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उर्वशी

See also URVAŚĪ I , URVAŚĪ II
n.  एक अप्सरा की तरह ऋग्वेद के काल से प्रसिद्ध है । ऋग्वेद में उर्वशी के एक संवादात्मक सूक्त में बहुत सी ऋचायें हैं [ऋ. १०.९५] उर्वशी शब्द ऋग्वेद में कई बार आया है [ऋ.४.२.१८,५.४१.१९,७. ३३.११,१०.१५. १०, १७] । तथापि अंतिम तीन स्थानों पर तो निश्चित्त रुप से व्यक्तिवाचक शब्द है । सातवें मंडल में इससे वसिष्ठ उत्पन्न हुआ ऐसा बताया गया है तथा दसवें मंडल में उर्वशी-पुरुरवा संवाद है । शर्त के अनुसार, राजा नग्न अवस्था में दिखाई दिने के कारण उर्वशी उसे छोडकर जाती है । वह छोडकर न जावे इसलिये राजा पागल की तरह भटकते भटकते एक सरोवर के पास आया । वहां वह सखियों के साथ क्रीडा कर रही थी । उस स्थान पर राजा तथा उर्वशी का संवाद हुआ जो ऋग्वेद में वर्णित है [श. ब्रा. ११.५.१. मा. ९.१४] । उर्वशी गर्भवती थी इसलिये उसने राजा के पास आना अस्वीकर कर दिया । संक्षेप में संवाद का यही सार है । अपने लिये प्राणत्याग करने को प्रवृत्त हुए राजा को प्राणत्याग से निवृत्त होने को बता कर उर्वशी ने नारी स्वभाव की अच्छी कल्पना राजा को दी । उर्वशी देवों में से भी है ऐसा वहां वर्णित है । इसीलिये उसने राजा को सुझाया है कि मृत्यु के बाद स्वर्ग में आने पर उसे उसका सहवास प्राप्त होगा । उर्वशी को देखकर वासतीवरसत्र में मित्रावरुणों का रेत स्खलित हुआ तथा उनसे वालोपरांत अगस्त्य तथा वसिष्ठ उत्पन्न हुए [सर्वानुक्रमणी. १.१६६];[ बृहद्दे. २.३७,४४.१५६,३.५६] । उर्वशी पुरुरवस का आख्यान बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध है । अप्सराओं का निर्देश ऋग्वेद में है । नर नारायण ऋषि बदरिकाश्रम में तप कर रहे थे । वे इंद्रपद न ले लें, इस भय से इंद्र वसंत, काम एवं मेनका, रंभा, तिलोत्तमा, घृताची आदि सोलह हजार पचास अप्सराओं को उन्हें तप से परावृत्त करने के लिये भेजा [दे.भा. ४.६] । विष्णुपुराण में ऐसा वर्णन है कि पुराणपुरुष विष्णु गंधमादन पर तप कर रहे थे तब यह मदनसेना भेजी गयी थी [पद्म. सृ.२२] । गायनादि प्रकारों से उन्हें मोहित करने के कई प्रयत्न किये गये; परंतु सब निष्फल हुआ देख वे सब खिन्न हो गये । नरनारायणों ने उन सबका अत्यंत मधुर शब्दों से आदरातिथ्य कर के, पूछा कि आपका यहा आगमन किस हेतुसे हुआ हैं? जिससे कामादि लज्जित हो अधोमुख कर स्तब्ध खडे हो गये । इतने में उन्होंने देखा कि नारायण की जंघा से सोलह हजार इक्कावन अप्सरायें प्रगट हुई जिनमें उर्वशी अत्यंत सुंदर थी । यह उरु अर्थात् जंघा से उत्पन्न हुई इसलिये इसका नाम उर्वशी हुआ । नरनारायणों ने इंद्र को भेंट करने के लिये नयनाभिरामा उर्वशी कामादि के सुपुर्द की । तदुपरांत सब अप्सराओं ने नरनारायणों की सेवा में रहने के लिये प्रार्थना की, परंतु नरनारायणों ने उनकी सेवा स्वीकार नहीं की [दे. भा.४.६];[ भा.११.४];[ मत्स्य. ६०] । यह एक बार सूर्याराधना को जा रही थी । तब इसने मित्र आदित्य को वरण करने का आश्वासन दिया । आगे वरुण मिला उसने भी इसे वरण करने का अभिवचन मांगा । तब इसने मित्र को वचन देने की बात बताई । वरुण ने बाद में इससे प्रेमयाचना की तथा वह इसने दिया । तदुपरांत वरुण ने इसे उद्देश कर एक कुंभ में अपना वीर्य डाला । मित्र को यह समझते ही उसने इसे शाप दिया “मृत्युलोक में पुरुरवा की स्त्री हो" । तथा अपना वीर्य एक कुंभ में डाला । इन दोनों कुंभो कें वीर्य से अगस्त्य तथा वसिष्ठ का जन्म हुआ [पद्म. सृ.२२];[ भा.९.१४];[ मत्स्य.६०];[ वा. रा. उ. ५६.५७] । मित्रावरुण बदरिकाश्रम में तप कर रहे थे । उस समय सौंदर्यवती उर्वशी फूल तोडते हुए इन्हें दिखाई पडी । तब इनका रेत स्खलित हुआ जिससे अगस्त्य तथा वसिष्ठ का जन्म हुआ । उर्वशी को देखते ही मित्र का रेत स्खलित हुआ, जिसे उसने शाप के भय के कारण पैरों तले रौंद डाला । तब वसिष्ठ का जन्म हुआ [विष्णु ४.५] । एक बार नारद ने पुरुरवस् राजा की बहुत स्तुति की । इस कारण यह उस पर मोहित हुई [भा.९.१४] । पुरुरवस् पर मोहित होने के कारण लक्ष्मीस्वयंवर नामक प्रबंधनाटय करते समय कुछ हावभावों में भूल हो गयी । तब भरत ऋषि ने शाप दिया, कि तूम पचपन वर्ष लता बन कर रहोगी । शाप की अवधि समाप्त होने पर जब यह पुरुरवस् के पास जा रही थी, तब राह में केशी नामक दैत्य इसे उठा कर ले गया; परंतु सौभाग्यवश पुरुरवस् ने ही इसे मुक्त किया [पद्म. सृ १२.७६-८५];[ मत्स्य. २४.२३-३२] । तत्पश्चात् उर्वशी पुरुरवस् के नगर में आयी तथा उसने अपनी तीन शर्ते बतायी (१) इन दो भेडों को मैं पुत्रवत् पाल रही हूं उनका संरक्षण करना होगा, (२) मैं सदा घृताहार करुंगी (३) मैथुन अतिरिक्त कभी तुम्हें नग्न न देखूंगी। इन शर्तो का पालन करते हुए पुरुरवस् ने उर्वशी का चित्ररथ व नंदन आदि वनों तथा अलका आदि नगरों में ६१०००वर्षे तक उपभोग किया । परंतु बाद में तीसरी शर्त भंग हो जाने के कारण वह देवलोक गई । पुरुरवस् को इससे आयु आदि छः पुत्र हुए थे [भा. ९.१४-१५];[ विष्णु. ४.६-७];[ दे. भा. १.१३];[ म. आ. ७०.२२] । अर्जुन के जन्म के समय गायन करने वाली ग्यारह अप्सराओं में यह भी एक थी [म.आ.११४.५४] । कुबेर की सभा में उसकी सदा सेवा करने में यह निमग्न रहती है [म.स.१०.११] । अर्जुन इंद्र लोक में शिक्षा ग्रहण करने गया था । वहां एक बार इसकी ओर कुलकी जननी इस पूज्यभाव से अर्जुन ने देखा । यह बात इन्द्र के ध्यान में न आयी तथा उसने सोचा कि, शायद काम इच्छा से अर्जुन इसकी ओर देख रहा है इसलिये इंद्र ने चित्ररथ गंधर्व के द्वारा उर्वशी को समाचार भिजवाया तब यह सायंकाल में सुंदर वस्त्रों से सजधज कर अर्जुन के पास गयी परंतु अर्जुन ने खुद की भावना बत कर इसका निषेध किया । इच्छाभंग होने के कारण इसने अर्जुन को, ‘तू एक वर्ष तक नपुंसक बन कर रहेगा,’ ऐसा शाप दिया । तब इंद्र ने अर्जुन को सांत्वना दी कि तेरहवें वर्ष (अज्ञातवास में) यह शाप तेरे काम आयेगा [म.व.परि.१.६ प.१३२-१५०] । अष्टावक्र के सन्मान के लिये वरुण ने जिन अप्सराओं का नृत्य कराया था उनमें यह भी थी [म. अनु. १९.४४] । ‘अनेक पवित्र पदार्थ मेरा रक्षण करें; भीष्म के मुख से निकलने वाले इस उल्लेख में पवित्र अप्सराओं में उर्वशी का नाम है । [म. अनु. १६५.१५] । उर्वशी के नाम पर उर्वशीतीर्थ नामक एक पवित्र तीर्थस्थान प्रसिद्ध है (म.व.८२.१३६ देवव्रत देखिये) । यह ब्रह्म-वादिनी थी [ब्रह्मांड २.३३]

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फाटिक डोळे असल्यारि उपराटि चमकवुं येद

  • ( गो.) पाठीला डोळे असते तर उफराटें चालतां आलें असतें. माणूस आपल्या परोक्ष काय काय गोष्टी घडतात त्या पाहूं शकत नाहीं. नाहींतर कितीतरी आपत्तींचा प्रतिकार त्याला करतां आला असता. 
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