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साहित्य दर्पण

साहित्य दर्पण

साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।

  • साहित्य दर्पण - प्रथमः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - द्वितीयः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - तृतीयः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - चतुर्थः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - पञ्चमः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - षष्ठः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - सप्तमः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - अष्टमः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - नवमः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
  • साहित्य दर्पण - दशमः परिच्छेदः
    साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में साहित्य-विषयक महान ग्रन्थ है। इसके रचयिता विश्वनाथ हैं। साहित्य दर्पण के रचयिता का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है।
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साहित्य दर्पण

Last Updated : 2016-11-11T11:55:18.9130000

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उल्लोक कळना जाल्यार तोंड धांपचें

  • (गो.) बोलतां येत नसेल तर तोंड झाकावें (गप्प बसावे). मूर्खपणें बोलण्यापेक्षां गप्प बसणें चांगले. तु०-(अ) आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिका। बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वाथसाधनम्।। (आ) स्वायत्तमेकान्त गुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः। विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणें मौनमपण्डितानाम्।। 
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