निषाद वसु

भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।


दक्षिण भारतमें वेंकटगिरि ( बालाजी ) सुप्रसिद्ध तीर्थ है । महर्षि अगस्त्यकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णुने वेङ्कटाचलको अपनी नित्य निवास - भूमि बनाकर पवित्र किया है । पर्वतके मनोरम शिखरपर स्वामिपुष्करिणी तीर्थ है, जहाँ रहकर पार्वतीनन्दन स्कन्द स्वामी प्रतिदिन श्रीहरिकी उपासना करते हैं । उन्हींके नामपर उस तीर्थको स्वामिपुष्करिणी कहते हैं । उसके पास ही भगवानका विशाल मन्दिर है, जहाँ वे श्रीदेवी और भूदेवीके साथ विराजमान हैं । सत्ययुगमें अञ्जनागिरि, त्रेतामें नारायणगिरि, द्वापरमें सिंहाचल और कलियुगमें वेङ्कटाचलको ही भगवानका नित्य निवास - स्थान बताया गया है । कितने ही प्रेमी भक्त यहाँ भगवानके दिव्य विमान एवं दिव्य चतुर्भुज स्वरुपका सुदुर्लभ दर्शन पाकर कृतार्थ हो चुके हैं । श्रद्धालु पुरुष सम्पूर्ण पर्वतको ही भगवत्स्वरुप मानते हैं ।

पूर्वकालमें वेंकटाचलपर एक निषाद रहता था । उसका नाम था वसु । वह भगवानका बड़ा भक्त था । प्रतिदिन स्वामिपुष्करिणीमें स्नान करके श्रीनिवासकी पूजा करता और श्यामाक ( सावाँ ) के भातमें मधु मिलाकर वही श्रीभूदेवियोंसहित उन्हें भोगके लिये निवेदन करता था । भगवानके उस प्रसादको ही वह पत्नीके साथ स्वयं पाता था । यही उसका नित्यका नियम था । भगवान् श्रीनिवास उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते और उससे वार्तालाप करते थे । उसके और भगवानके बीचमें योगमायाका पर्दा नहीं रह गया था । उस पर्वतके एक भागमें सावाँका जंगल था । वसु उसकी सदा रखवाली किया करता था, इसलिये कि उसीका चावल उसके प्राणाधार प्रभुके भोगमें काम आता था । वसुकी पत्नीका नाम था चित्रवती । वह बड़ी पतिव्रता थी । दोनों भगवानकी आराधनामें संलग्न रहकर ठनके सान्निध्यका दिव्य सुख लूट रहे थे । कुछ कालके बाद चित्रवतीके गर्भसे एक सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ । वसुने उसका नाम ' वीर ' रक्खा । वीर यथानाम - तथागुणः था । उसके मनपर शैशवकालसे ही माता - पिताके भगवच्चिन्तनका गहरा प्रभाव पड़ने लगा । जब वह कुछ बड़ा हुआ, तब प्रत्येक कार्यमें पिताका हाथ बँटाने लगा । उसके अन्तःकरणमें भगवानके प्रति अनन्य भक्तिका भाव भी जग चुका था ।

भगवान् बड़े कौतुकी हैं । वे भक्तोंके साथ भाँति - भाँतिके खेल खेलते और उनके प्रेम एवं निष्ठाकी परीक्षा भी लेते रहते हैं । एक दिन वसुको ज्ञात हुआ कि घरमें मधु नहीं हैं । भगवानके भोगके लिये भात बन चुका था । वसुने सोचा -- ' मधुके बिना मेरे प्रभु अच्छी तरह भोजन नही कर सकेंगे ।' अतः वह वीरको सावाँके जंगल और घरकी रखवालीका काम सौंपकर पत्नीके साथ मधुकी खोजमें चल दिया । बहुत विलम्बके बाद दूरके जंगलमें मधुका छत्ता दिखायी दिया । वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । उसने युक्तिसे मधु निकाला और घरकी और प्रस्थान किया ।

इधर निषाद - कुमार वीरने यह सोचकर कि ' भगवानके भोगमें विलम्ब हो रहा है ' तैयार किये हुए भातको एक पात्रमें निकाला । उसमेंसे कुछ अग्निमें डाल दिया और शेष सब भात वृक्षकी जड़में स्थापित करके भगवानका आवाहन किया । भगवानने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उसका दिया हुआ भोग स्वीकार किया । तत्पश्चात् प्रभुका प्रसाद पाकर बालक वीर माता - पिताके आनेकी बाट देखने लगा । वसु अपनी पत्नीके साथ जब घर पहुँचा, तब देखता है, वीरने भातमेंसे कुछ अंश निकालकर खा लिया है । इससे उसे बड़ा दुःख हुआ । ' प्रभुके लिये जो भोग तैयार किया गया था , उसे इस नादान बालकने उच्छिष्ट कर दिया ! यह इसका अक्षभ्य अपराध है ।' यह सोचकर वसु कुपित हो उठा । उसने तलवार खींच ली और वीरका मस्तक काटनेके लिये हाथ ऊँचा किया । इतनेमें ही किसीने पीछेसे आकर वसुका हाथ पकड़ लिया । वसुने पीछे वृक्षकी ओर घूमकर देखा तो भक्तवत्सल भगवान् स्वयं उसका हाथ पकड़े खड़े हैं । उनका आधा अङ्ग वृक्षके सहारे टीका हुआ है । हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं । मस्तकपर किरीट, कानोंमें मकराकृति कुण्डल, अधरोंपर मन्द मन्द मुसकान और गलेमें कौस्तुभमणिकी छटा छा रही है । चारों ओर दिव्य प्रकाशका पारावार - सा उमड़ पड़ा है ।

वसु तलवार फेंककर भगवानके चरणोंमें गिर पड़ा और बोला -- ' देवदेवेश्वर ! आप क्यों मुझे रोक रहे हैं ? वीरने अक्षम्य अपराध किया है ।'

भगवान् अपनी मधुर वाणीसे कानोंमें अमृत उड़ेलते हुए बोले -- ' वसु ! तुम उतावली न करो ! तुम्हारा पुत्र मेरा अनन्य भक्त है । यह मुझे तुमसे भी अधिक प्रिय है । इसीलिये मैंने इसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया है । इसकी दृष्टिमें मैं सर्वत्र हूँ, किंतु तुम्हारी दृष्टिमें केबल स्वामिपुष्करणीके तटपर ही मेरा निवास हैं ।'

भगवानका यह वचन सुनकर वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । वीर और चित्रवती भी प्रभुके चरणोंमें लोट गये । उनका दुर्लभ कृपा - प्रसाद पाकर यह निषाद - परिवार धन्य - धन्य हो गया !

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Last Updated : April 28, 2009

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