सत्ताइसवाँ पटल - हृदयाब्जकथन

रूद्रयामल तन्त्रशास्त्र मे आद्य ग्रथ माना जाता है । कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


वह अनाहत होने के कारण ’ अनाहत पद्‍म ’ नाम से कहा जाता है , जो योगियों के योग का साधन है , आनन्द का सदन है और सिद्धों से अधिष्ठित है । उसके ऊपर विशूद्धाख्य नामक पद‍म है जिसके दल में १६ पत्ते हैं , वे दल १६ वर्णों से विराजमान हैं । धूम्र के समान उनका वर्ण है तथा महाकान्तिमान् हैं ॥६५ - ६६॥

योगियों के अद्‍भुत स्थानभूत उन सिद्ध वर्णों का सर्वदा अभ्यास करना चाहिए । हंस का परम प्रकाश होने के कारण व्ह जीव को विशुद्ध ज्ञान देता है । इसलिए उसे विशुद्ध कह्ते हैं । वह आकाश के समान निर्मल है और अत्यन्त कन्तिमान् ‍ है । उसके ऊपर आज्ञाचक्र है जो अनेक प्रकार के अर्थों से अधिष्ठित है ।६७ - ६८॥

वहाँ से आज्ञा का संक्रमण होता है । वह आज्ञा गुरु के द्वारा होती है । ऐसा कहा गया है और उसके ऊपर कैलास है उसके ऊपर ज्ञान का निवास है । हे प्रभो ! इस प्रकार हमने चक्रों के विषय में आपसे कहा । उन सबसे ऊपर अत्यन्त निर्मल सर्वश्रेष्ठा सहस्त्रदल कमल है ॥६९ - ७०॥

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Last Updated : July 30, 2011

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