एकादश पटल - दिव्यभाव वीरभाव

रूद्रयामल तन्त्रशास्त्र मे आद्य ग्रथ माना जाता है । कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


हे शङ्कर ! अब जिस प्रकार दिव्यभाव में वीरभाव होता है उसे श्रवण कीजिए । जो पवित्रता पूर्वक मध्याहन से लेकर सन्ध्यापर्यन्त चित्त स्थिर रख कर किसी एकान्त निर्जन प्रदेश में जप तथा ( ध्यान एवं ) धारणा , करता है . वह निश्चित रुप से सिद्ध हो जाता है ॥३४ - ३५॥

वीरभाव की प्राप्ति के लिए ऊपर कहे गये काल में भावमात्र ही साधन है । क्योंकि भाव सिद्धि प्राप्त होती है । वीरभाव भाव ( त्रय ) से अलग पदार्थ नहीं है वही भाव है ॥३६॥

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Last Updated : July 29, 2011

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