चतुर्थ पटल - सूक्ष्मचक्र

रूद्रयामल तन्त्रशास्त्र मे आद्य ग्रथ माना जाता है । कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


सूक्ष्मचक्र --- अब शुभाशुभ फल देने वाले सूक्ष्म चक्र को कहती हूँ । हे शम्भो ! इसमें आये हुये अक्षरों वाले मन्त्र को ग्रहण कर जप करना चाहिए । बायी ओर से दाहिनी ओर सात रेखा खींचे ॥१६९ - १७०॥

फिर मन्त्रज्ञ साधक उन रेखाओंज को काटते हुये चार रेखा खीचें । इस प्रकार बने हुये उन उन गृहों में दाहिनी ओर से अङ्कों के अनुसार मन्त्रों के अक्षरों को साधक लिखे । हे शिव ! उन उन अङ्कों को प्रयत्नपूर्वक सुनिए । जो मनुष्य को भोग तथा मोक्ष देने वाले हैं ॥१७१ - १७२॥

हे नाथ ! प्रथम गृह में मन्त्र का दूसरा अक्षर लिखे । इसके बाद विष्णु मन्त्रादि गृह में चौथा अक्षर लिखे । इसके बाद आठवाँ अक्षर लिखे । फिर दूसरे के नीचे छठाँ अक्षर लिखे वह गृह शङ्कर का भी है , इसके पीछे वाले गृह में दशवाँ अक्षर लिखे ॥१७३ - १७४॥

इसके बाद बारहवाँ अक्षर लिखे जो नायिका का स्थान कहा जाता है , छठे अक्षर के नीचे दूसरा अक्षर लिखे । इसके पश्चात् ‍ आठवाँ अक्षर लिखे । वह गृह भी शंभु से व्यस्त है । इसके पश्चात ‍ आठवाँ अक्षर लिखे इसके बाद दो के नीचे वाले गृह में १४ वाँ अक्षर लिखे । उसके दक्षिण सूर्य में चौदहवें अक्षर को लिखे । इसके बाद १६ वाँ अक्षर लिखे । फिर अङ्कों को लिखे । और उसके दक्षिण चौथा वर्ण और उसके बाद अष्टमाक्षर लिखे । इसी प्रकार ब्रह्म मन्दिर भी है अब १६ के नीचे फिर सुनिए १७५ - १७८॥

अष्टम अङ्क का अक्षर लिखे , इसके बाद दुसरा , फिर १८ वाँ अक्षर लिखे । सूक्ष्मचक्र का फलविचार - प्रथम में रंहने वाला द्वीतीय में रहने वाला मन्त्राक्षर ग्रहण करे क्योंकि वह कल्याणकारी कहा गया है । तृतीय में रहने वाला मन्त्र वर्ण महापाप कारक है । ऐसा सभी मन्त्रों में कहा गया है । द्वितीय तथा प्रथम दुःखकारक है । किन्यु तृतीय सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाला है ॥१७९ - १८०॥

इसलिए , हे नाथ ! अपनी सिद्धि के लिए तृतीय अवश्य ग्रहण करे । तृतीय में प्रथम तृतीय कल्याणकारी है और द्वितीय तृतीय दुःखदायी है । तृतीय तथा अष्टाक्षर वाला गृह भयदायक है । द्वितीय में रहने वाला १४ वाँ अक्षर वाला सूर्य मन्त्र कल्याण देने वाला है ॥१८१ - १८२॥

तृतीय में रहने वाला १६ वाँ अक्षर वाला मन्त्र महाकल्याणदायक है । चतुर्थ में १६ वाँ अक्षर वाला अष्टमूर्ति मन्त्र शत्रुओं का मारक है । यदि वही तृतीय गृह मध्यस्थ हो , तो महाकल्याण कारक है । सर्वशेष गृह के मध्य में रहने वाला आठ अक्षर वाला मन्त्र का अष्टम अक्षर महाभद्र है । क्ष तथा म वर्ण चित्त को भय देने वाले हैं तथा शेष तीन गृहों में अठारहवाँ अक्षर शुभकारी हैं ॥१८३ - १८५॥

जिन साधकों के चित्त में जिन - जिन अक्षरों वाले मन्त्र की कामना हो , उनके शुभाशुभ फल को जान कर ही मन्त्र वर्णों का अभ्यास करना चाहिए । विष्णु - मन्त्र में स्थित मन्त्र , नायिक ( महाविद्या मन्त्र ) में स्थित महामन्त्र , शिवमन्त्र में स्थित मन्त्र , इसी प्रकार सूर्य में रहने वाले तथा ब्रह्म में रहने वाले मन्त्रों को केवल शाक्त साधक ही ग्रहण करने का अधिकारी है ॥१८६ - १८७॥

सामान्यतया वैष्णव विष्णु मन्त्र का तथा शैव केवल शैव मन्त्रों के ग्रहण का अधिकारी है । इसी प्रकार महाविद्याओं के मन्त्र का जप करने वाला नायिका मन्त्रों का अभ्यास करे । सूर्य मन्त्र का भक्त सूर्य मन्त्र का अभ्यास करे ॥१८८ - १८९॥

एक स्थान में , दो स्थान में तथा तृतीय स्थान में स्थित मन्त्रों का ज्ञान कर ही मन्त्र ग्रहण करे । अन्यथा अनिष्ट की आशङ्का बनी रहती है । दिव्य तथा वीर पथ का उपासक इस ( सूक्ष्मचक्र ) में परीक्षित किसी भी मन्त्र को ग्रहण करे - ऐसा उनके संप्रदाय का कथन है ॥१८९ - १९०॥

इसके बाद पाशुपतों का चक्र है जो निश्चय ही सर्वसिद्धिप्रद है । इस पाशुपत चक्र के प्रभाव से पाशुपत वीर मार्ग के उपासक के समान हो जाता है । ऐसा करने से भी साधक सर्व सिद्धियाँ प्राप्त कर संवत्सर के अन्त में शक्ति का दर्शन प्राप्त कर लेता है ॥१९१ - १९२॥

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Last Updated : July 29, 2011

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