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द्वितीयस्कन्धपरिच्छेदः - चतुर्थदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


अष्टङ्गयोग तथा योगसिद्धिका वर्णन

कल्यतां मम मरुष्व तावतीं कल्यते भवदुपासनं यया ।

स्पष्टमष्टविधयोगचर्यया पुष्टयाशु तव तुष्टिमाप्नुयाम् ॥१॥

ब्रह्मचर्यदृढतादिभिर्यमैराप्लवादिनियमैश्र्च पाविताः ।

कुर्महे दृढममी सुखासनं पङ्कजाद्यमपि वा भवत्पराः ॥२॥

तारमन्तरपुचिन्त्य संततं प्राणवायुमभियम्य निर्मलाः ।

इन्द्रियाणि विषयादथापहृत्यास्महे भवदुपासनोन्मुखाः ॥३॥

अस्फुटे वपुषि ते प्रयत्नतो धारयेम धिषणां मुहुर्मुहुः ।

तेन भक्तिरसमन्तरार्द्रतामुद्वहेम भवदङ्ध्रिचिन्तकाः ॥४॥

विस्फुटावयवभेदसुन्दरं त्वद्वपुः सुचिरशीलनावशात् ।

अश्रमं मनसि चिन्तयामहे ध्यानयोगनिरतास्त्वदाश्रयाः ॥५॥

ध्यायतां सकलमूर्मिमीदृशीमुन्मिषन्मधुरताहृतात्मनाम् ।

सान्द्रमोदरसरूपमान्तरं ब्रह्मरूपमयि तेऽवभासते ॥६॥

तत्समास्वदनरूपिणीं स्थिति त्वत्समाधिमयि विश्र्वनायक ।

आश्रिताः पुनरतः परिच्युतावारभेमहि च धारणादिकम् ॥७॥

इत्यमभ्यसननिर्भरोल्लसत्त्वत्परात्मसुखकल्पितोत्सवाः ।

मुक्तभक्तकुलमौलितां गताः संचेरम शुकनारदादिवत् ॥८॥

त्वत्समाधिविजये तु यः पुनर्मङ्क्षु मोक्षरसिकः क्रमेण वा ।

योगवश्यमनिलं षडाश्रयैरुन्नयत्यज सुषुम्णया शनैः ॥९॥

लिङ्गदेहमपि संत्यजन्नथो लीयते त्वयि परे निराग्रहः ।

ऊर्ध्वलोककुतुकी तु मूर्द्धतः सार्द्धमेव करणैर्निरीयते ॥१०॥

अग्निवासरवलर्क्षगैरुत्तरायणजुषा च दैवतैः ।

प्रापितो रविपदं भवत्परो मोदवान् ध्रुवपदान्तमीयते ॥११॥

आस्थितोऽथ महारालये यदा शेषवक्त्रदहनोष्मणार्द्यते ।

ईयते भवदुपाश्रयस्तदा वेधसः पदमतः पुरैव वा ॥१२॥

तत्र वा तव पदेऽथवा वसन् प्राकृतप्रलय एति मुक्तताम् ।

स्वेच्छया खलु विमुच्यते संविभिद्य जगदण्डमोजसा ॥१३॥

तस्य च क्षितिपयोमहोऽनिलद्योमहत्प्रकृतिसप्तकावृतीः ।

तत्तदात्मकतया विशन् सुखी याति ते पदमनावृतं विभो ॥१४॥

अर्चिरादिगतिमीदृशीं व्रजन विच्युतिं न भजते जगत्पते ।

सच्चिदात्मक भवद्गुणोदयानुच्चरन्तमनिलेश पाहि माम् ॥१५॥

॥ इति अष्टाङ्गयोगादिवर्णनं चतुर्थदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

प्रभो ! मुझे उतनी नीरोगता प्रदान कर दीजिये जितनीसे मैं आपकी उपासनाका अनुष्ठान कर सकूँ , क्योकि यह निश्र्चित है कि यदि मैं नीरोग हो जाऊँ तो सम्पूर्णरूपसे यम -नियमादि अष्टाङ्गयोगके अनुष्ठानद्वारा शीघ्र ही आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर लूँगा ॥१॥

ब्रह्मचर्यकी दृढ़ता आदि यमों तथा स्नान आदि नियमोंके द्वारा पवित्र होकर आपके परायण हुए हम पद्मासन आदि सुखासनोंकों भी दृढ़ कर रहे हैं ॥२॥

तदनन्तर अंदर प्रणवका निरन्तर अनुचिन्तन करके तथा प्राणवायुका (पूरक -रेचक -कुम्भकद्वारा ) संयमन करके निर्मल हुए हम इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटाकर आपकी उपासनामें तत्पर हो जायँगे ॥३॥

आपके अस्फुट श्रीविग्रहमें प्रयत्नपूर्वक बारंबार बुद्धिको लगायेंगे । उससे भक्तिरूपी रस और हृदयकी स्नेहार्द्रताको प्राप्त कर लेंगे । तत्पश्र्चात् हम आपके चरणोंकी चिन्तना करनेवाले हो जायँगे ॥४॥

जिसके पादादिकेशान्त अवयवभेद स्पष्टरूपसे प्रतीत हो रहे हैं ऐसे सौंन्दर्यशाली आपके श्रीविग्रका चिरकालतक धारणा -ध्यानके अभ्याससे अनायास ही मनमें ध्यान होने लगता है । इस प्रकार हम ध्यानयोगके परायण होकर आपके भक्त हो जायँगे ॥५॥

अयि भगवन् । आपकी ऐसी कलामयी मूर्तिका ध्यान करनेवालों तथा अभिव्यक्त हुई मधुरतासे अपहृत हुए मनवालोंके हृदयमें सान्द्रानन्दैकरसस्वरूप आपका स्वरूपभूत ब्रह्म अवभासित होता है ॥६॥

अयि विश्र्वनायक ! उस ब्रह्मका समास्वादन -सम्यगनुभव ही जिसका स्वरूप है ऐसी स्थिति आपकी समाधि है । उस समाधिके आश्रित हुए हम उस स्थानसे च्युत होनेपर पुनः धारणा आदिका आरम्भ करेंगे ॥७॥

प्रभो ! उपर्युक्त प्रकारसे धारणा -ध्यान -समाधिके अभ्यासद्वारा प्रचुररूपसे आविर्भूत हुए आपके स्वरूपपरब्रह्मानुभवजनित आनन्दसे निर्वुत्त उत्सववाले तथा जीवन्मुक्तों एवं भक्तसमूहोंके शिरोमणि होकर शुकदेव -नारद आदिकी

भॉंति विचरण करेंगे ॥८॥

अज ! आपमें समाधिके दृढ़ हो जानेपर , चाहे कोई सद्योमुक्तिका अभिलाषी हो अथवा क्रममुक्तिका , ये दोनों ही प्रकारके साधक प्राणायामके द्वारा वशीभूत हुए प्राणवायुको षट्चक्रोंके सहारे सुषुम्णा नाड़ीद्वारा धीरे -धीरे ऊपरको ले जाते हैं ॥९॥

तत्पश्र्चात् जो सद्योमुक्त्याग्रही साधक होता है , वह (प्राणवायुको भ्रूमध्य ——आज्ञाचक्रमें स्थापितकर ) लिङ्गशरीरका भी परित्याग कर देता है और पुनः ब्रह्मस्वरूप आपमें लीन हो जाता है । परंतु जो ऊर्ध्वलोकका अभिलाषी होता है , वह ब्रह्मरन्ध्रका भेदन करके इन्द्रियोंके साथ ही ऊपरको चला जाता है ॥१०॥

तदनन्तर अग्नि , वासर एवं शुक्लपक्षके अभिमानी तथा उत्तरायणके अभिमानी देवता उस जीवको ज्योतिश्र्चक्रतक पहूँचा देता हैं । वहॉं वह आपके परायण होकर आनन्दपूर्वक ध्रुवपदको प्राप्त कर लेता है । (इसका क्रम यों है —— पहले अग्निदेवता अग्निलोकके मार्गसे जीवको वासराभिमानी देवताके हाथमें पहुँचाते हैं , वह उत्तरायणके षण्मासाभि -मानी देवताको , वह संवत्सराभिमानी देवताको , वह देवलोकमार्गसे ले जाकर वायुदेवताको , वह वायुलोकके मार्गसे सूर्यदेवताको , वह आदित्यलोकके मार्गसे ले जाकर चन्द्रदेवताको , वह चन्द्रलोकके मार्गसे विद्युल्लोकको पहुँचाता है , तत्पश्र्चात् जीव ध्रुवलोकके उस पार पहुँचाता है , तत्पश्र्चात् जीव धु्रवलोकके उस पार पहुँच जाता है । ) ॥११॥

तदन्तर महार्लोकमें सुखपूर्वक वास करता हुआ जीव जब शेषके मुखसे निकली हुई अग्निकी उष्मासे संतप्त होने लगता है , तब वह आपके शरणागत होकर ब्रह्मपद अर्थात सत्यलोकको प्राप्त हो जाता है अथवा ऊष्मसंतापसे पूर्व ही वह स्वेच्छानुसार वहॉं जा सकता है ॥१२॥

इस प्रकार सत्यलोकको प्राप्त हुआ जीव ब्रह्मलोकमें अथवा आपके निवासस्थान विष्णुलोकमें निवास करता हुआ प्राकृतप्रलयके समय मुक्तिको प्राप्त हो जाता है । अथवा स्वेच्छानुसार अपने -अपने योगबलसे ब्रह्माण्ड -कटाहका भेदन करके उसके द्वारा महाप्रलयके पूर्व ही मुक्त हो जाता है ॥१३॥

विभो ! ऊस ब्रह्माण्डके पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु और आकाश ——ये पञ्चतत्त्व तथा महत्तत्व और प्रकृति ——ये सात आवरण हैं । इन आवरणोंमें उन -उन आवरणोंके अनुरूप स्वरूप -ग्रहणद्वारा उनमें प्रवेश करके निरतिशय सुखका अनुभव हुआ जीव आपके अनावृत पद ——ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है ॥१४॥

जगत्पते ! इस प्रकारकी अर्चिरादि गतिको प्राप्त हुए जीवका पुनरावर्तन नहीं होता । अतः सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीगुरुवायुपुरनाथ ! मैं भी आपके उत्कृष्ट गुणोंका कीर्तन कर रहा हूँ , मेरी रक्षा कीजिये ॥१५॥


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Last Updated : 2016-11-11T11:54:46.9600000

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