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मित्रसम्‍प्राप्ति

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ज्वाला II.

  • n. नीलध्वज की स्त्री । नीलध्वज ने अर्जुन को अश्वमेध का अश्व वापस दिया, यह इसे अच्छा न लगा । इसने अर्जुन से युद्ध करने के लिये, नीलध्वज से पर्याप्त अनुरोध किया, किंतु इसकी एक न चली । पश्चात् यह उल्मुक नामक अपने भाई के पास गयी । इसने उसे अर्जुन से युद्ध करने को कहा । उसने भी इसकी बात नही मानी । यह रुष्ट हो कर गंगा के किनारे गयी । गंगा का जल पैर को लगते ही इसने कहा, ‘मुझे जो गंगास्पर्श हुआ है, यह महापाप हुआ है’। यह सुनकर गंगा विस्मित हो, सुमंगला देवी के रुप में प्रकट हुई । गंगा स्पर्श को पापी कहने का कारण गंगा ने इससे पूछा । तव ज्वाला ने कहा, ‘तुम ने अपने सात पुत्रों को जल में डुबो कर मारा है । तदुपरांत तुमने शंतनु से आठवॉं पुत्र मॉंग लिया । उसका अर्जुन ने रणांगण में वध किया । अतः तुम निपुत्रिक एवं पापी हो’। यह सुन कर गंगा ने अर्जुन को शाप दिया, ‘छः माहों में तुम्हारा शिरच्छेद होगा’। अर्जुन को शाप मिला देख, ज्वाला को आनंद हुआ । आगे चल कर, अर्जुन एवं बभ्रुवाहन के युद्ध में, यह बभ्रुवाहन के भाते (तूणीर) में बाणरुप से जा पहुँची, तथा अर्जुन का इसने शिरच्छेद किया [जै.अ.१५] । पश्चात् अर्जुनपत्नी उलुपी ने नागलोक में से अमृत का कर अर्जुन को पुनः जीवित किया (अर्जुन देखिये) । 
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Category : Hindu - Traditions
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