कामाख्या स्तुतिः - प्रथमः पटलः

कामरूप कामाख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह इसी सृष्टीकर्ती त्रिपुरसुंदरी का है ।

॥ श्रीदेव्युवाच ॥
भगवन् , सर्व - धर्मज्ञ ! सर्व - विद्या - प्रिय, प्रभो !
सर्वदानन्द - हदय ! सर्वागम - प्रकाशक ॥१॥
श्रुतानि सर्व - तन्त्राणि साधनानि च भूरिशः,
विद्यास्ताः सकला देव ! फलानि त्वत् - प्रसादतः ॥२॥
सारात् सार - तरं तन्त्रं जानासि किं वद प्रभो !
अतीवेदं रहः स्थानं तेनाहं श्रवणोद्यता ॥३॥
॥ श्रीशिव उवाच ॥
श्रृणु देवि ! मुदा भद्रे ! मदीये प्राण - वल्लभे !
योनिरुपा महाविद्या कामाख्या वर - दायिनी ॥४॥
वरदाऽऽनन्ददा नित्या महाविभववर्द्धिनी ।
सर्वेषां जननी साऽपि सर्वेषां तारिणी मता ॥५॥
रमणी चैव सर्वेषां स्थूला सूक्ष्मा सदा शुभा,
तस्यास्तन्त्रं प्रवक्ष्यामि सावधानाऽवधारय ॥६॥
निखिलासु च विद्यासु ये सिध्यन्ति साधकाः ।
यत्र कुत्रापि केनाऽपि कामाख्या फलदायिनी ॥७॥
कामाख्या - विमुखा लोका निन्दिता भुवनत्रये ।
बिना कामात्मिकां काऽपि न दात्री सिद्धिसम्पदाम् ॥८॥
कामाख्या च सदा धर्मः कामाख्या चार्थ एव च ।
कामाख्या कामसम्पत्तिः कामाख्या मोक्ष एव च ॥९॥
निर्वाणं सैव देवेशि ! सैव सायुज्यमीरिता ।
सालोक्यं सह - रुपं च कामाख्या परमा गतिः ॥१०॥
शिवता ब्रह्मता देवि ! विष्णुता चन्द्रताऽपि च ।
देवत्वं सर्व - देवानां निश्चितं काम - रुपिणी ॥११॥
सर्वासामापि विद्यानां लौकिकं वाक्यमेव च ।
कामाख्याया महादेव्याः स्वरुपं सर्व हि ॥१२॥
पश्य पश्य प्रिये ! सर्व चिन्तयित्वा हदि स्वयं ।
कामाख्यां न विना किञ्चिद् विद्यते भुवन - त्रये ॥१३॥
लक्षकोटि महाविद्यास्तन्त्रादौ परिकीर्तिताः ।
सारात् सारतमा देवि ! सर्वेषां षोडशी मता ॥१४॥
तस्याश्च कारणं देवि ! कामाख्या जगदम्बिका ।
चन्द्र - कीन्तिर्यथा देवि ! जायते लीयते पुनः ॥१५॥
स्थावराणि चराणीह नित्याऽनित्यानि यानि च ।
सत्यं पुनः सत्यं विना तां नैव जायते ॥१६॥

॥ इति श्रीकामाख्या तन्त्रे देवीश्वर सम्वादे प्रथमः पटलः ॥


योनिरुपा कामाख्या देवी का स्वरुप

श्रीदेवी ने कहा - हे भगवन् ! हे प्रभो ! आप सभी धर्मो के ज्ञाता, सभी विद्याओं के स्वामी, सभी आगमों के प्रकाशक और सदैव आनन्दमय हदयवाले हैं । देव ! मैंने सुना है कि आपकी ही कृपा से समस्त तन्त्रों, सभी प्रकार की साधनाओं और सब प्रकार की विद्याओं की उपासना का फल मिलता है । हे प्रभो ! श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ जो तंत्र आपको ज्ञात हो और अत्यंत श्रेष्ठ ब्रह्म प्रतिपादक जो अपौरुषेय ज्ञान आज भी गुप्त हो, उसे सुनने की मेरी इच्छा है ।
श्री शिव बोले - हे प्राणवल्लभे ! प्रश्न का उत्तर देता हूँ, सुनो ! वरदयिनी महामाया कामाख्या योनिरुपा हैं, वे नित्या हैं, वर और आनन्ददात्री हैं तथा महान ऐश्वर्य को बढ़ानेवाली हैं । वे सबकी जननी और रक्षाकारिणी हैं । वे सदैव स्थूल और सूक्ष्म सभी को मूलभूता, शक्तिस्वरुपा, कल्याणकारिणी हैं । मैं उन्हीं महाविद्या, विराट स्वरुपा ' कामाख्या ' का तन्त्र बताता हूँ । अत्यन्त सावधान चित्त से सुनो ।
सारे विश्व में जितने प्रकार की विद्याओं की साधना द्वारा साधक लोग जिन विविध सिद्धियों को प्राप्त करते हैं, उन सभी के क्षेत्र में एकमात्र ' कामाख्या ' ही वरदायिनी अर्थात् अभीष्ट फलदात्री हैं । साधकों के लिए ' कामाख्या ' सर्वविद्यास्वरुपिणी और सर्वासिद्धिदायिनी हैं । जो मनुष्य ' कामाख्या ' सर्वविद्यास्वरुपिणी और सर्वसिद्धिदायिनी हैं । जो मनुष्य ' कामाख्या ' के प्रति उदासीन रहता है, वह तीनों लोकों में निन्दित होता है । एकमात्र कामात्मिका महामाया ' कामाख्या ' को छोड़कर अन्य कोई भी सिद्धिरुपी सम्पदा देने में सक्षम नहीं है ।
' कामाख्या ' सदैव धर्म और अर्थ - स्वरुपा हैं । ' कामाख्या ' काम और मोक्षस्वरुपा हैं । ' कामाख्या ' ही निर्वाण मुक्ति और ' कामाख्या ' ही सायुज्य मुक्ति कही गई हैं । ' कामाख्या ' ही सालोक्य और सारुप्य मुक्तिस्वरुपा हैं । ' कामाख्या ' ही श्रेष्ठ गति हैं ।
हे देवि ! ब्रह्मत्व, विष्णुत्व, शिवत्व, चन्द्रत्व या समस्त देवताओं का देवत्व जिस शक्ति में निहित है, वही काम - रुपिणी ' कामाख्या ' हैं । सभी विद्याओं का जो कुछ लौकिक वाक्य है, वही ' कामाख्या ' हैं । सभी विद्याओं का जो कुछ लौकिक वाक्य है, वही ' कामाख्या ' हैं । सभी विद्याओं का जो कुछ लौकिक वाक्य है, वही ' कामाख्या ' हैं ।
महाविद्यारुपिणी सभी महादेवियाँ ' कामाख्या ' के ही स्वरुप हैं । हे प्रिय ! अपने हदय में उन सबका ध्यान कर स्वयं देख लो । तीनों लोकों में ' कामाख्या ' के अतिरिक्त अन्य कोई नही हैं । तन्त्रादि में लाखो - करोड़ो महाविद्यालयें वर्णित हैं । हे देवी ! इन सबमें सबसे श्रेष्ठ षोडशी ही मानी गई हैं । हे देवि ! उनकी मूल कारण जगदम्बा ' कामाख्या ' ही हैं । हे देवि ! जिस प्रकार चन्द्रमा की कान्ति प्रकट होती है, फिर लुप्त हो जाती है और पुनः प्रकट होती है, उसी प्रकार स्थावर और जंगम् तथा नित्य और अनित्य - जो कुछ भी है, वह सब ' कामाख्या ' के बिना उत्पन्न नहीं होता, वह सर्वथा सत्य है ।


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Last Updated : July 05, 2009

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