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सत्यव्रत II.

See also :
SATYAVRATA I , SATYAVRATA II , SATYAVRATA III , SATYAVRATA IV , सत्यव्रत , सत्यव्रत III. , सत्यव्रत IV. , सत्यव्रत V.
n.  द्रविड देश का एक राजा, जो भगवान् विष्णु के मत्स्यावतार की कृपा से श्राद्धदेव (वैवस्वत मनु) बन गया [भा. ८.२४.१०];[ मत्स्य. १.२, २९०] । पुराणों में प्राप्त इसकी जीवनकथा वैवस्वत मनु के जीवन चरित्र में वर्णित मत्स्यावतार से संबंधित कथा से काफ़ी मिलती जुलती है । फर्क सिर्फ इतना ही है कि, इन दाक्षिणात्य पुराणों में वैवस्वत मनु का मूल नाम मनु नहीं, बल्कि सत्यव्रत बताया गया है ।
तपस्या n.  अपने राज्य का भार अपने पुत्रों पर सौंप कर, वह मलय पर्वत से उद्भव पानेवाली कृतमाला नदी के तट पर तपस्या करने के लिए गया । आधुनिक मदुरा नगरी, जिस वैणा नदी के तट पर बसी हुई है, वही नदी प्राचीन काल में कृतमाला नाम से सुविख्यात थी [मार्के. ५७];[ विष्णु. २.३] । पश्चात् विष्णु ने इसे पृथ्वी पर स्थित समस्त स्थिरचर प्रदेशों का राजा बनने का आशीर्वाद दिया [मत्स्य. १]
मत्स्यावतार n.  मत्स्य के अनुसार, एक बार नैमित्तिक ब्राह्मप्रलय के समय हयग्रीव नामक राक्षस ने ब्रह्मा से वेद चुरा लिये। उन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए विष्णु ने पुनः एक बार मत्स्यावतार धारण किया । विष्णु का यह मत्स्यावतार सत्यव्रत राजा के करांजलि में एक छोटी सी मछली के रूप में अवतीर्ण हुआ। अवतीर्ण होते ही, थोड़े ही दिन में आनेवाले ब्रह्मप्रलय की सूचना उसने इस राजा को दी [मत्स्य. २.३] । उस समय मत्स्यरूपी श्रीविष्णु ने इससे कहा, ‘प्रलय के समय, एक नौका तुझे लेने आयेगी, जिसमें अपने परिवार के सभी लोगों को तुम बिठाना। उस समय समस्त पृथ्वी पर अंधःकार होगा, फिर भी यह नौका प्रकाश से जगमगाती रहेगी। उसी समय एक प्रचंड मछली के रूप में मैं आऊंगा। उस समय वासुकि सर्प की रस्सी बना कर तुम अपनी नौका मेरे सिंग से बाँधना। ब्रह्मा की रात्रि अर्थात् ‘बा्रह्माप्रलय’ समाप्त होने तक मैं तुम्हें, एवं तुम्हारी नौका को सुरक्षित स्थान पर बाँध कर रखूँगा। प्रलय समाप्त होने पर मैं तुम्हें आत्मज्ञान का उपदेश दूँगा’।
आत्मज्ञान की प्राप्ति n.  ब्राह्मप्रलय समाप्त होने पर मस्त्य ने इसे ज्ञान, योग एवं क्रिया का उपदेश दिया, एवं आत्मज्ञानस्वरूपी मत्स्यपुराण का इसे कथन किया । अन्त में मत्स्य की ही कृपा से यह श्राद्धदेव नामक वैवस्वत मनु बन गया ।
सत्यव्रत-कथा का अन्वयार्थ n.  मत्स्य पुराण के टीकाकार श्रीधर के अनुसार, सत्यव्रत के आयुःकाल में हुआ जलप्रलय पृथ्वी का आद्य प्रलय न हो कर, भगवान विष्णु की माया से उत्पन्न हुआ एक ‘प्रलयाभास’ था, जो सत्यव्रत के मन में वैराग्यभावना उत्पन्न करने के लिए, एवं अपने स्वयं के सामर्थ्य के साक्षात्कार की प्रचीति इसे देने के लिए निर्माण किया गया था । इसी प्रकार का अन्य एक प्रलयाभास विष्णु के द्वारा मार्कंडेय ऋषि को दिखाया गया था ।

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