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कामाख्या स्तुतिः - श्रीगुरोर्लक्षणम्

कामरूप कामाख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह इसी सृष्टीकर्ती त्रिपुरसुंदरी का है ।

श्रीगुरोर्लक्षणम्

॥ श्रीदेव्युवाच ॥

श्रुतं रहस्यं देवेश ! चाभिषेचन - कर्मणः ।
गुरुः को वाऽधिकारी, स्यादत्र तन्मे वद प्रभो ! ॥१॥

॥ श्रीशिव उवाच ॥

महा - ज्ञानी कौलिकेन्द्रः, शुद्धो गुरु - परायणः ।
निग्रहानुग्रहे शक्तः, शिष्य - पालन - तत्परः ॥२॥
पुत्र - दारादिभिर्युक्तः, सज्जनस्तु प्रपूजितः ।
श्रद्धावानागमे नित्यं, सोऽधिकर्ता न चान्यथा ॥३॥
अन्धं खञ्जं तथा रुग्णं, स्वल्प - ज्ञानयुतं पुनः ।
सामान्य - कौलं वरदे ! वर्जयेन्मति - मान् सदा ॥४॥
उदासीनं विशेषेण, वजयेत् सिद्धि - कामुकः ।
उदासीन - मुखाद दीक्षा, वन्ध्या नारी यथा प्रिये ! ॥५॥
अज्ञानाद यदि वा मोहाद्, उदासीनात् तु पामरः ।
अभिषिक्तो भवेद् देवी ! विघ्नस्तस्य पदे - पदे ॥६॥
किं तस्य जप - पूजाभिः, किं ध्यानैः किं च भक्तितः ।
सर्व हि विफलं तस्य - नरकं यान्ति चान्तिमे ॥७॥
कल्प - कोटि - शतैर्देवि ! भुक्ते स नरकं सदा ।
ततो हि बहु - जन्मेभ्यो, देवी - मन्त्रमवाप्नुयात् ॥८॥
ततो हि विहितं शुद्धं गृहस्थं गुरुमालभेत् ।
अभिषेचन - कर्माणि, पुनः कुर्यात् प्रयत्नतः ॥९॥
सफलं हि सदा कर्म, सर्व तस्य भवेद् ध्रुवम् ।
विद्याऽपि जननी तुल्या, पालितं सततं प्रिये ! ॥१०॥
यथा पशुं परित्यज्य, कौलिकं गुरुमालभेत् ।
उदासीनं परित्यज्य, तथाभिषेचनु शतम ॥११॥
अभिषिक्ततः शिवः साक्षाद्, अभिषिक्तो हि दीक्षितः ।
स एवं ब्राह्मणो धन्यो, देवी - देव - परायणः ॥१२॥
तस्यैव सफलं जन्म, धरण्यां श्रृणु पार्वति ! ।
तस्यैव सफलं कर्म, तस्यैव सफलं धनम् ॥१३॥
तस्यैव सफलो धर्मः, कामश्च सफलो मनुः ।
दीक्षा हि सफला देवि ! क्रिया च सफला तनुः ॥१४॥
सर्व हि सफलं तस्य, गिरजे ! बहु किं वचः ।
यत्र देशे वसेत् साधुः, सोऽपि वाराणसी समः ॥१५॥
तस्य क्रोड़े वसन्तीह, सर्वतीर्थानि निश्चितं ।
सत्यं सत्यं महामाये, पुनः सत्यं मयोदितम् ॥१६॥
उक्तानि यानि यानीह, सेचनानि च पार्वती ! ।
सर्व - तन्त्रेषु तान्यत्र, कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥१७॥
योग्यं गुरुं तथा शिष्यं, विनैतत् पटलं न हि ।
जायते देव - देवेशि ! सत्यं सत्यं मयोदित्तम् ॥१८॥
इदं तु सेचनं देवि ! त्रिषु लोकेषु दुर्लभं ।
गणेशः पात्रमत्रैव, कार्तिकेयोऽपि पार्वति ! ॥१९॥
मम तुल्यो ब्रह्म - तुल्यो, विष्णु - तुल्योऽत्र भाजनं ।
पञ्च - वक्त्रैश्च शक्तो न, वर्णितुं परमेश्वरि ! ॥२०॥
इति ते कथितं गुप्तं, सेचनं महत् ।
गोपनीयं गोपनीयं, गोपनीयं प्रयत्नतः ॥२१॥
यथा रतिर्गोपनीया, तथाभिषेचनं परं ।
यथा योनिर्गोपनीया, तथाऽभिषेचनं परम् ॥२२॥
निखाते धनमागत्य, गोपयेत्तु यथा परं ।
तथैव तु महामाये, गोपनीयं ममाज्ञया ॥२३॥

Translation - भाषांतर
गुरुलक्षण
श्री देवी बोलीं - हे देवेश ! अभिषेक कर्म का रहस्य मैनें सुन लिया । इस कर्म करने के अधिकारी गुरुदेव अथवा कौन व्यक्ति हैं ? हे प्रभू ! मुझे यह बतलाइये ।
श्री शिव ने कहा - महान् ज्ञानी, विशुद्धाचारी एवं गुरुभक्त श्रेष्ठ कौलिक जो अनुशासन करने में और कृपा करने में समर्थ है तथा जो शिष्यों का पालन करता रहता हैं, पत्नी - पुत्रादि से मुक्त रहता हुआ अपने कुटुम्बियों से सम्मानित होता हुआ सदा आगम - शास्त्र में श्रद्धा रखता है, वही इस ' अभिषेक - कर्म ' के करने का अधिकारी है, अन्य कोई नहीं ।
हे वरदायिनि ! अन्धे, लूले, रोगी और अल्प - ज्ञानी साधारण कौल साधक को बुद्धिमान् सदा छोड़ दें । सिद्धि की कामना रखनेवाला विशेषकर विरक्त साधक का सहयोग न लें क्योंकि हे प्रिये ! विरक्त के मुख से ली गई दीक्षा उसी प्रकार निष्फल होती है, जिस प्रकार बाँझ स्त्री ।
हे देवी ! अज्ञानवश या मोह में पड़कर जो विरक्त साधक से अभिषिक्त होता है, उसके मार्ग में पग - पग पर बाधाएँ आती हैं । उसके जप - पूजन, ध्यान और भक्ति सभी निष्फल होते हैं और अन्त में वह नरक में जाता है । हे देवी ! करोड़ों - सैकड़ों कल्पों तक वह सदा नरकभोग करता है । तब अनेक जन्मों के बाद देवी का मन्त्र प्राप्त करता है ।
अतः विधिसम्मत शुद्ध गृहस्थ गुरुदेव को प्राप्त करना चाहिए । फिर प्रयत्न करके अभिषेक - कर्म कराना चाहिए । तब उसके कर्म निश्चय ही सदा सफल होंगे । हे प्रिये ! विद्या अर्थात् कुलसाधना भी माँ के समान है । उसका पालन - पोषण निरन्तर करना चाहिए ।
जिस प्रकार पशु - साधक का त्याग कर कौलिक गुरु को प्राप्त करना चाहिए, उसी प्रकार विरक्त साधक को छोड़कर लोकहित में तत्पर कौल साधक से अभिषेक कराना ही विधि - सम्मत है । अभिषिकित साधक साक्षात् शिवस्वरुप होता है । दीक्षा - प्राप्त ही अभिषिक्त होता है तथा वही देवी और देवीक्त ब्राह्मण धन्य कहा जाता है ।
हे पार्वति ! सुनो उसी अभिषिक्त साधक का धर्म सफल होता है । उसी की कामनाएँ पूर्ण होती हैं और उसका मन्त्र फलदायक होता है । हे देवी ! उसी की दीक्षा सफल होती है और तब उसकी क्रिया भी फलवती होती है ।
हे गिरिजे ! अधिक कहने से क्या, उसके सभी कार्य सफल होते हैं । जिस स्थान में वह निवास करता हैं, वह वाराणसी के समान तीर्थ बन जाता है । निश्चय ही यहाँ उसकी गोद में सभी तीर्थ रहते हैं । हे महामाये ! यह कथन सर्वथा सत्य है ।
हे पार्वति ! यहाँ जो - जो अभिषेक - वचन कहे हैं, सभी तन्त्रों में वे सब पूर्णाभिषेक के हैं और उनके बिना सोलह कलाओं में से एक भी कला का ज्ञान नहीं हो पाता । इस पद्धति के बिना योग्य गुरु और वैसे ही शिष्य का होना सम्भव नहीं होता । हे देव - देवेशि ! मेरे यह कथन सर्वथा सत्य हैं ।
हे देवी ! यह अभिषेक विधि तीनों लोकों में दुर्लभ है । हे पार्वती ! गणेश और कार्तिकेय जैसे व्यक्ति की पात्रता इसमें है । मेरे समान, या ब्रह्मा और विष्णु के समान व्यक्ति की इसमें योग्यता है । हे परमेश्वरी ! पाँच मुखों से भी इसकी महिमा का वर्णन करना सम्भव नहीं है ।
इस प्रकार मैंने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुप्त अभिषेक का वर्णन तुमसे किया है । इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए । जिस प्रकार रतिक्रीड़ा और योनि गोपनीया हैं, उसी प्रकार श्रेष्ठ अभिषेक को गुप्त रखना चाहिए । जैसे भूगर्भ में धन रखकर उसे अति गुप्त रखा जाता है, उसी प्रकार हे महामाये ! इसे मेरी आज्ञा से गुप्त रखना चाहिए ।

॥ श्री कामाख्या - तन्त्रे पार्वतीश्वर - संवादे अष्टमः पटलः ॥

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Last Updated : 2009-07-08T04:40:36.6070000

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