भजन - बेषधारी हरिके उर सालैं । ...

हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।


बेषधारी हरिके उर सालैं ।

लोभी, दंभी, कपटी नट-से, सिस्त्रोदरको पालैं ॥१॥

गुरु भये घर घरमें डोलैं, नाम धनीको बेंचैं ।

परमारथ सपने नहिं जानैं पैसनहीको खैंचैं ॥२॥

कबहुँक बकता ह्वै बनि बैठे, कथा भागवत गावैं ।

अरथ अनरथ कछू नहिं भाषैं, पैसनहीकों धावैं ॥३॥

कबहुँक हरिमंदिरकों सेवैं, करैं निरंतर बासा ।

भाव भगतिकौ लेस न जानैं, पैसनहीकी आसा ॥४॥

नाचैं, गावैं, चित्र बनावैं, करैं काब्य चटकीली ।

साँच बिना हरि हाथ न आवै, सब रहनी है ढीली ॥५॥

बिनु बिबेक-बैरागय भगति बिनु सत्य न एकौ मानौ ।

भगवत बिमुख कपट चतुराई, सो पाखंडै जानौ ॥६॥

इतने गुन जामें सो संत ।

श्रीभागवत मध्य जस गावत, श्रीमुख कमलाकंत ॥

हरिकौ भजन साधुकी सेवा सर्वभूत पर दाया ।

हिंसा, लोभ, दंभ, छल त्यागै, बिषसम देखै माया ॥

सहनसील, आसय उदार अति, धीरजसहित बिबेकी ।

सत्य बचन सबसों सुखदायक, गहि अनन्य ब्रत एकी ॥

इंद्रीजित, अभिमान न जाके, करै जगतकों पावन ।

भगवतरसिक तासुकी संगति तीनहुँ ताप नसावन ॥

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Last Updated : December 22, 2007

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