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m manobodha

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अग्नि VI.

  • n. ब्रह्मदेव का मानसपुत्र । उसके कोपसे इसकी उत्पत्ति हुई [म.शां.४८.१६] । दक्ष प्रजापती की कन्या स्वाहा इसकी पत्नी [म.व.२२९];[ भा.४.१.६०] । दूसरी पत्नी इक्ष्वाकुवंश के दुर्योधन राजा की कन्या सुदर्शना [म.अनु.२.२१] । प्रथम पत्नी स्वाहा माहिष्मती नगरी के राजा नीलध्वज की कन्या । नीलध्वज ने अपनी कन्या अग्नी को देते समय ऐसा करार किया था कि, वह निरन्तर नीलध्वज की नगरी में ही रहे, और जो भी शत्रु माहिष्मती नगरी पर आक्रमण करे, उसका सैन्य जला डाले । इस करार के कारण अग्नि अपने श्वसुरगृह में घर-जमाई बन कर रहने लगा । आगे चल कर जब अर्जुन की सेना से नीलध्वज को लडना पडा, तब अग्नि ने अर्जुन की सेना को जला दिया [जै.अ.१५] । इसने सहदेव की सेना भी जलाई परंतु अन्त में सहदेव द्वारा स्तुति की जाने पर यह वापस लौटा [म.स.२८] । सप्तर्षियों का हविर्द्रव्य देवताओं को अर्पण कर के लौटते समय, सप्तर्षि की पत्नियॉं इसे दृग्गोचर हुई । तब इसके मन में कामवासना उत्पन्न हुई तथा उनकी प्राप्ति की इच्छासे गार्हपत्य में प्रविष्ट हो कर यह चिरकाल तक उनके पास रहा । परन्तु वे इसके वश में न आने के कारण, अत्यंत निराश हो कर देहत्याग का निश्चय कर के यह अरण्य में गया । परंतु उन स्त्रियों में से दक्षकन्या स्वाहा की प्रीती अग्नि से होने के कारण, वह इसके पीछे वन में गई तथा उसने अन्य सप्तर्षि-पत्नियों का स्वरुप धारण कर के इसकी इच्छापूर्ति की [म.व.२१३-२१४] । परन्तु वह अरुंधती का रुप न ले सकी । प्राचीन काल में श्वेतकी ने अपरिमित यज्ञ किये । उसके द्वारा किये गय यज्ञसत्र में, बारह वर्षो तक, अग्नि लगातार हविर्द्रव्य भक्षण कर रहा था । इस कारण इसमें स्थूलता उत्पन्न हो कर, उसपर उपाय पूछने के लिये यह ब्रह्मदेव के पास गया । तब ब्रह्मदेव ने इसे खांडववन का भक्षण करने के लिये कहा । इसलिये इसने उसे जलाना प्रारंभ किया परन्तु इन्द्र ने लगातार पर्जयवृष्टि कर के सात बार इसका पराभव किया । अन्त में निराश हो कर यह पुनः ब्रह्मदेव के पास गया तथा सारा वृत्तान्त उन्हे निवेदित किया । तब भूलोक में जा कर कृष्णार्जुन से खांडववन मांगने की सलाह ब्रह्मदेव ने इसको दी । यह ब्राह्मणरुप से कृष्णार्जुन के पास आया तथा इसने भक्षण करने के लिये वह वन मांगा । तब अर्जुन ने कहा कि, हमारे पास युद्धसामग्री की न्यूनता है, वह अगर तुमने हमें दी तो हम इंद्र से तुम्हारीं रक्षा करेंगे । अग्नि ने वरुण के पास से, श्वेतवर्णीय अश्वों से जुता हुआ तथा कपिध्वजयुक्त एक दिव्य रथ, गांडीव नामक धनुष तथा दो अक्षय तूणीर मांग कर, अर्जुन को दिये तथा श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र तथा उन्होंने अग्नि के संरक्षण का वचन दे कर, उसे खांडववन का भक्षण करने के लिये कहा । तब अग्नि उस वन का भक्षण करने लगा । यह समाचार इन्द्र को मिलते ही, वह अग्नि का निवारण करने के लिये, वहॉं आ कर पर्जन्यवृष्टि करने लगा । परंतु कृष्णार्जुन ने उसका पराभव किया । पंद्रह दिनों तक खांडववन का आतृप्त भक्षण करणे के बाद, अग्नि की स्थूलता नष्ट हूई । इस वन से तक्षकपुत्र अश्वसेन, मयासुर तथा महर्षि मन्दपाल के चार पुत्र शार्ङ्गक पक्षी केवल बचे [म.आ.२१७.१८] । इक्कीस दिन तक, अग्नि लगातार वह बन दग्ध कर रहा था [म.आ.२२५.१५] । वृत्र को मारने के बाद, ब्रह्महत्या के भय से भागे हुए इन्द्र की खोज, बृहस्पति के कहने से इसने की [म.उ१५.१६] । आगे चल कर उस ब्रह्महत्या से इन्द्र का छुटकारा करने के लिये ब्रह्मदेव ने उसके चार भाग किये । उसका चौथा भाग अग्नि ने ग्रहण किया [म.शा.२७३] । एक बार जब भृगु समिधा लाने के लिये वन में गया था, तब दमन नामक राक्षस उसके तथा उसकी पत्नी के बारे में पूछताछ करने लगा । तब भयभीत हो कर अग्नि ने चुराली की तथा भृगुपत्नी का पता बता दिया । भृगु ने लौटने पर चुगली करने के कारण अग्नि को शाप दिया कि ‘तुम सर्वभक्षक बनोंगे’। इसपर अग्नि ने उःशाप मांगा । तब भृगु ने ‘सर्वभक्षक होते हुए भी तुम पवित्र ही रहोगे’ ऐसा उःशाप दिया [पद्म.पा.१४] । भृगु स्नान करके बाहर गया, यह देख कर उसके आश्रम में, पुलोमा नामक राक्षस प्रविष्ट हुआ तथा उसने अग्नि से पूछा कि, भृगुपत्नी पुलोमा को मैनें पहले मन से वरण किया यह सत्य है या असत्य । अग्नि ने बताया कि, ये सत्य है, इसलिये भृगु ने उसे उपरोक्त शाप दिया [म.आ.५-७] । भृगु के इस शाप के कारण अग्नि जल में गुप्त हो गया । इससे देवदेवताओं के यज्ञयागकर्म बंद हो गये । देवताओं द्वारा इसका शोध होने पर मत्स्योने अग्नि दर्शाया । तब देवताओं ने इसकी स्तुति की जाने पर, यह बाहर आया तथा पूर्ववत् अपना कार्य करने लगा [म.आ.७];[ म. श.२७];[ म. व.२२४] । ऋग्वेद में अग्नि के गुप्त होने का यह कारण बताया है । वषट्‍काररुप वज्र से बांधवों की मृत्यु होने के कारण, सौचीक नामक अग्नि, वषट्‍कार तथा हवि उठा ले जाने में डर गया तथा देवताओं से निकल कर जल में भाग गया [ऋ.१०.५१] । यहॉं अग्नि-देव संवाद है । ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व के संबंध में, अग्नी का इन्द्र से संवाद हुआ था [म.अनु.१४] । उसी प्रकार गाय, ब्राह्मण तथा अग्नि को पादस्पर्श करने वाले पर भयंकर आपत्ति आती है इस अर्थ का धर्मकथन इसने किया है [म.अनु.१२६] । सीता को लंका से लाने के बाद, जब राम उसका स्वीकार नहीं कर रहा था, तब अग्नी ने बताया कि, सीता निरपराध है [म.व.२७५.२७] । इस स्वाहा नामक पत्नी से स्कंद.नामक पुत्र उत्पन्न हुआ [म.व. २१४] । इसके अलावा, इसी पत्नी से पावक, पवमान व शुचि नामक तीन पुत्रों ने जन्म लिया [भा.४.१.६०-६१] । सुदर्शना नामक पत्नी से इसे सुदर्शन नामक पुत्र हुआ [म.अनु.२.३७] । इसके सिवा, स्वारोचिष नामक इसके पुत्र का उल्लेख पाया जाता है [भा.८.१.१९]; आप् देखिये । अंगिरा की मांग के अनुसार, अग्नी ने उसे बृहस्पति नामक पुत्र दिया । अंगिरा की पत्नी तारा । इसी से अग्निवंश की वृद्धि हुई [म.व.२०७-२१२] । पावक, पवमान तथा शुचि इन अग्निपुत्रों से कुल ४९ अग्नि उत्पन्न हुए [भा.४.१.६०-६१];[ वायु.२९];[ ब्रह्मांड. २.५३] । अग्निपुत्रो के संख्या के बारे में और भी प्रकार दिये है [मत्स्य.५१] । परंतु वस्तुतः यह अग्नि का वंश न होकर स्वयं अग्नि के विभिन्न स्वरुप है । (वैश्वानर देखिये) । ऋग्वेदके एक सूक्त का दृष्टा अग्नि बताया गया है [ऋ.१०.१२४] (मांधातृ और नीलध्वज देखिये) 
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