रोमहर्षणजी

भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।


आलोढ्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।

इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥

' सब शास्त्रोंका मन्थन करके तथा पुनः पुनः विचार करके यही निष्कर्ष निकाला है कि भगवान् नारायण ही सदा ध्यान करने योग्य हैं ।'

श्रीरोमहर्षणहजी सूत जातिके थे । ये भगवान् वेदव्यासजीके परम प्रिय शिष्य थे । भगवान् व्यासने इन्हें समस्त पुराणोंको पढ़ाया और आशीर्वाद दिया कि ' तुम समस्त पुराणोंके वक्ता होओगे ।' इसीलिये ये समस्त पुराणोंके वक्ता माने जाते हैं । ये सदा ऋषियोंके आश्रमोंमें धूमते रहते थे और सबको पुराणोंकी कथा सुनाया करते थे । नैमिपारण्यमें अठासी हजार ऋषि निवास करते थे । सूतजी उनके यहाँ सदा कथा कहा करते थे । यद्यपि ये सूत जातिके थे, फिर भी पुराणोंके वक्ता होनेके कारण समस्त ऋषि इनका आदर करते थे और उच्चासनपर बिठाकर इनकी पूजा करते थे । इनकी कथा इतनी अद्भुत होती थी कि आसपासके ऋषिगण जब सुन लेते थे कि अमुक जगह सूतजी आये हैं, तब सभी दौड़-दौंडकर इनके पास आ जाते और विचित्र कथाएँ सुननेके लिये इन्हें घेरकर चारों ओर बैठ जाते । पहले तो ये सब ऋषियोंकी पूजा करते, उनका कुशल - प्रश्न पूछते और कहते - ' ऋषियो ! आप कौन - सी कथा मुझसे सुनना चाहते हैं ?' इनके प्रश्नको सुनकर शौनक या कोई वृद्ध ऋषि किसी तरहका प्रश्न कर देते और कह देते - ' रोमहर्षण सूतजी ! यदि हमारा यह प्रश्न पौराणिक हो और पुराणोंमें गाया हो, तो इसका उत्तर दीजिये ।'

ऐसी कौन - सी बात है, जो पुराणोंमें न हो । पहले तो सूत उनके प्रश्नका अभिनन्दन करते और फिर कहते -- अपने गुरु भगवान् व्याससे जो कुछ सुना है, उसे आपके सामने कहता हूँ, सावधान होकर सुनिये ।' इतना कहकर सूतजी कथाका आरम्भ करते और यथावत् समस्त प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कथाएँ सुनाते । इस प्रकार ये सदा भगवतलीलाकीर्तनमें लगे रहते थे । इनसे बढ़कर भगवानका कीर्तनकार कौन होगा । इनकी मृत्यु भगवान् बलदेवजीके द्वारा हुई । नैमिषारण्यमें तीर्थयात्रा करते हुए बलदेवजी पहुँचे । ये उस समय व्यासासनपर बैठे थे । उन्हें देखकर उठे नहीं । इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया और उन्होंने इनका सिर काट लिया । ऋषियोंने बलरामजीसे कहा -- ' यह आपने अच्छा नहीं किया, हमने इन्हें दीर्घ आयु देकर इस उच्चासनपर बिठाया था । आपको ब्रह्महत्याका पाप लगा है, आप प्रायश्चित्त करें ।' ऋषियोंकी आज्ञा बलदेवजीने शिरोधार्य की और उन्होंने जैसा प्रायश्चित्त बताया था, वैसा किया । उस समयसे इनके पुत्र उग्रश्रवाको वह गद्दी दी गयी और तबसे रोमहर्षणकी जगह उग्रश्रवा पुराणोंके वक्ता हुए । ' आत्मा वै जायते पुत्रः ' के नाते उग्रश्रवामें अपने पिताके समस्त गुण मौजूद थे ।

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Last Updated : April 28, 2009

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