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कामाख्या स्तुतिः - षष्ठम् पटलः

कामरूप कामाख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह इसी सृष्टीकर्ती त्रिपुरसुंदरी का है ।

काम - कला साधनं

॥ श्रीदेव्युवाच ॥

कस्या देव्याः साधकानामेकान्त - निन्दनं महत् ।
न कृत्वा पञ्च - तत्त्वैश्च पूजनं परमेश्वर ! ॥१॥

॥ श्रीशिव उवाच ॥

कलौ तु सर्व - शक्तानां ब्राह्मणानां विशेषतः ।
पञ्चतत्त्व विहीनानां निन्दनं परमेश्वरि ! ॥२॥
तन्मध्ये कालिका - तारा - साधकानां कुलेश्वरी ! ।
मद्यं बिना साधनं च महाहास्याय कल्पते ॥३॥
यथा दीक्षां बिना देवी ! साधनं हास्मेव हि ।
तथा तयोः साधकानां ज्ञेयं तत्त्वं बिना सदा ॥४॥
शिलायां शस्य - वापैश्च न भवेदंकुरो यथा ।
आनावृष्ट्या क्षितौ देवि ! कर्षणं यथा नहि ॥५॥
ऋतुं विना कुतो देवि ! कुतोपऽत्यं प्रजायते ।
गमनं च विना क्वापि ग्राम - प्राप्तिर्यथा न च ॥६॥
अतो देव्याः साधनेषु पञ्चतत्त्वं सदा लभेत् ।
पञ्चतत्त्वैः साधकेन्द्रावर्चयेद् विधिना मुदा ॥७॥
मद्यैर्मांसैस्त्तथा मत्स्यैमुद्राभिर्मैथुनैरपि ।
स्त्रीभिः सार्द्ध सदा साधुरर्चयेज्जगदम्बिकाम् ॥८॥
अन्यथा च महानिन्दा गीयते पण्डितैः सुरैः ।
कायेन मनसा वाचा तस्मात् तत्त्व - परो भवेत् ॥९॥
कालिका - तारिणी - दीक्षां गृहीत्वा मद्य - सेवनम् ।
न करोति नरो यस्तु स कलौ पतितो भवेत् ॥१०॥
वैदिकीं तान्त्रिकीं सन्ध्यां जप - होम - बहिष्कृतः ।
अब्राह्मणः स एवोक्तः स एव हन्ति मूर्खकः ॥११॥
शूनी - मूत्र - समं तस्य तप्रणं यत् पितृष्वपि ।
अतो न तर्पयेत् सोऽपि यदीच्छेदात्मनो हितम् ॥१२॥
काली - तारा - तनुं प्राप्य वीराचारं करोति न ।
शूद्रत्वं तच्छरीरे तु प्राप्तं तेन च चान्यथा ॥१३॥
क्षत्रियोऽपि तथा देवि ! वैश्यश्चाण्डालतां व्रजेत् ।
शूद्रो हि शूकरत्वं च याति याति न संशयः ॥१४॥
अवश्यं ब्राह्मणो नित्यं राजा वैश्यश्च शूद्रकः ।
पञ्चतत्त्वैः भजेद देवीं न कुर्यात् संशयं क्वचित् ॥१५॥
पञ्चतत्त्वैः कलौ देवि ! पूजयेद् यः कुलेश्वरीम् ।
तस्यासाध्यं त्रिभुवने न किञ्चिदपि विद्यते ॥१६॥
स ब्राह्मणो वैष्णवश्च स शाक्तो गाणपोऽपि च ।
सौरः स परमार्थी च स एव पूर्ण - दीक्षितः ॥१७॥
स एव धार्मिकः साधुर्ज्ञानी चैव महाकृतिः ।
याज्ञिकः सर्व - कर्माहः सो हि देवो न चान्यथा ॥१८॥
पावनानीह तीर्थानि सर्वेषामिति सम्मतम् ।
तीर्थानां पावनः कौलो गिरिजे ! बहु किं वचः ॥१९॥
अस्यैव जननी धन्या धन्या हि जनकादयः ।
धन्या ज्ञाति - कुटुम्बाश्च धन्या आलापिनो जनाः ॥२०॥
नृत्यन्ति पितरः सर्वे गाथां गायन्ति ते मुदा ।
अपि कश्चित् कुलेऽस्माकं कुलज्ञानी भविष्यति ॥२१॥
तदा योग्या भविष्यामः कुलीनानां सभातले ।
समागन्तुमिति ज्ञात्वा सूत्सुकाः पितरः परे ॥२२॥
कुलाचारस्य माहात्म्यं किं ब्रूमः परमेश्वरि !
पञ्च - वक्त्रेण देवेशि ! सनातन्याः फलानि च ॥२३॥

॥ श्रीदेव्युवाच ॥

साधनं वद कौलेश ! साधकानां सुखावहम् ।
दिव्यं रम्यं मनोहरि सर्वाभीष्ट - फल प्रदम् ॥२४॥

॥ श्रीशिव उवाच ॥

श्रृणु काम - कलां कान्ते ! साधनं तु सुखावहम् ।
यत् किञ्चिद् गदितं पूर्वं विस्मृतं तद् वदाम्यहम् ॥२५॥
अति - सुललित - दिव्यं स्थानमालोक्य तु भक्त्या,
हदि च परम देवीं सम्विभाव्यैक - चित्तः ।
मधुर - कुसुम - गन्धैर्व्याप्तमाहत्य साधुः,
तदुपरि खलु तिष्ठेत् साधनार्थी कुलज्ञः ॥२६॥
जयवति यतमानः शब्द - पुष्पं क्षिपेत् तत्,
स खलु करक - वीजान्यत्र दुर्गे ! ततो हि ।
चिर - भव - बक - पुष्पं वर्जयित्वाऽर्चयित्वा,
यदि जपति विधिज्ञस्तत्क्षणत् सोप्यहं च ॥२७॥
उप - वन - परि - युक्त शुद्ध - रम्यालते यो,
विधि - कृत - वर - लिङ्गं लेपयित्वा सुगन्धैः ।
विविध - कुसुम - धूपैधूपयित्वा लतां सः,
सम्प्रति जपति भु - भक्त्या त्वत् - सुतो जायते सः ॥२८॥
अचल - शिखर - मध्ये शीघ्रमालम्बयित्वा,
कनक - कुसुम - सार्ध शब्द - पुष्प्म निवेद्य ।
कृत - बहु - विधि - पूजाः स्वं गुरुं भावयित्वा,
जपति यदि विलासी विष्णुरेव स्वयं सः ॥२९॥
परिचरति स साधुः सिद्धि - वर्गः सशङ्कः,
पर - वधू - लतानां वक्त्र - पद्मोपभोगी ।
जयति भुवन - मध्ये निर्जरश्चामरोऽपि,
व्रजति तमनु नित्यं सार्वभौमो नृणां सः ॥३०॥
अभिनव - शुभनीरं रक्त - पद्म - प्रकीर्णम् ,
विविध - कमल - रम्यं भर्ज - मीन - प्रयुक्तम् ।
अपर - विहित - वस्तु व्याप्तमीशेश्चरोऽपि,
विगत - जन - समूहे प्राप्य देवी ! प्रकोणे ॥३१॥
घन - जनित - सुशोभे विद्युदादीप्ति - रम्ये,
हदि च परम - देवीं चिन्तयित्वा सु - भक्त्या ।
विधि - विहित - विधानैः स्नान - पूजां समाप्य,
प्रति - जपति निशायां गह्वरे ब्रह्म कः स्यात् ॥३२॥
इह च गुरु - वराज्ञां प्राप्य शीर्षे निधाय,
त्वयि भजति कुलज्ञो भाव - भेदात् कुलेशि ! ।
सुर - गुरुरिह को वा कोऽपि चन्द्रो दिनेशो,
व्रजति भुवन - मध्ये दिक् - पतित्वं च कोऽपि ॥३३॥
इति च परम - देव्याः साधनं यन्मयोक्तम् ,
यदि पठति सु - भव्यो गदगदो वासनाभिः ।
अभिमत - फल - सिद्धिः सर्वलोकैर्वरेण्यो,
भवति भुवन - मध्ये पुत्र - दारैर्युतोऽपि ॥३४॥
अचल - धन - समूहस्तस्य भोगे वसेत् तु,
प्रतिदिनमभिपूजा देवता - गृहे च ।
परिजन - गण - भक्तिः सर्वदा तत्र तिष्ठेत् ,
सदसि वसति राज्ञः सादरः सोऽपि वन्द्यः ॥३५॥

॥ श्रीकामाख्या - तन्त्रे पार्वतीश्वर - सम्वादे षष्ठः पटलः ॥

Translation - भाषांतर

काम - कला का साधन

श्री देवी बोलीं - हे परमेश्वर ! पंचतत्त्वों से जो साधक देवी का पूजन नहीं करते, उनमें किन देवियों के साधक और कौन सब से अधिक निन्दनीय हैं ?
श्रीशिव ने कहा - हे परमेश्वरी ! कलियुग में पंचतत्त्वविहीन सभी शाक्तों में विशेषतया ब्राह्मण साधक निन्दनीय हैं । उनमें भी हे कुलेश्वरी ! कालिका और तारा के साधकों की मद्य बिना साधना अति हास्यास्पद है । हे देवी ! जैसे दीक्षा के बिना साधना करना हास्यास्पद है, उसी प्रकार इन दोनों महादेवियों के साधकों की तत्त्वरहित साधना समझनी चाहिए ।
हे देवी ! जैसे शिला में बोया हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, वर्षा के बिना भूमि जोती नहीं जा सकती, ऋतु के बिना सन्तान नहीं होती और बिना चले किसी गाँव तक पहुँचा नहीं जा सकता, उसी प्रकार पंचतत्त्वों के बिना देवी की साधना सफल नहीं होती । अतः दोनों महाविद्याओं के साधकों को प्रसन्न मन से विधिपूर्वक पंचतत्त्वों पंचतत्त्वों से पूजन करना चाहिए ।
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और स्त्रियों के सम्पर्क में सदैव जगदम्बा का उत्तम अर्चन करना चाहिए । अन्यथा विद्वानों और देवताओं द्वारा निन्दा की जाती है । अतः मन, वचन और शरीर से तत्त्व - परायण होना चाहिए ।
कालिका और तारिणी की दीक्षा लेकर जो मनुष्य मद्य - सेवन नहीं करता, वह कलियुग में पतित होता है । वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या तथा जप - होम से बहिष्कृत होकर वह अब्राह्मण कहा जाता है तथा वह मूर्ख नष्ट होता है । पितरों के लिए वह जो तर्पण करता है, वह भी स्वीकृत नहीं होता । अतः ऐसे व्यक्ति को यदि अपने कल्याण की इच्छा हो, तो पितरों का तर्पण न करें ।
काली और तारा के मन्त्र को पाकर जो ' वीराचार ' का पालन नहीं करता, उसके शरीर में शूद्रता आ जाती हैं । ऐसे क्षत्रिय की भी वही दशा होती है । वैश्य चाण्डाल के समान और शूद्र शूकर के समान पापग्रस्त हो जाता है । अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी को सदा पंचतत्त्वों से देवी की पूजा करनी चाहिए, इसमें कुछ भी शंका न करें ।
हे देवी ! कलियुग में जो कुलेश्वरी की पूजा पंचतत्त्वों से करता है, उसके लिए तीनों लोकों में कोई भी कार्य असाध्य नहीं रह जाता
। वही व्यक्ति ब्रह्मज्ञानी, विष्णुभक्त, शक्तिउपासक, गणेशोपासक, सूर्योपासक, परमार्थी और पूर्ण दीक्षित माना जाता है । वही वास्त\व में धार्मिक साधु, ज्ञानी, अत्यन्त पुण्यात्मा, यज्ञकर्ता, सभी कार्यों में योग्य और देवस्वरुप होता है ।
हे गिरिजे ! सभी का मत है कि तीर्थ पवित्र होते हैं । इन तीर्थो से भी पवित्र ' कौल ' साधक होता है, इससे अधिक क्या कहें । उसकी माँ धन्य है और उसका पिता धन्य है, उसकी जाति और परिवारवाले धन्य हैं, उससे बात करनेवाले धन्य हैं ।
हे परमेश्वरि ! समस्त पितर लोग नाचते गाते हुए आनन्द से कहते हैं कि कोई भी हमारे कुल में कुलज्ञानी होगा, जिससे हम कुलीनों की सभा में सम्मिलित हो सकेंगे । यह जानकार अन्य पितर भी उत्सक हो उठते हैं । हे देवेशि ! पंचमुखों से कुलाचार की महिमा और फलों का वर्णन कहाँ तक करुँ !
श्री देवी बोली - हे कौलेश ! साधकों को सुखदायक साधन बताइए, जो दिव्य, सुन्दर, मनोहर और सभी वांछित फलों को देनेवाला हो ।
श्रीशिव ने कहा - हे कान्ते ! सुखदायक ' कामकला ' के साधन को सुनो । जो कुछ मैंने पहले बताया था, वह विस्मृत हो गया है । उसी को फिर बताता हूँ ।
कुल - ज्ञानी साधक अत्यन्त सुन्दर और दिव्य स्थान को देखकर भक्तिपूर्वक और हदय में परमा देवी का एकाग्र चित्त से ध्यान का सुन्दर सुगन्धित पुष्पों से उस स्थान को सज्जित कर उस पर बैठें ।
श्लोक २७ से ३५ तक विशेष विधान वर्णित हैं, जो सामान्य साधकों के लिए बोधगम्य नहीं है । जिज्ञासु पाठक अपने गुरुदेव से अथवा लेखक से सम्पर्क करें ।
॥ श्रीकामाख्या - तन्त्रे पार्वतीश्वर - सम्वादे षष्ठः पटलः ॥


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Last Updated : 2009-07-06T01:23:05.5400000

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