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कामाख्या स्तुतिः - अष्टमः पटलः

कामरूप कामाख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह इसी सृष्टीकर्ती त्रिपुरसुंदरी का है ।

पूर्णाभिषेक तत्त्वं एवं गुरु लक्षण

॥ श्रीदेव्युवाच ॥

महादेव, जगद् - वन्द्य ! करुणा - सागर, प्रभो !
पूर्णाभिषेकं कौलानां, वद मे सुख - मोक्षदम् ॥१॥

॥ श्रीशिव उवाच ॥

श्रृणु देवी ! मम प्राण - वल्लभे ! परमादभुतम् ।
पूर्णाभिषेकं सर्वाशा - पूरकं शिवता - प्रदम् ॥२॥
आगत्य सदगुरुं सिद्धं, मन्त्र - तन्त्र - विशारदम् ।
कौलं सर्व - जन - श्रेष्ठमभिषेक - विधिं चरेत् ॥३॥
अति - गुप्तालये शुद्धे, रम्ये कौलिक - सम्मते ।
वेश्याङ्गनाः समानीय, तत्त्वानि च सु - यत्नतः ॥४॥
विशिष्टान् कौलिकान् भक्तया, तत्रैव सन्निवेशयेत ।
अर्चयेदभिषेकार्थं, गुरुं वस्त्रादि - भूषणैः ॥५॥
प्रणमेद् विधिवद् भक्तया, तोषयेत् स्तुति - वाक्यतः ।
प्रार्थयेच्छुद्ध - भावेन, कुल - धर्मं वदेति च ॥६॥
कृतार्थ कुरु मे नाथ ! श्रीगुरो, करुणा - निधे !
अभिषिक्तैः साधकैश्च, सेवार्थं शरणागतः ॥७॥
ततोऽभिषिक्त्वा तत्त्वानि, शोधयेच्छक्तिमान् मुदा ।
स्थापयित्वा पुरः कुम्भं, मन्त्रैर्मुद्राभिः प्रिये ! ॥८॥
वितानैर्धूप - दीपैश्च, कृत्वा चामोदितं स्थलम् ।
नाना - पुष्पैस्तथा गन्धैः, सर्वोपकरणैर्यजेत् ॥९॥
समाप्य महतीं पूजां, तत्त्वानि सन्निवेद्य च ।
आदौ स्त्रीभ्यः समर्प्यैव, प्रसादाल्पं भजेत् ततः ॥१०॥
शुभ - चक्रं विनिमयि, आगमोक्त - विधानतः ।
अभिषिक्त्वा साधकांश्च, पायेत् तु स्वयं पिबेत् ॥११॥
भुंजीरन् मत्स्य - मांसाद्यैश्चर्व्य - चोष्यादिभिश्च ।
तैः रमेरन् परमानन्दैर्वेश्यायां च यथासुखम् ॥१२॥
वदेयुः कर्म - कर्तुश्च, सिद्धिर्भवतु निश्चला ।
अभिषेचन - कर्माशु, निर्विघ्नं चेति निश्चितम् ॥१३॥
चक्रालयान्निः सरेन्न जन एकोऽपि शङ्करि ! ।
प्रातः कृत्यादि - कर्माणि, कुर्यात् तत्रैव साधकः ॥१४॥
दिनानि त्रीणि संव्याप्य, भक्तया तांस्तु समर्चयेत् ।
शिष्यश्चादौ दिवा - रात्रभिषिक्तो भवेत् ततः ॥१५॥
अनुष्ठान - विधिं वक्ष्ये, सादरं श्रृणु पार्वति ! ।
न प्रकाण्डं नहि क्षुद्रं, प्रमाणं घटमाहरेत् ॥१६॥
ताम्रेण निर्मितं वापि, स्वर्णेन निर्मितं च वा ।
प्रवालं हीरकं मुक्तां, स्वर्ण - रुप्ये तथैव च ॥१७॥
नानालङ्कार - वस्त्राणि, नाना - द्रव्याणि भूरिशः ।
कस्तूरी - कुंकुमादीनि, नाना - गन्धानि चाहरेत् ॥१८॥
नाना - पुष्पाणि माल्यानि, पञ्चतत्त्वानि यत्नतः ।
विहितान् धूप - दीपांश्च, घृतेन यत्नतः ॥१९॥
ततः शिष्यं समानीय, गुरुः शुद्धालये प्रिये ! ।
वेश्याभिः साधकैः सार्द्ध, पूजनं न समाचरेत् ॥२०॥
पटलोक्त - विधानेन, भक्तितः परिपूजयेत् ।
पूजां समाप्य देव्यास्तु, स्तवैस्तु प्रणमेन् मुदा ॥२१॥
ततो हि शिव - शक्तिभ्यो, गन्ध - माल्यानि दापयेत् ।
आसनं वस्त्र - भूषाश्च, प्रत्येकेन कुलेश्वरी ! ॥२२॥
ततः शङ्खादि - वाद्यैश्च, मङ्गलाचरणैः परैः ।
घट - स्थापनकं कुर्यात् , क्रमं तत्र श्रृणु प्रिये ! ॥२३॥
काम - बीजेन सम्प्रोक्ष्य, वाग्भवेनैव शोधयेत् ।
शक्तया कलशमारोप्य, मायया पूरयेज्जलैः ॥२४॥
प्रवालादीन् पञ्चरत्नान्, विन्यसेत् तत्र यत्नतः ।
आवाहयेच्च तीर्थानि, मन्त्रेणानेन देशिकः ॥२५॥
ॐ गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः, समुद्राश्च सरांसि च ।
सर्वे समुद्राः सरितः, सरांसि जलदा नदाः ॥२६॥
ह्रदाः प्रस्रवणाः पुण्याः, स्वर्ग - पाताल - भू - गताः ।
सर्व - तीर्थानि पुण्यानि, घटे कुर्वन्तु सन्निधिम् ॥२७॥
रमा - बीजेन जप्तेन, पल्लवं प्रतिपादयेत् ।
कूर्चेन फल - दानं स्याद्, गन्ध - वस्त्रे हदात्मना ॥२८॥
ललनयैव सिन्दूरं, पुष्पं वद्यात् तु कामतः ।
मूलेन दूर्वां प्रणवैः, कुर्यादभ्युक्षणं ततः ॥२९॥
हूं फट् स्वाहेति मन्त्रेण, कुर्याद् दर्भैश्च ताड़नम् ।
विचिन्त्य मूलपीठं तु, संयोज्य पूजयेत् ॥३०॥
स्वतन्त्रोक्त - विधानेन, प्रार्थयेदमुना बुधः ।
तद् - घटे हस्तमारोप्य, शिष्यं पश्यन् गुरश्च सः ॥३१॥
उत्तिष्ठ ब्रह्मकलश ! देवताऽभीष्टदायक ! ।
सर्व - तीर्थाम्बु - सम्पूर्ण ! पूरयास्मन्मनोरथम् ॥३२॥
अभिषिञ्चेत् गुरुः शिष्यं, ततो मन्त्रैश्च पार्वति ! ।
मङ्गलैर्निखिलैर्द्रव्यैः, साधकैः शक्तिभिः सह ॥३३॥
पल्लवैराम्रकाद्यैश्च, नति - मत् शिष्यमेव च ।
आनन्दैः परमेशानि ! भक्तानां हित - कारिणी ॥३४॥

Translation - भाषांतर

पूर्णाभिषेक तत्त्व एवं गुरु लक्षण

श्री देवी बोलीं - हे विश्व - वन्दनीय महादेव ! दयासागर भगवन् ! कौलों के ' पूर्णाभिषेक ' के सम्बन्ध में मुझे बताइए, जो सुखप्रद और मोक्षदायक होता है ।
श्री शिव ने कहा - हे मेरी प्राणप्रिये देवी ! अत्यन्त विलक्षण ' पूर्णाभीषेक ' के सम्बन्ध में सुनो, जो सभी आशाओं की पूर्ति करनेवाला और शिवत्व को देनेवाला है ।
मन्त्र - तन्त्र में पारङ्गत, सिद्ध और सभी में श्रेष्ठ कौल सदगुरु के पास आंकर ' अभिषेक ' की विधि को करें । अत्यन्त गुप्त और शुद्ध तथा सुन्दर गृह में, जो कौलिक द्वारा समर्थित हो, वेश्यांगनाओं और तत्त्वों को सुन्दर प्रयत्न के साथ एकत्रित करें । फिर वहीं विशिष्ट कौलों को बुलाकर भक्तिपूर्वक बिठाये । तब ' अभिषेक ' के वस्त्रादि आभूषणों से गुरु की पूजा करें ।
विधिवत्, भक्तिपूर्वक गुरु को प्रणाम करें, स्तुति, वचनों से उन्हें प्रसन्न करें । फिर शुद्ध भाव से प्रार्थना करें कि ' हे नाथ ! कुलधर्म को बताएँ और मुझे कृतार्थ करें । हे दयासागर, श्री गुरुदेव ! मैं अभिषिक्त साधकों के साथ आपकी शरण में आया हूँ ।'
हे प्रिय ! तब शक्तिमान् गुरु प्रसन्न होकर तत्त्वों का शोधन करें और मन्त्रों एवं मुद्राओं द्वारा अपने सम्मुख कलश की स्थापना कर धूप - दीप आदि के द्वारा वातावरण को प्रफुल्लित कर विविध पुष्पों, सुगन्धियों और सभी प्रकार की सामग्रियों से पूजन करें ।
महापूजा को समाप्त कर और तत्त्वों को अर्पित कर चुकने पर पहले स्त्रियों को देकर तब थोड़ा प्रसाद स्वयं ग्रहण करें । तन्त्रोक्त विधि से चक्र की रचना कर साधकों का अभिषेक कर उन्हें पान कराएँ और स्वयं पान करें ।
मत्स्य, मांसादि चर्व्य और चोष्य भोजन करते हुए यथासुख वेश्याओं के साथ परमानन्द के साथ विहार करें और कहें कि ' कर्म करानेवाले को अटल सिद्धि प्राप्त हो । ' इस प्रकार ' अभिषेक ' कर्म निश्चय ही शीघ्र और निर्विघ्न सम्पन्न होता है ।
हे शंकरी ! चक्रालय से एक भी व्यक्ति बाहर न निकले । प्रत्येक साधक को वहीं प्रातः कृत्यादि समस्त कार्य करने चाहिए । इस प्रकार तीन दिनों तक शिष्य रात - दिन भक्तिपूर्वक उन सबका अर्चन करें । तब वह ' अभिषिक्त ' होता है ।
हे पार्वती ! अनुष्ठान की विधि बताता हूँ, सादर सुनो । न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा - उचित रुप का ' घट ' लाएँ । चाहे ताँबे का बना हो या सोने का अथवा हीरे - मोती - मूंगे या सोने - चाँदी को हो ।
विविध प्रकार के आभूषण और वस्त्र, विविध प्रकार के द्रव्य पर्याप्त मात्रा में, कस्तूरी, कुंकुम और विविध प्रकार के सुगन्धित पदार्थ एकत्र करें । विविध प्रकार के पुष्प और मालाएँ, यत्नपूर्वक पाँचों तत्त्व और धूप तथा घृत - दीप प्रयत्न करके लाएँ ।
तब हे प्रिये ! गुरुदेव शिष्य को शुद्ध गृह में लाएँ और वेश्याओं तथा साधकों के साथ पूजन करें । ' पटल ' में बताई विधि से भक्तिपूर्वक देवी की पूजा समाप्त करें और आनन्द के साथ स्तुतियों द्वारा प्रणाम करें ।
तदनन्तर हे कुलेश्वरी १ शिवशक्तियों को गन्ध, पुष्प - मालादि से सुशोभित करें । प्रत्येक को आसन, वस्त्र और आभूषण प्रदान करें । तब शंखादि वाद्य बजाते हुए, मंगलाचरण का गान करते हुए, ' घट ' की स्थापना करें । हे प्रिये ! उसकी विधि सुनो ।
काम - बीज ( क्लीं ) से ' घट ' का प्रोक्षण कर, वाग् - भव ( ऐं ) से उसे शुद्ध करें । शक्ति ( सौः ) से ' कलश ' को स्थापित कर माया ( ह्रीं ) द्वारा उसे जल से भरें । उसमें यत्न - पूर्व प्रवाल ( मूंगा ) आदि पाँच रत्न डालें और निम्न मन्त्र से तीर्थो का आह्वान करें ।
गंगा आदि सभी नदियाँ और समुद्र तथा सरोवर, सभी सागर एवं धाराएँ, तालाब, नद और जलाशय, पवित्र झरने आदि जो समस्त पवित्र तीर्थ स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी में हैं, वे सब इस ' घट ' में प्रविष्ट हो जाएँ ।
रमा - बीज ( श्रीं ) से घट के ऊपर अभिमन्त्रित पल्लव रखें । कूर्च ( हूं ) से फल दे और हद ( नमः ) से गन्ध एवं वस्त्र प्रदान करें । ललना ( स्त्रीं ) से सिन्दूर और काम - बीज ( क्लीं ) से पुष्प चढ़ाएँ । मूल - मन्त्र का उच्चारण करते हुए दूर्वा चढ़ाकर प्रणव ( ॐ ) से घट का अभ्युक्षण करें । ' हूं फट् स्वाहा ' के कुशों द्वारा घट का ताड़न करें । तब घट में योनि - पीठ का ध्यान कर उसका पूजन करें । इसके बाद उस घट के ऊपर अपने तन्त्रोक्त विधान से हाथ रखकर गुरुदेव शिष्य को देखते हुए निम्न मन्त्र द्वारा घट से प्रार्थना करें ।
अर्थात् समस्त तीर्थो के जल से पूर्ण एवं देवता के अभीष्ट फल को देनेवाले हे ब्रह्मकलश ! उठो और हमारे मनोरथ को पूर्ण करो ।
हे पार्वती ! परमानन्दपूर्वक गुरुदेव मन्त्रों का उच्चारण करते हुए आम्रपल्लव द्वारा पहले शिष्य का अभिषेक करें । फिर उपस्थित सभी साधकों और शक्तियों सहित समस्त मण्डल पर जल छिड़कें । इससे सभी भक्तों का कल्याण होता है ।


References : N/A
Last Updated : 2009-07-06T01:28:45.2100000

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निपराधी

  • वि. १ दुष्ट ; नीच . - एभा ३ . ४३१ . बाळ बापा म्हणे काका । तरी कां निपराध पारिखा । - तुगा ३२४८ . २ निरुपयोगी ; व्यर्थ . रानी वसती औषधी । तरि कां म्हणाव्या निपराधी । - तुगा ३५३२ . [ ? नि + अपराध ] 
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