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सत्यकाम (जावाल)

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सत्यकाम (जावाल) II.
n.  एक सुविख्यात तत्त्वज्ञ, जो जबाला नामक स्त्री का पुत्र था । मन को ही परब्रह्म माननेवाला यह आचार्य याज्ञवल्क्य वाजसनेय ऋषि का समकालीन था [वृ. उ. ४.१.६. काण्व.]
जन्म n.  जबाला नामक दासी से किसी अज्ञात पुरुष से यह उत्पन्न हुआ था । इसके जन्म से संबंधित एक सविस्तृत कथा छांदोग्य उपनिषद में प्राप्त है, जहाँ उच्च कुल में जन्म होने की अपेक्षा श्रद्धा एवं तप अधिक श्रेष्ठ है, यह तत्त्व प्रतिपादित किया गया है । यह अपनी माता से उस पुरुष के द्वारा उत्पन्न हुआ, जिसका नाम उसे ज्ञात न था । लज्जा के कारण, उसने कभी भी उसका नाम न पूछा था । इसके जन्म के पश्चात् थोडे ही दिनों में इसका पिता मृत हो गया, जिस कारण इसे अपने पिता का नाम सदैव अज्ञात ही रहा। आगे चल कर यह गौतम हरिद्रुमत नामक आचार्य के पास शिक्षा पाने के लिए गया । वहाँ गौतम ऋषि के द्वारा इसका गोत्र आदि पूछे जाने पर इसने उसे अपनी सारी हकीकत कह सुनायी, एवं कहा, ‘मेरा जन्म ऐसे पिता से हुआ है, जिसका नाम मुझसे अज्ञात है । मेरी माता का जबाला नाम ही केवल मुझे ज्ञात है’। इसके सत्यभाषण के कारण गौतम ऋषि अत्यधिक प्रसन्न हुए, एवं उसने इसका उपनयन कर इसे ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा दी।
शिक्षा n.  तदुपरान्त यह गौतम ऋषि के आश्रम में ही रह कर अध्ययन करने लगा। इसी कार्य में यह अनेक वर्षों तक अरण्य में रहा। छांदोग्य-उपनिषद में प्राप्त रूपकात्मक निर्देश से प्रतीत होता है कि, यह चारसौं गायें ले कर अरण्य में गया, एवं उनकी संख्या एक सहस्त्र होने के काल तक यह अरण्य में रहा।
ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति n.  इसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार हुई, इसकी सविस्तृत जानकारी छांदोग्य-उपनिषद में प्राप्त है । वायु देवता के अंश से उत्पन्न हुए एक वृषभ ने इसे ब्रह्मज्ञान का चौथा हिस्सा सिखाया । आगे चल कर गौतम ऋषि के आश्रम में स्थित अग्नि ने इसे ब्रह्मज्ञान का अन्या चौथा हिस्या सिखाया ब्रह्मज्ञान के बाकी दो हिस्से इसे हंस का रूप धारण करनेवाले आदित्य ने, एवं मद्गु नामक जलचर प्राणि का रूप धारण करनेवाले प्राण ने प्रदान किये। इस प्रकार संपूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर यह गौतम ऋषि के आश्रम में लौंट आया । तत्पश्चात् इसका मुखावलोकन कर, गौतम ऋषि ने इससे कहा, ‘संपूर्ण ब्रह्मज्ञान तुझे हो चुका है । जो ज्ञान तुझे हुआ है, उससे बढ़ कर अधिक ज्ञान इस संसार में कहीं भी प्राप्त होना असंभव है’ [छां. उ. ४.४-९]
तत्त्वज्ञान n.  आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सुयोग्य गुरु के उपदेश की अत्यधिक आवश्यकता है, ऐसा इसका मत था । परमार्थ की साधना के लिए नैतिक सद्गुणों की अत्यधिक आवश्यकता रहती है । किन्तु इस सदाचरण के कारण परमार्थ ज्ञान ही केवल पूर्वतैयारी मात्र होती है, इस ज्ञान का उपदेश केवल सुयोग्य गुरु ही कर सकता है, ऐसा इसका अभिमत था [छां. उ. ४.१.९] । इसका यह अभिमत समस्त पौपनिषदिक वाङमय मे पुनः पुनः पाया जाता है । अंतिम सत्य की व्याख्या औपनिषदिक साहित्य में अनेक प्रकार से की गयी है । इस अंतिम तत्त्व का साक्षात्कार मानवी इंदियों के द्वारा नहीं, बल्कि मानवी मन से होता है, ऐसे कथन करनेवाले आचार्यों में सत्यकाम जाबाल प्रमुख माना जाता है । इसके इसी अभिमत का विकास आगे चल कर याज्ञवल्क्य वाजसनेय ने किया, जिसने संसार के अंतिम तत्त्व का साक्षात्कार केवल आत्मा के द्वारा हो सकता है, यह तत्त्व प्रस्थापित किया (याज्ञवल्क्य वाजसनेय देखिये) ।
सृष्टि का आद्य अधिष्ठान n.  सृष्टि का मूल कारण सूर्य, चंद्र, विद्युत आदि पंचमहाभूत न हो कर, आँखों से प्रतीत होनेवाले आद्य पुरुष के दर्शन से ही सृष्टि के मूल कारण का ज्ञान हो सकता है, ऐसा इसका अभिमत था । औपनिषदिक तत्त्वज्ञान की उत्क्रान्ति के इतिहास में पंचमहाभूतों को सृष्टि का आधार मानने की शुरू में प्रवृत्ति थी । इस प्रवृत्ति को हटा कर पंचेंद्रियों को सृष्टि का आद्य अधिष्ठान माननेवाले कई आचार्यों की परंपरा आगे चल कर उत्पन्न हुई, जिसमें सत्यकाम जाबाल प्रमुख था । इसी कल्पना का विकास आगे चल कर याज्ञवल्क्य वाजसनेय ने किया, जिसने सृष्टि के आद्य अधिष्ठान के रूप में मानवी आत्मा को दृढ रूप से प्रतिष्ठापित किया ।
सत्यकाम-उपकोसल संवाद n.  सत्यकाम के इसी तत्त्वज्ञान का रूपकात्मक चित्रण करनेवाली एक कथा छांदोग्य उपनिषद में प्राप्त है । इसके उपकोसल नामक शिष्य ने बारह वर्षों तक इसके आश्रम में रह कर अध्ययन किया । आगे चल कर सृष्टि के अंतिम सत्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उपकोसल अरण्य में गया । वहाँ उसके द्वारा उपासित ‘गार्हपत्य’, ‘अन्वाहार्य’ एवं ‘आहवनीय’ नामक तीन अग्नि मनुष्य रूप धारण कर उसके सम्मुख उपस्थित हुए, एवं उन्होनें सृष्टि का अंतिम तत्त्व क्रमशः सूर्य, चंद्र, एवं विद्युत् में रहने का ज्ञान इसे प्रदान किया । आगे चल कर उपकोसल ने अग्नि देवताओं के द्वारा प्राप्त हुए आत्मज्ञान की कहानी इसे कथन की। उस समय उसे प्राप्त हुए ज्ञान की विफलता बताते हुए इसने उसे कहा, ‘अग्नि देवताओं ने जो ज्ञान तुझे बताया है, वह अपूर्ण है । सृष्टि के अंतिम तत्त्व का दर्शन सूर्य, चंद्र एवं विद्युत् में नहीं, बल्कि मनुष्य के आँखों में दिखाई देनेवाले इस संसार की प्रतिबिंब में ही पाया जाता है । तत्त्वज्ञ जिसे अमृत, अभय, एवं तेजःपुंज आत्मा बताते हैं, वह इस प्रतिबिंब में ही स्थित है’। सत्यकाम के इस तत्त्वज्ञान में आधिभौतिक सृष्टि कनिष्ठ मान कर मानवी देहात्मा उससे अधिक श्रेष्ठ बताया गया है । इस प्रकार बाह्य सृष्टि को छोड़ कर मानवी शरीर की ओर तत्त्वज्ञों की विचारधारा इसने केंद्रित की, यही इसके तत्त्वज्ञान की श्रेष्ठता कही जा सकती है ।
अन्य निर्देश n.  शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद आदि ग्रंथों में इसके अभिमतों के उद्धरण अनेक बार पाये जाते हैं। इनमें से शतपथ ब्राह्मण में यज्ञहोम के संबंध में इसका अभिमत पैंग्य ऋषि के साथ उद्धृत किया गया है [श. ब्रा. १३.५.३.१] । राज्याभिषेक के समय पठन किये जानेवाले मंत्र का इसके द्वारा सूचित किया गया एक विभिन्न पाठ ऐतरेय ब्राह्मण में प्राप्त है [ऐ. ब्रा. ८.७] । मैत्रि उपनिषद में भी इसके नाम का निर्देश प्राप्त है [मै. उ. 6.5] । किन्तु अन्य उपनिषद ग्रंथों में निर्दिष्ट सत्यकाम से यह आचार्य अलग प्रतीत होता है ।

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