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लक्ष्मीच्या आठ अवतारांपैकी एक अवतार म्हणजेच गजलक्ष्नी.

गजलक्ष्नीचे व्रत भाद्रपद महिन्याच्या शुक्ल पक्ष दशमीला करतांत.

घरात सुबत्ता नांदावी आणि आपल्या गाई, म्हशी वगैरे पशुधनाला आरोग्य लाभावे म्हणून गजलक्ष्मी व्रत करतात.

या दिवशी षोडशोपचारे पूजा करतात. उपवास करून, पूजा झाल्यावर उपवास सोडतात, शक्यतो पूजा सायंकाळी करतात.

कांहीजण ब्राह्मण बोलावतात, तेव्हां ब्राह्मणाला भोजन देऊन, दक्षिणा द्यावी.
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गजलक्ष्मी यह लक्ष्मी का चार भुजाधारी स्वरूप है। नाम के मुताबिक ही यह गज यानी हाथी पर आठ कमल की पत्तियों के समान आकार

वाले सिंहासन पर विराजित होती है। इनके दोनों ओर भी हाथी खड़े होते हैं। चार हाथों में कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख

होता हैं। इनकी उपासना "संपत्ति और संतान" देने वाली मानी गई है।

 

 

गज को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। गज की सवारी करने के कारण यह उर्वरता तथा समृद्धि की देवी

भी हैं। गज लक्ष्मी देवी को राजलक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इन्हीं की कृपा से राजाओं को धन वैभव और समृद्घि का

आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

 

कई चित्रों, मूर्तियों आदि में लक्ष्मी के स्वरूप पर जल वर्षा करते दो हाथी (नर, मादा) दिखाई देते हैं। ये हाथी 'दिग्गज' के आठ जोड़ों में से

एक होते हैं, जो कि ब्रह्मांड के आठ कोनों पर स्थित रहकर आकाश को संभाले हुए हैं। ये लक्ष्मी के कृपापात्र हैं। गज अर्थात हाथी को

शक्ति, श्री तथा राजसी वैभव से युक्त प्राणी माना गया है। गज को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। इस तरह

 

 

 

लक्ष्मी को प्रसन्न करने का मंत्र :-

 

"ॐ पहिनी पक्षनेत्री पक्षमना लक्ष्मी दाहिनी वाच्छा,

भूत-प्रेत सर्वशत्रु हारिणी दर्जन मोहिनी रिद्धि सिद्धि कुरु-कुरु-स्वाहा।"

 

इस मंत्र को पढ़कर गुगल, गोरोचन, छाल-छबीला, कपूर काचरी, चंदन चूरा मिलाकर भोजपत्र पर स्वास्तिक बनाएं। अष्टमी या शनिवार

को लाल फल के साथ हल्दी व कुंकू से पूजन करें। यह मंत्र 108 बार पढ़ना है। इस प्रयोग से लक्ष्मी की अपार कृपा प्राप्त होगी। देखते ही

देखते पैसा बारिश की तरह बरसेगा, आपके घर से आर्थिक संकट दूर होंगे। लेकिन मन, उद्देश्य, कर्म और पूजन की शुद्धता तथा पवित्रता

अनिवार्य है। क्रोध, वैमनस्य, ईर्ष्या, जलन, नफरत और बेईमानी जैसे भावों से दूर रहना अति आवश्यक है। मन की सरलता से सारे तंत्र-

मंत्र-यंत्र सिद्ध होते हैं।

 

"न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति:

भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।।"

 

इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल

-सी बाती का गहरा-सा संदेश ‍है कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है। लक्ष्मी सूक्त का

पाठ करें और मां लक्ष्मी से दिव्यता का आशीष प्राप्त करें। जय माँ लक्ष्मी...l

 

 

पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार लक्ष्मी को ‘श्री’ भी कहा गया है। कहते हैं भद्र स्त्री व पुरुषों के आगे श्री लगाने का प्रचलन इसी

शब्द से शुरू हुआ। पर लक्ष्मी सिर्फ धन की देवी नहीं हैं।पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार जहां सत्व यानी आंतरिक शक्ति है, वहीं

लक्ष्मी हैं। जिस पर उनकी कृपा दृष्टि होती है, वही धन्य, कुलीन, बुद्धिमान, शूर और विक्रांत है। ऋग्वेद में तो एक जगह "लक्ष्मी को भूमि

की प्रिय सखी" कहा गया है। फिर आखिर लक्ष्मी धन की देवी कैसे बन गईं? :- लक्ष्मी "लक्ष्य" शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है

"चिन्ह"। लेकिन किस चिन्ह विशेष से लक्ष्मी बनी है, यह अज्ञात है। पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार स्वस्तिक चिन्ह लक्ष्मी का

ही प्रतीक है। लक्ष्मी की पूजा में आज भी स्वस्तिक चिन्ह बनाया जाता है। दिवाली के दिन व्यापारी अपने बही-खाते में स्वस्तिक का

चिन्ह बनाकर "शुभ-लाभ" लिखते हैं और उसकी पूजा करते हैं।

 

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