मनु (आदिपुरुष)

PERSON | Hindi | चारित्र कोष
n.  मनवसृष्टि का प्रवर्तक आदिपुरुष, जो समस्त मानवजाति का पिता माना जाता है [ऋ.१.८०.१६,११४.२, २.३३.१३, ८.६३.१];[ अ. वे.१४.२.४१];[ तै. सं.२.१.५.६] । कई अभ्यासकों के अनुसार मनु वैवस्वत तथा यह दोनों एक ही व्यक्ति थे (मनु वैवस्वत देखिये) । ऋग्वेद में प्रायः बीस बार मनु का निर्देश व्यक्तिवाचक नाम से किया गया है । वहॉं सर्वत इसे ‘आदिपुरुष’ एवं मानव जाति का पिता, तथा यज्ञ एवं तत्संबंधित विषयों का मार्गदर्शक माना गया है । मनु के द्वारा बताये गये मार्ग से ले जाने की प्रार्थना वेदों में प्राप्त है [ऋ.८.३०.१]
मानवजाति का पिता n.  ऋग्वेद में पांच बार इसे पिता एवं दो बार निश्चित रुप से ‘हमारे पिता’ कहा गया है [ऋ.२.३३] । तैत्तिरीय संहिता में मानवजाति को ‘मनु की प्रजा’ (मानव्यःप्रजाः) कहा गया है [तै. सं. १.५.१.३] । वैदिक साहित्य में मनु को विवस्वत् का पुत्र माना गया है, एवं इसे ‘वैवस्वत’ पैतृक नाम दिया गया है [अ.वे.८.१०];[ श.ब्रा.१३.४.३] । यास्क के अनुसार, विवस्वत् का अर्थ सूर्य होता है, इस प्रकार यह आदिपुरुष सूर्य का पुत्र था [नि.१२.१०] । यास्क इसे सामान्य व्यक्ति न मानकर दिव्यक्षेत्र का दिव्य प्राणी मानते है [नि.१२.३४] । वैदिक साहित्य में यम को भी विवस्वत् का पुत्र माना गया है, एवं कई स्थानो पर उसे भी मरणशील मनुष्यों में प्रथम माना गया है । इससे प्रतीत होता है कि, वैदिक काल के प्रारम्भ में मनु एवं यम का अस्तित्व अभिन्न था, किन्तु उत्तरकालीन वैदिक साहित्य में मनु को जीवित मनुष्यों का एवं यम को दूसरे लोक में मृत मनुष्यों का आदिपुरुष माना गया । इसीलिए शतपथ ब्राह्मण में मनु वैवस्वत को मनुष्यों के शासक के रुप में, तथ यम वैवस्वत को मृत पितरों के शासक के रुप मे वर्णन किया गया है [ऋ.८.५२.१];[ श.ब्रा.१३.४.३] । यह मनु सम्भवतः केवल आर्यो के ही पूर्वज के रुप में माना गया है, क्योंकि अनेक स्थलों पर इसका अनार्यो के पूर्वज द्यौः से विभेद किया है ।
यज्ञसंस्था का आरंभकर्ता n.  -मनु ही यज्ञप्रभा का आरंभकर्ता था, इसीसे इसे विश्व का प्रथम यज्ञकर्ता माना जाता है [ऋ.१०.६३.७];[ तै. सं.१.५.१.३,२.५.९.१,६.७.१,३.३.२.१,५.४.१०.५,६.६.६.१,७.५.१५.३] । ऋग्वेद के अनुसार, विश्व में अग्नि प्रज्वलित करने के बाद सात पुरोहितों के साथ इसने ही सर्वप्रथम देवों को हवि समर्पित की थी [ऋ.१०.६३]
यज्ञ से ऐश्वर्यप्राप्ति n.  तैत्तिरीय संहिता में मनु के द्वारा किये गये यज्ञ के उपरांत उसके ऐश्वर्य के प्राप्त होने की कथा प्राप्त है । देव-दैत्यों के बीच चल रहे युद्ध की विभीषिका से अपने धन की सुरक्षा करने के लिए देवों ने उसे अग्नि को दे दिया । बाद को अग्नि के हृदय में लोभ उत्पन्न हुआ, एवं वह देवों के समस्त धनसम्पत्ति को लेकर भागने लगा । देवों ने उसका पीछा किया, एवंउसे कष्ट देकर विवश किया कि, वह उनकी अमानत को वापस करे । देवों द्वारा मिले हुए कष्टों से पीडित होकर अग्नि रुदन करने लगा, इसी से उसे ‘रुद्र’ नाम प्राप्त हुआ । उस समय सुअके नेत्रों से जो आसूँ गिरे उसीसे चॉंदी निर्माण हुयी, इसी लिए चॉंदी दानकर्म में वर्जित है। अन्त में अग्नि ने देखा कि, देव अपनी धनसम्पत्ति को वापस लिए जा रहे हैं, तब उसने उनसे कुछ भाग देने की प्रार्थना की । तब देवों ने अग्नि को ‘पुनराधान’ (यज्ञकर्मों में स्थान) दिया ।आगे चलकर मनु, पूषन्, त्वष्टु एवं धतृ इत्यादि ने यज्ञकर्म कर के ऐश्वर्य प्राप्त किया [तै.सं.१.५.१] । मनु ने भी लोगों के प्रकाशहेतु अग्नि की स्थापना की थी [ऋ.१.३६] । मनु का यज्ञ वर्तमान यज्ञ का ही प्रारंभक है, क्यों कि, इसके बाद जो भी यज्ञ किये गये, उन में इसके द्वारा दिये गये विधानोम को ही आधार मान कर देवों को हवि समर्पित की गयी [ऋ.१.७६.] । इस प्रकार की तुलनाओं को अक्सर क्रियाविशेषण शब्द ‘मनुष्वत्’ (मनुओं की भॉंति) द्वारा व्यक्ति किया गया है। यज्ञकर्ता भी अग्नि को उसी प्रकार यज्ञ का साधन बनाते हैं, जिस प्रकार मनुओं ने बनाया था [ऋ.१.४४] वे मनुओं की ई भॉंति अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, तथा उसीकी भॉंति सोम अर्पित करते हैं [ऋ.७.२.४.३७] । सोम से उसी प्रकार प्रवाहित होने की स्तुति की गयी है, जैसे वह किसी समय मनु के लिए प्रवाहित होता था [ऋ.९.९६]
समकालीन ऋषि n.  मनु का अनेक प्राचीन यज्ञकर्ताओं के साथ उल्लेख मिलता है, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैः---अंगिरस् और ययाति [ऋ.१.३१] । भृगु और अंगिरस [ऋ.८.४३], अथर्वन् और दध्यञ्च [ऋ.१.८०] । दध्यञ्च, अंगिरस्, अत्रि और कण्व [ऋ.१.१३९] । ऐसा कहा गया है कि, कुछ व्यक्तियों ने समय समय पर मनु को अग्नि प्रदान क्र उसे यज्ञ के लिए प्रतिष्ठित किया था, जिसके नाम इस प्रकार है---देव [ऋ.१.३६], मातरिश्वन, [ऋ.१.१२८] । मातरिश्वन् और देव [ऋ.१९.४६] ।, काव्य उश्सना [ऋ.८.२३] । ऋग्वेद के अनुसार, मनु विवस्वत ने इन्द्र के साथ बैठ कर सोमपान किया था [वाल.३] । तैत्तिरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण में मनु का अक्सर धार्मिक संस्कारादि करनेवाले के रुप में भी निर्देश किया गया है ।
मन्वंतरों का निर्माण n.  आदिपुरुष मनु के पश्चात्, पृथ्वी पर मनु नामक अनेक राजा निर्माण हुए, जिन्होने अपने नाम से नये-नये मन्वंतरो का निर्माण किया । ब्रह्मा के एक दिन तथा रात के कल्प कहते हैं । इनमें से ब्रह्मा के एक दिन के चौदह भाग माने गये हैं, जिनमें से हर एक को मन्वन्तर कहते हैं । पुराणों के अनुसार, इनमें से हर एक मन्वन्तर के काल में सृष्टि का नियंत्रण करनेवाला मनु अलग के काल में सृष्टि का नियंत्रण करनेवाला मनु अलग होता है, एवं उसीके नाम से उस मन्वन्तर का नामकारण किया गया है । इस प्रकार् जब तक वह मनु उस सृष्टि का अधिकारी रहता है, तब तक वह काल उसके नाम से विख्यात रहता है ।
चौदह मन्वंतर n.  इस तरह पुराणों में चौदह मन्वन्तर माने गये हैं, जो निम्नलिखित चौदह मनुओं के नाम से सुविख्यात हैः---१. स्वायंभुव,२.स्वारोचिष,३. उत्तम (औत्तम), ४. तामस, ५. रैवत,६. चाक्षुष, ७. वैवस्वत, ८. सावर्णि (अर्कसावर्णि) ९. दक्षसावर्णि, १०. ब्रह्मसावर्णि ११. धर्मसावर्णि १२. रुद्रसावर्णि, १३. रौच्य, १४. भौत्य । इनमें से स्वायंभुव से चाक्षुक्ष तक के मन्वन्तर हो चुके है, एवं वैवरवत मन्वंतर सांप्रत चालू है । बाकी मन्वंतर भविष्यकाल में होनेवाले हैं
पाठभेद n.  चौदह मन्वन्तर के अधिपतियों मनु के नाम विभिन्न पुराणों में प्राप्त है । इनमें से स्वायंभुव से ले कर सावर्णि तक के पहले आठ मनु के नाम के बारे में सभी पुराणों मे प्रायः एकवाक्यता है, किंतु नौ से चौदह तक के मनु के नाभ के बारे में विभिन्न पाठभेद प्राप्त है, जो निम्नलिखित तालिका में दिये गये हैः---
# वायु पद्म मार्क. ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत मत्स्य ब्रह्म विष्णु
9 सावर्ण रौच्य सूर्यसावर्णि दक्षसावर्णि रौच्य रैभ्य दक्षसावर्णि
10 सावर्ण भौत्य ब्रह्मसावर्णि ब्रह्मसावर्णि मेरुसावर्णि रौच्य ब्रह्मसावर्णि
11 सावर्ण मेरुसावर्णि धर्मसावर्णि धर्मसावर्णि ब्रह्मसावर्णि मेरुसावर्णि धर्मसावर्णि
12 सावर्ण ऋभु रुद्रसावर्णि रुद्रसावर्णि ऋतसावर्णि - रुद्रसावर्णि
13 रौच्य ऋतुधामन् रौच्य देवसावर्णि ऋतधामन् - रौच्य
14 भौत्य विष्वक्सेन भौत्य इंद्रसावर्णि ( चंद्रसावर्णि ) विश्वक्सेन भौत्य भौत्य

उपर्युक्त हर एक मन्वन्तर की कालमर्यादा चतुर्युगों की इकत्तर भ्रमण माने गये हैं । चतुर्युगो की कालमर्यादा तेतालीस लाख वीस हजार मानुषी वर्ष माने गये हैं । इस प्रकार हर एक मन्वन्तर की कालमर्यादा तेतालीस लाख वीस हजार इकत्तर होती है । हर एक मन्वन्तर का राजा मनु होता है, एवं उसकी सहायता के लिए सप्तर्षि, देवतागण,इन्द्र, अवतार एवं मनुपुत्र रहते हैं । इनमें सप्तर्षियों का कार्य प्रजा उत्पन्न करना रहता है, एवं इन प्रजाओं का पालन मनु एवं उसके पुत्र भूपाल बन कर करते हैं । इन भूपालों को देवतागण सलाह देने का कार्य करते है, एवं भूपालों को प्राप्त होनेवाली अडचनों का निवारण इन्द्र करता है । जिस समय इन्द्र हतबल होता है, उस समय स्वयं विष्णु अवतार लेकर भृपालोम का कष्ट निवारण करता है । मनु एवं उसके उपर्युक्त सारे सहायकगण विष्णु के अंशरुप माने गये है, तथा मन्वंन्तर के अन्त में वे सारे विष्णु में ही विलीन हो जाते हैं । किसी भी मन्वन्तर के आरम्भ में वे विष्णु के ही अंश से उत्पन्न होते हैं [विष्णु.१.३]
स्वायंभुव मन्वन्तर  n.  
  1. मनु - स्वायंभुव ।
  2. सप्तर्षि---अंगिरस् (भृगु), अत्रि, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, वसिष्ठ ।
  3. देवगण---याम या शुक्र के जित, अजित् व जिताजित् ये तीन भेद था । प्रत्येक गण में बारह देव थे [वायु.३१.३-९] । उन गणों में निम्न देव थे-ऋचीक, गृणान, विभु,विश्वदेव,श्रुति,सोमपायिन्, [ब्रह्मांड. २.१३] । इन देवों में तुषित नामक बारह देवों का एक और गण था [भा.४.१.८]
  4. इन्द्र---विश्वभुज् (भागवतं मतानुसार यज्ञ) । इन्द्राणी ‘दक्षिणा’ थी [भा.८.१.६]
  5. अवतार---यज्ञ तथा कपिल (विष्णु एवं भागवत मतानुसार) ।
  6. पुत्र---अग्निबाहु (अग्निमित्र, अतिबाहु), अग्नीध्र (आग्नीध्र), ज्योतिष्मत्, द्युतिमत्, उत्र (वयुष्मत्, सत्र, सह), मेधस् (मेध,मेध्य), मेधातिथि, वसु (बाहु), सवन (सवल), हव्य (भव्य) । मार्कडेय के अनुसार, इसके पुत्रों में से पहले सात भूपाल थे । भागवत तथा वायु के अनुसार, इसे प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो पुत्र थे । प्रियव्रत के दस पुत्र थे ।

स्वारोचिष मन्वंतर  n.  
  1. मनु --- स्वारोचिष । कई ग्रन्थों में इस मन्वन्तर के मनु का नाम ‘द्युतिमत्’ एवं ‘स्वारोचिस्’ बताया गया है ।
  2. सप्तर्षि---अर्ववीर (उर्वरीवान्, ऊर्ज,और्व), ऋषभ (कश्यप,काश्यप),दत्त (अत्रि), निश्च्यवन (निश्चर,ल),प्राण,बृहस्पति (अग्नि,आलि), स्तम्ब (ऊर्जस्तंब, ऊर्जस्वल) । ब्रह्मांड में स्वारोषित मन्वन्तर के कई ऋषियों के कुलनाम देकर उन्हें सप्तर्षियों का पूर्वज कहा गया है । 
  3. देवगण---तुषित, इडस्पति,इध्म,कवि,तोष,प्रतोष,भद्र,रोचन,विभु,शांति,सुदेव (स्वह्र), पारावत ।
  4. इन्द्र---विपश्चित् । भागवत के अनुसार, यज्ञपुत्र रोचन ।
  5. अवतार---तुषितपुत्र अजित (विभु) ।
  6. पुत्र---अयस्मय अपोमूर्ति (आपमूर्ति), ऊर्ज, किंपुरुष, कृतान्त, चैत्र,ज्योति (रोचिष्मत्,रवि), नभ,(नव,नभस्य),प्रतीत (प्रथित, प्रसृति, बृहदुक्थ), भानु, विभृत,श्रुत,सुकृति (सुषेण), सेतु, हविघ्न (हविघ्न), इसके पुत्रों के ऐसे कुछ नाम मिलते हैं, किन्तु उनमें से कुल नौ या दस की संख्या प्राप्त है । मत्स्य के अनुसार, इस मन्वन्तर में ऋषियों की सहायता के लिए वसिष्ठपुत्र सात प्रजापति बने थे । किन्तु उन सब के नाम मनु पुत्रों के नामों से मिलते हैं, जैसे-आप, ज्योति,मूर्ति,रय, सृकृत,स्मय तथा हस्तीन्द्र ।

उत्तम मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- उत्तम ।
  2. सप्तर्षि---अनघ,ऊर्ध्वबाहु,गात्र, रज, शुक्र (शुक्ल), सवन, सुतपस्। ये सब वसिष्ठपुत्र थे, एवं वासिष्ठ इनका सामान्य नाम था । पूर्वजन्म में ये सभी हिरण्यगर्भ के ऊर्ज नामक पुत्र थे ।
  3. देवगण---प्रतर्दन (भद्र.भानुं,भावन,मानव), वशवर्तिन् (वेदश्रुति), शिव, सत्य, सुधामन् । इन सबके बारह बारह के गण थे ।
  4. इन्द्र---सुशांति (सुकीर्ति,सत्यजित्) ।
  5. अवतार---सत्या का पुत्र सत्य,अथवा धर्म तथा सुनृता का पुत्र सत्यसेन ।
  6. पुत्र---अज,अप्रतिम,(इष,ईष), ऊर्ज,तनूज (तनूर्ज,तर्ज), दिव्य (दिव्यौषधि, देवांबुज), नभ (नय), नभस्य (पवन,परश्रु,परशुचि),,मधु,माधव,शुक्र, शुचि (शुति,सुकेतु) ।

तामस मन्वन्तर n.  
  1. मनु --- तामस ।
  2. सप्तर्षि---अकपि (अकपीवत्), अग्नि,कपि (कपीवत्), काव्य (कवि,चरक), चैत्र (जन्यु,जह्रु, जल्प), ज्योतिर्धर्मन् (ज्योतिर्धामन्, धनद), धातृ (धीमत्, पीवर),पृथु ।
  3. देवगण---वीर,वैधृति,सत्य (सत्यक,साध्य), सुधी, सुरुप,हरि । मार्कण्डेय के अनुसार, इनकी कुल संख्या सत्ताइस है । अन्य ग्रंथों में उल्लेख आता है किम, ये पुत्र एक एक न होकर सत्ताइस सत्ताइस देवों के गण थे ।
  4. इन्द्र---शिखि (त्रिशिख, शिबि) ।
  5. अवतार---हरि, जो हरिमेध तथा हरिणी का पुत्र था । इसे एक स्थान हर्या का पुत्र कहा गया है ।
  6. पुत्र---अकल्मष (अकल्माष), कृतबंधु,कृशाश्व, केतु,क्षांति,खाति (ख्याति)जानुजंघ,तन्वीन्,तपस्य, तपोद्युति (द्युति), तपोधन, तपोभागिन्, तपोमूल, तपोयोगिन्, तपोरति, दृढेषुधि, दान्त, धन्विन्, नर, परंतप, परीक्षित, पृथु,प्रस्थल,प्रियभृत, शयहय,शांत (शांति), शुभ, सनातन, सुतपस् ।
  7. योगवर्धन---कौकुरुण्डि, दाल्भ्य, प्रवहण, शङ्ग, शिव, सस्मित, सित । ये योगवर्धन केवल इसी मन्वंतर में मिलते हैं ।

रैवत मन्वन्तर n.  
  1.  मनु---रैवत ।
  2. सप्तर्षि---ऊर्ध्वबाहु (सोमप), देवबाहु (वेदबाहु), पर्जन्य,महामुनि (मुनि, वसिष्ठ,सत्यनेत्र), यदुध्र, वेदशिरस (वेदश्री, सप्ताश्रु, सुधामन्, सुबाहु,स्वधामन्), हिरण्यरोमन् (हिरण्यलोमन्) ।
  3. देवगण---आभूतरजस् (भूतनय, भूतरजय) । इसके रैभ्य तथा पारिप्लव (वारिप्लव) ये दो भेद हैं । इसके अतिरिक्त अमिताभ, प्रकृति, वैकुंठ, शुभा आदि देवगणों में प्रत्येक में १४ व्यक्ति हैं ।
  4. इन्द्र---विभु ।
  5. अवतार---विष्णु के अनुसार संभूतिपुत्र मानस, तथा भागवत के अनुसार शुभ्र तथा विकुंठा का पुत्र ‘वैकुंठ’।
  6. पुत्र---अव्यय (हव्यप), अरण्य (आरण्य), अरुण, अर्जुन, कवि (कपि), कंबु, कृतिन्, तत्त्वदर्शिन्, धृतिकृत, धृतिमत्, निरामित्र, निरुत्सुक, निर्मोह, प्रकाश (प्रकाशक), बलबंधु, बाल, महावीर्य, युक्त, वित्तवत्, विंध्य, शुचि, शृंग, सत्यक, सत्यवाच, सुयष्टव्य (सुसंभाव्य), हरहन्।

चाक्षुष मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---चाक्षुष ।
  2. सप्तर्षि---अतिनामन्, उत्तम (उन्नत, भृगु), नभ (नाभ, मधु), विरजस् (वीरक), विवस्वत (हविष्मत्), सहिष्णुइ, सुधामन्, सुमेधस् ।
  3. देवगण---आद्य (आप्य), ऋभ, ऋभु, पृथग्भाव (प्रथुक-ग, यूथग), प्रसूत, भव्य (भाव्य,) वारि (वारिमूल), लेख ।
  4. इन्द्र---भवानुभव या मनोजव अथवा मंत्रद्रुम ।
  5. अवतार---विष्णु मतानुसार विकुंठापुत्र वैकुंठ, तथा भागवत मतानुसार वैराज तथा संभूति का पुत्र अजित् ।
  6. पुत्र---अग्निष्टुत, अतिरात्र, अभिमन्यु, ऊरु (रुरु) कृति, तपस्विन्, पुरु(पुरुष,पूरु), शतद्युम्न, सत्यवाच्‍, सुद्युम्न ।

वैवस्वत मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- वैवस्वत ।
  2. सप्तर्षि---अत्रि, कश्यप (काश्यप,वत्सर), गौतम (शरद्वत्), जमदग्नि, भरद्वाज (भारद्वज), वसिष्ठ (वसुमत), विश्वामित्र ।
  3. देवगण---आंगिरस (दस), अश्विनी (दो), आदित्य (बारह), भृगुदेव (दस), मरुत (उन्चास), रुद्र (ग्यारह), वसु (आठ), विश्वेदेव (दस), साध्य (बारह) ।
  4. इन्द्र---ऊर्जास्विन् या पुरंदर या महाबल ।
  5. अवतार---वामन ।
  6. पुत्र---अरिषट (दिष्ट,नाभागारिष्ट, नाभानेदिष्ट, रिष्ट, नेदिष्ट, उद्विष्ट), इक्ष्वाकु इल (सुद्युम्न),करुष, कृशनाभ धृष्ट (धृष्णु), नभ (नभग, नाभाग), नृग, पृशध्र, प्रांशु,वसुमत्, शर्याति ।

सावर्णि मन्वन्तर n.  
  1.  मनु --- सावर्णि ।
  2. सप्तर्षि---अश्वत्थामन्, (द्रोणि), और्व (काश्यप, रुरु, श्रुंग), कृप (शरद्वत, शारद्वत्), गालव (कौशिक), दीप्तिमत्, राम (परशुराम जामदग्न्य), व्यास (शतानंद, पाराशर्य) ।
  3. देवगण---अमिताभ (अमृतप्रभ), मुख्य (सुख,विरज), सुतप (सुतपस्, तप) ।
  4. इन्द्र---बलि (वैरोचन) । बलि वैरोचन की आसक्ति इन्द्रपद पर नहीं रहती है । अतएव कालान्तर में इन्द्रपद छोडकर वह सिद्धगति को प्राप्त करेगा ।
  5. अवतार---देवगुह्य तथा सरस्वती का पुत्र सार्वभौम अवतार होगा, तथा बलि के बाद वह सब व्यवस्था देखेगा ।
  6. पुत्र---अधृष्ट (अधृष्णु), अध्वरीवत् (अवरीयस्, अर्ववीर, उर्वरीयस्, (वीरवत), अपि, अरिष्ट (चरिष्णु,विष्णु), आज्य, ईडय, कृति, (धृति, धृतिमत्), निर्मोह, यवसस्, वसु, वरीयस्, वाच् (वाजवाजिन्, विरज,विरजस्क), वैरिशमन, शुक्र, सत्यवाच्, सुमति ।

दक्षसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- दक्षसावर्णि ।
  2. सप्तर्षि---ज्योतिष्मत्, द्युतिमत, मेधातिथि (मेधामृति, माधातिथि), वसु, सत्य (सुतपास, पौलह), सबल (सवन, वसित, वसिन), हव्यवाहन (हव्य, भव्य) ।
  3. देव---दक्षपुत्र हरित के पुत्र निर्मोह, पार (पर,संभूत), मरिचिगर्भ, सुधर्म, सुधर्मन, सुशर्माण । इनमें से हर एक के साथ बारह व्यक्ति हैं ।
  4. इन्द्र---कार्तिकेय ही आगे चलकर अद्‌भुत नाम से इन्द्र होगा ।
  5. अवतार---आयुष्मत् एवं अंबुधारा का पुत्र ऋषभ अवतार होगा ।
  6. पुत्र---अनीक (ऋ.चीक, अर्चिष्मत्, नाक), खड्‌गहस्त (पंचहस्त, पंचहोत्र, शापहस्त), गय, दीप्तिकेतु (दासकेतु, बर्हकेतु), धृष्टकेतु (धृतिकेतु, भूतकेतु), निराकृति (निरामय), पुथुश्रवस् (पृथश्रवस्), बृहत (बृहद्रथ, बृहद्यश,) भूरिद्युम्न ।

ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- ब्रह्मसावर्णि ।
  2. सप्तर्षि---आपांमूर्ति (आपोमूर्ति), अप्रतिम (अप्रतिमौजस, प्रतिम,प्रामति), अभिमन्यु (नभस, सप्तकेतु), अष्टम (वसिष्ठ, वशिष्ठ, सत्य,सद्य), नभोग (नाभाग),सुकृति (सुकीर्ति), हविष्मति ।
  3. देव---अर्चि सुखामन, सुखासीन, सुधाम, सुधामान, सुवासन, धूम,निरुद्ध, विरुद्ध ।
  4. इन्द्र---शान्ति नामक इन्द्र होगा ।
  5. अवतार---विश्वसृष्टय के गृह में विषूचि के गर्भ से विष्वक्सेन नाम्क अवतार होगा ।
  6. पुत्र---अनमित्र निरामित्र, उत्तमौजस, जयद्रथ, निकुषंश, भूरिद्युम्न, भूरिषेण, भूरिसेन, वीरवत् (वीर्यवत्), वृषभ, बृषसेन,शतानीक, सुक्षेत्र, सुपर्वन, सुवर्चस, हरिषेण।

धर्मसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---धर्मसावर्णि ।
  2. सप्तर्षि---अग्नितेजस्, अनघ (तनय, नग, भग), अरुण (आरुणि, तरुण, वारुणि), उदधिष्णन् (उरुधिष्ण्य, पुष्टि, विष्टि, विष्णु), निश्चर, वपुष्मत्, (ऋ.ष्टि), हविष्मत् ।
  3. देव---तीस कामग (काम-गम, कामज), तीस निर्माणरत (निर्वाणरति, निर्वाणरुचि), तीस मनोजव (विहंगम) ।
  4. इन्द्र---वृष (वृषन्, वैधृत) इन्द्र होगा ।
  5. अवतार---इस मन्वन्तर के अवतार का नाम धर्मसेतु है, जो धर्म (आर्यक) एवं वैधृति के पुत्र के रुम में जन्म लेनेवाला है ।
  6. पुत्र---आदर्श, क्षेमधन्वन् (क्षेमधर्मन्, हेमधन्वन्), गृहेषु (दृढायु), देवानीक, पुरुद्वह (पुरोवह) पौण्ड्रक (पंडक), मत (मनु, मरु), संवर्तक (सर्वग, सर्वत्रग, सर्ववेग, सत्यधर्म), सर्वधर्मन (सुधर्मन्, सुशर्मन्) ।

रुद्रसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---रुद्रसावर्णि ।
  2. सप्तर्षि---तपस्विन, तपोधन, (तपोनिधि, तमोशन, तपोधृति, तपोमति), तपोमूर्ति, तपोरति (तपोरवि), द्युति (अग्निध्रक, कृति), सुतपस्।
  3. देव---रोहित (लोहित), सुकर्मन् (सुवर्ण), सुतार (तार,सुधर्मन्,सुपार), सुमनस्।
  4. इन्द्र---ऋतधामन् नामक इन्द्र होनेवाला है । ५. अवतार---सत्यसहस् तथा सूनृता का पुत्र स्वधामन् अवतार होगा ।६. पुत्र---उपदेव (अहूर), देववत् (देववायू,) देवश्रेष्ठ, मित्रकृत (अमित्रहा, मित्रहा), मित्रदेव (चित्रसेन, मित्रबिंदु, मित्रविंद,) मित्रबाहु, मित्रवत्, विदूरथ, सुवर्चस्।

रौच्य मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---रौच्य ।
  2. सप्तर्षि---अव्यव (पथ्यवत्, हव्याप) तत्वदर्शिन्, द्युतिमत्, निरुत्सुक, निर्मोक, निष्कंप, निष्प्रकंप, सुतपस् ।
  3. देव---सुकर्मन्. सुत्रामन (सुशर्मन), सुधर्मन् । प्रत्येक देवगण तीस देवों का होगा ।
  4. इन्द्र---दिवस्पति (दिवस्वामिन्) ।
  5. अवतार---देवहोत्र तथा बृहती का पुत्र अवतार होगा ।
  6. पुत्र---अनेक क्षत्रबद्ध (क्षत्रविद्ध, क्षत्रविद्धि, क्षत्रवृद्धि), चित्रसेन, तप (नय, नियति), धर्मधृत, (धर्मभृत, सुव्रत), धृत (भव), निर्भय, पृथ (दृध), विचित्र, सुतपस् (सुरस), सुनेत्र ।

भौत्य मन्वन्तर n.  
  1. मनु---भौत्य ।
  2. सप्तर्षि---अग्निबाहु (अतिबाहु), अग्निध्र (आग्नीध्र), अजित, भार्गव (मागध, माधव, श्वाजित), मुत (युक्त), शुक्र, शुचि ।
  3. देव---कनिष्ठ, चाक्षुष, पवित्र, भाजित (भाजिर, भ्राजिर), वाचावृद्ध (धारावृक) । प्रत्येक के साथ पॉंच पॉंच देव होगे ।
  4. इन्द्र---शुचि ही इस समय इन्द्र होगा ।
  5. अवतार---सत्रायण एवं विताना का पुत्र बृहद्भानु अवतार होगा ।
  6. पुत्र---अभिमानिन् (श्रीमानिन्), उग्र (ऊरु, अनुग्रह), कृतिन् (जिष्णु, विष्णु), गभीर (तरंगभीरु), गुरु, तरस्वान् (बुद्ध, बुद्धि,ब्रध्न), तेजस्विन्, (ऊर्जस्विन्, ओजस्विन्), प्रतीर (प्रवीण), शुचि, शुद्ध, सबल, सुबल) ।

n.  इसके उपरांत प्रलय होगा तथा ब्रह्मा विष्णु के नाभिकमल में योगनिद्रित होंगे [ह.वं.१.७];[ मार्क.५०.९७];[ विष्णु.३.१-२];[ ब्रह्मवै.२.५४, ५७-६५];[ स्कंद.७.१.१०.५];[ भवि. ब्राह्म.२];[ मध्य.२];[ मत्स्य.९];[ भा.८.१,५, १३];[ वायु.३१-३३, १००.९-११८];[ ब्रह्मांड.२.३६,३.१];[ ब्रह्म.५];[ सृ.७]

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