विष्णुचित

भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।


सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी । जागत सोवत सरन तुम्हारी ॥

तुम्हहि छाडि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥

( रामचरितमानस )

दक्षिण भारतके पाण्डयदेशमें धन्विनगरमें मुकुन्द नामके एक ब्राह्मण रहते थे । वे सदाचारी, भगवदभक्त, शास्त्रज्ञ और धर्मात्मा थे । उनके कोई सन्तान नहीं थी । भगवानसे सन्तानकी प्रार्थना करनेपर स्वप्नमें पुत्र - प्राप्तिका आश्वासन उन्हें मिला । समय आनेपर उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ । बालकका नाम रक्खा गया विष्णुचित्त । बचपनसे ही उसमें दिव्य गुण थे । बड़े प्रेमसे वह भगवानकी कथा सुनता था । बच्चोंके साथ भी भगवानकी लीलाओंके ही खेल खेलता । माता - पिताकी आज्ञा मानता । उसे किसीसे लड़ते अथवा किसीकी निन्दा या शिकायत करते देखा ही नहीं गया । पिताने उसका यज्ञोपवीतसंस्कार कराया । इसके कुछ दिनों बाद पिताका परलोकवास हो गया ।

विष्णुचित्त दृष्ट - पुष्ट थे, मधुरभाषी थे, शरीरसे सुन्दर थे; किंतु जवानीमें भी उनपर कभी प्रमादका अधिकार नहीं हुआ । सन्ध्योपासन, वेदाध्ययन तथा साधु - सेवा उनकी निर्बाध चलती रही । भगवान् श्रीकृष्णको उन्होंने अपना आराध्य माना तथा उन श्यामसुन्दरके चरणोंपर ही आत्मसमर्पण कर दिया । रात - दिन वे श्रीकृष्णके नामका जप करते और उनके गुण - लीलाके चिन्तनमें मग्न रहते । उनका शरीर भी भगवानकी सेवामें ही लगा रहता था । कभी भगवानके लिये फूल चुनते, कभी माला गूँथते, कभी चन्दन घिसते, कभी नैवेद्य प्रस्तुत करते, कभी आरती उतारते । भगवानके स्मरण, नाम - जप और पूजनके अतिरिक्त और कोई काम नहीं था उनके पास ।

विष्णुचित्तजीने, भगवानकी सेवाके लिये पुष्प मिलें, इसलिये एक सुन्दर बगीचा लगाया था । उसी बगीचेमें मन्दिर बनाकर उन्होंने भगवानके श्रीविग्रहकी स्थापना की थी और स्वयं भी भगवानकी सेवा करते हुए वहीं रहते थे । उस देशके राजा उधरसे कही घोड़ेपर बैठे जा रहे थे । बगीचा देखकर वे विश्रामके लिये भीतर गधे । घोड़ेसे उतरकर उन्होंने भगवानके दर्शन किये । विष्णुचित्तके तेजस्वी शरीर एवं भजनमें लीन भावको देखकर राजाकी उनमें श्रद्धा हो गयी । राजाने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उपदेश करनेकी प्रार्थना की ।

विष्णुचित्तजीने कहा - ' जैसे बनजारे आठ महीने देशविदेशमें व्यापार करके चौमासेमें उसे घर बैठकर खाते हैं, वैसे ही जीवके लिये मनुष्य - जन्म कमाई करनेका और दूसरे सब जन्म भोगनके हैं । मनुष्य - जन्ममें यदि कमाई ठीक न हो तो दूसरे जन्मोंमें उसका फल कष्ट भोगना ही पड़ेगा । मनुष्य - जन्ममें जो पुण्य करते हैं, उन्हें देवता आदिके उत्तम शरीर मिलते हैं और पाप करनेवाले नरकमें जाते है तथा कीट - पतङ्ग आदि शरीरोंमें जन्म लेकर भयंकर कष्ट भोगते हैं । इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको पाप तो भूलकर भी नहीं करना चाहिये । उसे पुण्य ही करना चाहिये । परंतु मनुष्य - जन्मकी सफलता पुण्य करनेमें भी नहीं है । पुण्य करनेसे भी जन्म तो लेना ही पड़ता है । मनुष्य - जन्मकी सफलता तो जन्म - मरणके बन्धनसे छूट जानेमें है । श्रीकृष्णके भजनसे ही यह बन्धन छूटता है । पता नहीं, पृथ्वीपर कितने राजा हुए । एक - से - एक प्रतापी राजाओंको भी काल खा गया । इसलिये तुम राजमदमें आकर जीवन नष्ट मत करो । पाप करके या विषय - भोगोंमें लगकर इस दुर्लभ जन्मको मत गँवाओ । भगवान् श्रीकृष्ण ही जीवके सच्चे स्वामी हैं । तुम अपनेको उन्हींके चरणोंमें समर्पित कर दो । उनके नामका जप करो । उनके गुण गाओ । उनके चरणोंका चिन्तन करो । सभी प्राणियोंको उनका रुप मानकर उनकी सेवा करो । राज्यको उन पुरुषोत्तमका मानो और तुम दीवान बन जाओ । अपने काममें उतना ही राज्य - धन्लो, जितना शरीरके लिये अत्यन्त आवश्यक हो । केवल भगवानको निवेदित प्रसाद ही सबको देकर ग्रहण करो । दयामय भगवान् इस प्रकार रहनेसे तुमपर कृपा करेंगे ।'

राजाने उपदेश हदयसे ग्रहण किया । उसकी विषयासक्ति दूर हो गयी । उसकी प्रत्येक किया भगवत्प्रीत्यर्थ होने लगी । उसका जीवन ही पूजामय हो गया । कुछ समय बाद उसे और विष्णुचित्तको भगवानने प्रत्यक्ष दर्शन दिया । श्रीलक्ष्मीनारायणके दर्शन करके वे कृतार्थ हो गये । दोनों गुरु - शिष्य भगवत्कैङ्कर्य प्राप्तकर परम धाम सिधारे ।

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Last Updated : April 28, 2009

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