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अपहृति अलंकारः - लक्षण ८

रसगंगाधर ग्रंथाचे लेखक पंडितराज जगन्नाथ होत. व्याकरण हा भाषेचा पाया आहे.


लक्षण ८
अथ मुखं चन्द्र इति रूपके मुखत्वसामानाधिकरण्येन चन्द्रतादूष्य-स्यारोप्यमाणतया न मुखनिषेधापेक्षेति चेत्‍, प्रकृतेऽपि तर्हि तादृश-

साधारणपुरुषत्वसामानाधिकरण्येन पुण्डरीकाक्षतादात्म्यारोपरूपमसौ राजा पुण्डरीकाक्ष इत्याकारकरूपकमेव भवितुमीष्टे, नापह्लुति: । यदपि चक्तसुपर्णदूरीकरणेन नायं पुण्डरीकाक्ष इति निषेध:, पुष्पचाप-ध्वजगत-मकरयोर्लेखनेन च मन्मथोऽयमित्युपमानारोपश्च व्यड्रयो भवितुमर्हति, तथापि नासावपह्लुति: । ‘ प्रकृतस्य निषेधेन यदन्यत्वप्रकल्पनम्‍ ’ इति त्वक्तृतलक्षणस्याप्यत्रासत्त्वात्‍ । अत्र हि निषेध्यस्य भगवत: पुण्डरीकाक्ष-

स्यावर्ण्यत्वेनाप्रकृतया प्रकृतनिषेधाभावात्‍ । नहि पूर्वारोपिततामात्रेण प्रकृतत्वं वक्तुं शक्यम्‍ । प्रकृतपदस्यारोपविषयपरताया ‘ निषिद्धय विषय’-मित्यादिना क्त्वाप्रत्ययफळं ब्रुवता भवतैव तत्र स्फुटीकरणात्‍ । काव्य-प्रकाशकृतापि ‘ प्रकृतं यन्निषिध्यान्यत्साध्यते सा त्वपह्लुति: ’ इति सूत्रं व्याचक्षाणेन ‘ उपमेयमसत्यं कृत्वा’ इत्यादिना प्रकृतपदस्योपमेयपरतयैव

व्याख्यानाञ्च । प्राचीनमतसिद्धेयमपह्लुतिर्व्यड्रयत्वेनास्माभिरिहोच्यत इत्यपि कुशकाशावलम्बनमात्रम्‍, ‘ प्रकृतस्य निषेधेन ’ इत्यादिलक्षणं कुर्वता भवतैव तस्या बहि:करणात्‍ ।

एवमप्युक्तपद्ये कोऽलंकारो व्यड्रय इति चेत्‍ । विच्छित्तिवैलक्षण्ये-ऽतिरिक्त:, अन्यथा त्वपह्लुतिरेवास्तु । लक्षणं तु तदा प्रसक्तयक्तिंचिद्वस्तु-निषेधसामानाधिकरण्येन क्तियमाणवस्त्वन्तरारोपत्वमेव । तस्मात्सर्व-मेवेदमह्लदयंगमं सह्लदयानाम्‍ ।

इति रसगड्राधरे अपह्रतिप्रकरणम्‍ ।

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2018-01-17T19:36:31.5000000

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गंगा

  • गंगा घेणें-उचलणें 
  • गंगा हातात घेऊन शपथ करणें 
  • n. एक स्वर्गीय देवी । एक समय सब देवियॉं ब्रह्मदेव के पास गयी । उनके साथ गंगा तथा इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न महाभिष भी गया । यकायक इनके वस्त्र वायु के कारण उड गये । सब लोगों ने सिर नीचे कर लिया । परंतु महाभिष निःशंक इनकी ओर देखता रहा । यह देख कर ब्रह्माजी ने शाप दिया “तुम मृत्युलोक में जन्म लोगे एवं गंगा तुम्हारी स्त्री होगी । वह तुम्हें अप्रियसे कृत्य करेगी । तुम्हें इसके कृत्यों के प्रति क्रोध उत्पन्न होगा । तब मुक्त हो कर तुम इस लोक में आओगे” । शाप सुन कर महाभिष ने प्रतीप के पेट में जन्म लेने का निश्चय किया । वसिष्ठ के शाप के कारण मृत्युलोक में आने वाले अष्टवसु इसे राह में मिले । उन्होंने इसके पेट में जन्म लेने का निश्चय किया । परंतु उन्होंने यह शर्त रखी कि, जो भी पुत्र जन्म लेगा, इसे यह जल में छोड देगी । परंतु इसने भी यह शर्त रखी कि, जिससे मैं विवाह करुँगी उसे पुत्रेच्छा अवश्य रहेगी, इसलिये कम से कम एक पुत्र जीवित रहना ही चाहिये । तब अष्टवसुओं ने मान्य किया कि, अपने वीर्य से एक पुत्र वे इसे देंगे । वह वीर्यवान् परंतु निपुत्रिक रहेगा । भगीरथ स्वर्ग से अपने पितरों के उद्धार के लिये गंगा नीचे लाया । जब यह समुद्र की ओर जा रही थी, तब राह में जुह्र ने इसे प्राशन कर लिया, तथा पुनः छोड दिया (भगीरथ एवं जह्रु देखिये)। एकबार प्रतीप ध्यानस्थ बैठा था । तब गंगा पानी से बाहर आई तथा उसकी दॉई गोद में आ कर बैठ गई । यह देख कर उसने इसकी इच्छा पूँछी । इसने अपना स्वीकार करने के लिये कहा । तब दॉंई गोद में बैठने के कारण, स्नुषारुप में इसका स्वीकार करना उसने कबूल किया । गंगा ने अपनी शर्त रखीकि, आपकी स्नुषा होने के बाद, मैं जो कुछ भी करुँगी, उसके बारेमें अपका पुत्र कुछ भी हस्तक्षेप न करें । जब तक यह शर्त मान्य की जायेगी, तब तक आपके पुत्र का सहवास मैं मान्य करुँगी, तथा उसे सुख दूँगी । उसे पुण्यवान् पुत्र होंगे तथा उन्हीं के साथ उसे स्वर्गप्राप्ति होगी । इस प्रकार तय कर के गंगा अन्तर्धान हो गई । कुछ दिनों के बाद महाभिष ने प्रतीप के घर शांतनु नाम से जन्म लिया । बडा होने पर, उसें अपने पिता से सारा समाचार मालूम हुआ । बाद में गंगा शांतनु पास गई, तब उसने इससे विवाह किया । इसके कुल आठ पुत्र हुए । उनमें से सात को इसने पानी में डुबा दिया । आठवें पुत्र को शंतनु नेडुबाणे नहीं दिया । गंगा का आठवॉं पुत्र हे भीष्म है । बाद में उसे ले कर यह स्वर्लोक गई । वहॉं इसने सब प्रकार की शिक्षा उसे दी । शांतनु जब मृगया के हेतु आया, तब इसने भीष्म को उसे सौंप दिया [म.आ.९१-९३]। गंगा जान्हवी [म.उ.१७९.३];[ भी.११५.५२]। तथा भागीरथी [म.अनु.१३९.७]; आश्व. २.७ नामों से प्रसिद्ध है । भीष्म शांतनु को गंगाधार में पिंड दे रहा था । गंगा ने उसकी सहायता की [म.अनु.८४]। परशुराम से युद्ध करते समय, भीष्म के सारथी की मृत्यु हो गई । तब स्वयं घोडों को सम्हाल कर इसने भीष्म की रक्षा की [म.उ.१८३.१५-१६]। भीष्म ने अंबा का स्वीकार न करने के कारण, उसने तप कर के भीष्म वध के लिये पुरुषजन्म मॉंग लिया । एक बार नित्यक्रमानुसार, अंबा गंगास्नान करने गई थी, तब गंगा वहॉं आई । उसने इसे शाप दिया ‘तुम टेढी मेढी नदी बन कर केवल बरसात में ही बहोगी । अन्य दिनों में सूख जाओगी । बरसात में तुमारे पात्र में उतार भी नहीं मिलेगा’ [म.उ. १८७.३४-३५]। भीष्मवध के बाद इसके दुख का निरसन श्रीकृष्ण ने किया [म.अनु.२७४.२७ कुं.]। गंगा ने एकबार प्राचीमाधव नामक विष्णु से पूछा कि, ‘मुझमें पापी स्नान करते है । इन पापों से मेरी मुक्ति कैसी होगी?’ विष्णु ने इसे रोज पूर्ववाहिनी सरस्वती में स्नान करने के लिये कहा । परंतु गंगा को यह तापदायक प्रतीत हुआ । तब उसने इसे त्रिस्पृशा का व्रत करने के लिये कहा । उससे यह पापमुक्त हुई । एकादशी, द्वादशी तथा त्रयोदशी जिस एक तिथि को स्पर्श करते हैं, उस तिथि को त्रिस्पृशा कहते है । इस दिन सुवर्ण की विष्णुमूर्ति की पूजा की जाती है [पद्म. उ. ३४] 
  • f  The river Ganges. Consecrated water. 
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