चौबीसवाँ पटल - शवसाधक विधिनिषेध

रूद्रयामल तन्त्रशास्त्र मे आद्य ग्रथ माना जाता है । कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


रात्रि के समय शव पर बैठकर पञ्चतत्त्च की साधना करे और दिन में अष्टाड्र योग करे । जितेन्द्रिय एवं विकाररहित पुरुष चाहे वह धनवान् ‍ हो चाहे दरिद्र हो धीर होकर चिन्ता आलस्य का त्याग कर शव सिद्धि करे । चिन्ता से लोभ , लोभ से काम उत्पन्न होता है । काम से मोह से आलस्य का सञ्चय होता है , आलस्य दोष समूहों से सद्यः तत्क्षण निद्रा उत्पन्न होती है ॥१२५ - १२७॥

महानिद्रा के परिणाम स्वरुप निश्चित रुप में मृत्यु होती है । असमय में निद्रा भङ्ग होने से निश्चित रुप से क्रोध उत्पन्न होता है । क्रोध से चित्त विकल होता है , चित्त विकल होने से श्वास की वृद्धि होती है , फिर जो अधिक श्वास के संक्षय होते ही आयु का क्षय होने लगता है ॥१२८ - १२९॥

श्वास की अधिकता से बल एवं बुद्धि का क्षय होने लगता है । बुद्धि के नष्ट होने से जड़ता आती है । जड़ता आती है । जड़ता से मन्त्र का जप नहीं हो पाता । जपहीन होने से श्वास का नाश और श्वसन प्रश्वसन का नाश होने पर मृत्यु होती है । इसलिए शरीर की रक्षा करते हुए पवित्रता पूर्वक जप करना चाहिए ॥१३० - १३१॥

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Last Updated : July 30, 2011

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