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स्वायंभुव वंश (राजवंश) (स्वा.)

n.  जो स्वायंभुव मनु के द्वारा स्थापित किया गया था ।
n.  $प्राचीन भारतखण्ड के ब्रह्मावर्त नामक प्रदेश में स्थित बर्हिष्मती नगरी का सर्वाधिक प्राचीन राजा स्वायंभुव मनु था, जिसका वंश ‘ स्वायंभुव मनु वंश ’ नाम से सुविख्यात है । इस वंश की उत्तानपाद एवं प्रियव्रत नामक दो शाखाएँ प्रमुख मानी जाती हैं ।
उत्तानपाद वंश (स्वा. उत्तान.) n.  स्वायंभुव मनु के उत्तानपाद नामक ज्येष्ठ पुत्र के द्वारा प्रस्थापित किये गये उत्तानपाद वंश की सविस्तृत जानकारी भागवत में प्राप्त है [भा. ४.८] । वहाँ हविर्धान राजा के पुत्रों तक इस वंश की जानकारी दी गयी है । इस वंश में ध्रुव, पृथु वैन्य आदि सुविख्यात राजा उत्पन्न हुए थे ।
नाभि वंश (नाभि.) n.  स्वायंभुव मनुपुत्र प्रियव्रत राजा के कनिष्ठ पुत्र नाभि का स्वतंत्र वंश विष्णुपुराण में दिया गया है [विष्णु. २.१]
प्रियव्रत वंश - (स्वा. प्रिय.) n.  स्वायंभुव मनु के कनिष्ठ पुत्र प्रियव्रत के द्वारा प्रस्थापित किये गये इस वंश की सविस्तृत जानकारी भागवत में दी गयी है [भा. ५.१];[ विष्णु. २.११] । प्रियव्रत राजा के कुल सात पुत्र थें, जिनमें उसने अपने सप्तद्वीपात्मक पृथ्वी का राज्य विभाजित किया : - १. आग्नीध्र (जंबुद्वीप); २. इध्मजिह्व (प्लक्षद्वीप); ३. यज्ञबाहु (शाल्मलिद्वीप); हिरण्यरेतस् (कुशद्वीप); ५. घृतपृष्ठ (क्रौंचद्वीप); ६. मेधातिथि (शाकद्वीप); ७. वीतिहोत्र (पुष्करद्वीप) । प्रियव्रत राजा के ज्येष्ठपुत्र आग्नीध्र का वंश भी भागवत में दिया गया है, जहाँ उसके पुत्रों के नाम निम्न प्रकार बताये गये है : - १. इलावृत्त; २. रम्यक; ३. हिरण्य; ४. कुरु; ५. भद्राश्व; ६. किंपुरुष; ७. नाभि ।

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