संक्षिप्त विवरण - शरीर शोधन

कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


जिन्हें पित्त की अधिक शिकायत रहती है , उनके लिये गजकर्णी या कुजल -क्रिया लाभदायक रहती है । इस क्रिया में प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होने के बाद पर्यन्त मात्र में नमक मिश्रित कुनकुना जल पीकर फिर वमन कर दिया जाता हैं । इसमे आमाशयस्थ पित्त का शोधन होता है । जिन्हें मन्दाग्नि की शिकायत है या जिनका स्वास्थ्य उत्तम भोजन करने पर भी सुधरता नहीं है , उन्हें अग्निसार नामक क्रिया का अभ्यास करना चाहिये । इस क्रिया में नाभिग्रन्थि को बार -बार मेरु -पृष्ठ में लगाना होता हैं । एक सौं बार लगा सकने का अभ्यास हो जाने पर समझना चाहिये कि इस क्रिया में परिपक्वता प्राप्त हो गयी है । अतः यह सभी प्रकार के उदर -रोगोम को दूर करने में सहायक हैं ।

अष्टाङुयोग से रोग निवारण

आसन का अभ्यास शरीर से जडता , आलस्य एवं चञ्चलता को दूर कर सम्पूर्ण स्नायु -संस्थान एवं प्रत्येक अङु को पुष्ट के लिये होता है । इसके अभ्यास से शरीर के अङो के सभी भागों में एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म नाडियों में रक्त पहुँचता है , सभी ग्रन्थियाँ सुचारुरुप से कार्य करती है । स्नायु -संस्थान बलवान् ‍ हो जाने पर साधक काम , क्रोध , भय आदि के आवेगों को सहने में समर्थ होता है । वह मानस -रोगी नहीं बनता । शरीर का स्वास्थ्य , मस्तिष्क , मेरुदण्ड , स्नायु -संस्थान , ह्रदय एवं फेफडे तथा उदर के बलवानू होने निर्भर है । अतःआसनों का चुनाव इन पर पडने वाले प्रभावों को दृष्टि में रखकर करना चाहिये । जिसका जो अङ कमजोर हो उसे सार्वाङिक व्यायाम के आसनों का अभ्यास करने के साथ -साथ उन दुर्बल अङो को पुष्ट करने वालो आसनों का अभ्यास विशेषरुप से करना चाहिये ।

ध्यान के उपयोगी पद्‍मासन आदि को सर्वरोगनाशक इसलिये कहा जाता है कि इन आसनों से ध्यान या जप में बैठने पर शरीर में साम्यभाव , निश्चलता , शान्ति आदि गुण आ जाते हैं । जो भौतिक स्तर पर सत्त्वगुण की वृद्धि करने में सहायक होते हैं । आरोग्य की दृष्टी से किये जाने वाले आसनों में पश्चिमोत्तान , मत्स्येन्द्र , गोरक्ष , सर्वाङ , मयूर , भुजंग , शलभ , धनु , कुक्कुट , आकर्षणधनु एवं पद्‌म -आसन मुख्य हैं ।

आसनों को शनैः शनैः किया जाय , जिससे अङो एव्म नाडियों में तनाव , स्थिरता , संतुलन , सहनशीलता एवं शिथिलता आ सके । अपनी पूर्ववत स्थिति में धीरे -धीरे ही आना चाहिये । जो अङु रोगी हो , उस अङु पर बोझ डालने वाले आसनों का धर्म से युक्त हैं , उन्हें उन दिनों पेट के आसन नहीं करने चाहिये । जिस आसन का प्रभाव जिस र्ग्लैड्‌स या नाडी -चक्र पर पडता है -- आसन करते समय वहीं ध्यान केन्द्रित करना चाहिये तथा गायत्री आदि मन्त्रों का या तेज , बल , शक्ति देन वाले देने वाले मन्त्रों का यथाशक्ति स्मरण करना चाहिये । एक आसन के बाद उसका प्रतियोगी आसन भी करना चाहिये । यथा -पश्चिमोत्तान आसन का प्रतियोगी भुजंगासन और शलभासन है । हस्तपादासन का प्रतियोगी चक्रासन है । सर्वाङासन का अभ्यास आवश्यक है । सूर्यनमस्कार को अन्य आसनों के अभ्यास के पूर्व कर लेना लाभदारी है ।

i प्राणायाम का अभ्यास शरीरस्थ सभी दोषों का निराकरण कर प्राणमयकोष एवं सूक्ष्म शरीर को नीरोगं तथा पुष्ट बनाता है । नाडी - शोधन का अभ्यास करने के बाद की कुम्भक प्राणायामों का अभ्यास करना चाहिये । प्राणायाम के सभी अभ्यास युक्तिपूर्वक शनैः शनैः ही करने चाहिए तथा भस्त्रिका प्राणायाम को छोडकर सभी शेष प्राणायामों में रेचक् ‍ एवं पूरक , दोनों की क्रियाएँ बहुत धीरे - धीरे करनी चाहिये । प्रत्येक कुम्भक की अपनी - अपनी दोषनाशक विशेष शक्ति है । अतःप्रवृद्ध दोष का विचार करके ही उसके दोषनाशक कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये । सूर्यभेद प्राणायाम पित्तवर्धक , जरादोषनाशक , वातहर , कपालदोष एवं कृमिदोष को नष्ट करने वाला है । उज्जायी कफ - रोग , क्रूरवायु , अजीर्ण , जलोदर , आमवात , क्षय , कास , ज्वर एवं प्लीहा को नष्ट करता है । स्वास्थ्य एवं पुष्टि की प्राप्ति के लिये उज्जायी प्राणायाम का विशेष रुप से अभ्यास करना चाहिये । शीतली प्राणायाम अजीर्ण , कफ , पित्त , तृषा , गुल्म , प्लीहा एवं ज्वर को नष्ट करता हैं । भस्त्रिका प्राणायाम वात - पित्त - कफ - हर , शरीराग्निवर्धक एवं सर्वरोगहर हैं । व्यवहार में संध्योपासना के उपरान्त एवं जप से पूर्व नाडी - शोधन , उज्जायी एवं भस्त्रिका प्राणायाम का नित्य अभ्यास करने का प्रचलन है ।

अष्टाङ योग से रोग निवारण

आसन का अभ्यास शरीर से जडता , आलस्य एवं चञ्चलता को दूर कर सम्पूर्ण स्नायु -संस्थान एवं प्रत्येक अङु को पुष्ट के लिये होता है । इसके अभ्यास से शरीर के अङो के सभी भागों में एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म नाडियों में रक्त पहुँचता है , सभी ग्रन्थियाँ सुचारुरुप से कार्य करती है । स्नायु -संस्थान बलवान् ‍ हो जाने पर साधक काम , क्रोध , भय आदि के आवेगों को सहने में समर्थ होता है । वह मानस -रोगी नहीं बनता । शरीर का स्वास्थ्य , मस्तिष्क , मेरुदण्ड , स्नायु -संस्थान , ह्रदय एवं फेफडे तथा उदर के बलवानू होने निर्भर है । अतःआसनों का चुनाव इन पर पडने वाले प्रभावों को दृष्टि में रखकर करना चाहिये । जिसका जो अङ कमजोर हो उसे सार्वाङिक व्यायाम के आसनों का अभ्यास करने के साथ -साथ उन दुर्बल अङो को पुष्ट करने वालो आसनों का अभ्यास विशेषरुप से करना चाहिये ।

ध्यान के उपयोगी पद्‍मासन आदि को सर्वरोगनाशक इसलिये कहा जाता है कि इन आसनों से ध्यान या जप में बैठने पर शरीर में साम्यभाव , निश्चलता , शान्ति आदि गुण आ जाते हैं । जो भौतिक स्तर पर सत्त्वगुण की वृद्धि करने में सहायक होते हैं । आरोग्य की दृष्टी से किये जाने वाले आसनों में पश्चिमोत्तान , मत्स्येन्द्र , गोरक्ष , सर्वाङ , मयूर , भुजंग , शलभ , धनु , कुक्कुट , आकर्षणधनु एवं पद्‌म -आसन मुख्य हैं ।

आसनों को शनैः शनैः किया जाय , जिससे अङो एव्म नाडियों में तनाव , स्थिरता , संतुलन , सहनशीलता एवं शिथिलता आ सके । अपनी पूर्ववत स्थिति में धीरे -धीरे ही आना चाहिये । जो अङु रोगी हो , उस अङु पर बोझ डालने वाले आसनों का धर्म से युक्त हैं , उन्हें उन दिनों पेट के आसन नहीं करने चाहिये । जिस आसन का प्रभाव जिस र्ग्लैड्‌स या नाडी -चक्र पर पडता है -- आसन करते समय वहीं ध्यान केन्द्रित करना चाहिये तथा गायत्री आदि मन्त्रों का या तेज , बल , शक्ति देन वाले देने वाले मन्त्रों का यथाशक्ति स्मरण करना चाहिये । एक आसन के बाद उसका प्रतियोगी आसन भी करना चाहिये । यथा -पश्चिमोत्तान आसन का प्रतियोगी भुजंगासन और शलभासन है । हस्तपादासन का प्रतियोगी चक्रासन है । सर्वाङासन का अभ्यास आवश्यक है । सूर्यनमस्कार को अन्य आसनों के अभ्यास के पूर्व कर लेना लाभदारी है ।

iप्राणायाम का अभ्यास शरीरस्थ सभी दोषों का निराकरण कर प्राणमयकोष एवं सूक्ष्म शरीर को नीरोगं तथा पुष्ट बनाता है । नाडी -शोधन का अभ्यास करने के बाद की कुम्भक प्राणायामों का अभ्यास करना चाहिये । प्राणायाम के सभी अभ्यास युक्तिपूर्वक शनैः शनैः ही करने चाहिए तथा भस्त्रिका प्राणायाम को छोडकर सभी शेष प्राणायामों में रेचक् ‍ एवं पूरक , दोनों की क्रियाएँ बहुत धीरे -धीरे करनी चाहिये । प्रत्येक कुम्भक की अपनी -अपनी दोषनाशक विशेष शक्ति है । अतःप्रवृद्ध दोष का विचार करके ही उसके दोषनाशक कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये । सूर्यभेद प्राणायाम पित्तवर्धक , जरादोषनाशक , वातहर , कपालदोष एवं कृमिदोष को नष्ट करने वाला है । उज्जायी कफ -रोग , क्रूरवायु , अजीर्ण , जलोदर , आमवात , क्षय , कास , ज्वर एवं प्लीहा को नष्ट करता है । स्वास्थ्य एवं पुष्टि की प्राप्ति के लिये उज्जायी प्राणायाम का विशेष रुप से अभ्यास करना चाहिये । शीतली प्राणायाम अजीर्ण , कफ , पित्त , तृषा , गुल्म , प्लीहा एवं ज्वर को नष्ट करता हैं । भस्त्रिका प्राणायाम वात -पित्त -कफ -हर , शरीराग्निवर्धक एवं सर्वरोगहर हैं । व्यवहार में संध्योपासना के उपरान्त एवं जप से पूर्व नाडी -शोधन , उज्जायी एवं भस्त्रिका प्राणायाम का नित्य अभ्यास करने का प्रचलन है ।

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Last Updated : March 28, 2011

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