजलि के व्याकरण-महाभाष्य में महाभारत कथा का निर्देश अनेकबार प्राप्त है, इतना ही नहीं, शुक वैयासिक नामक एक आचार्य का निर्देश भी वहॉं प्राप्त है, जिसे व्यास का पुत्र होने के कारण ‘वैयासकि’ पैतृक नाम प्राप्त हुआ था [महा. २.२५३] । इससे प्रतीत होता है कि, महाभारत का निर्माण पाणिनि के उत्तर काल में, एवं पतंजलि के पूर्वकाल में उत्पन्न हुआ होगा। 
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