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बाष्कलि V.

See also बाष्कलि , बाष्कलि II. , बाष्कलि III. , बाष्कलि IV.
n.  एक दैत्य, जिसने तपस्या के बल पर सार त्रैलोक्य जीत कर इन्द्रपद प्राप्त किया । विष्णुधर्म एवं पद्म में इसकी कथा दी गयी है, जो सम्पूर्णतः बलि वैरोचन की वामनावतार की कथा से मिलती जुलती है । इसे ‘त्रिविक्रम’ का अवतार कहा गया है । सम्भव है, यह एवं ‘बलि वैरोचन’ दोनों एक ही हो । इसके द्वारा इंद्रपद प्राप्त कर लेने का बाद, वामनावतारी विष्णु ने ब्राह्मणकुमार के रुप में आ कर, इससे यज्ञ के लिए तीन पग भूमि दान मॉंगी । जैसे ही बाष्कलि ने दानसंकल्प के लिये अर्घ्य दिया, कि वामन ने विशाल रुप धारण कर, एक पग से ब्रह्मांड , द्वितीय से सूर्यमण्डल तथ तृतीय से ध्रुवमण्डल नाप कर, इसके सम्पूर्ण श्वेय का हरण कर लिया । वामन ने जैसे ही ब्रह्मांड पर पैर रक्खा, वैसे ही उसके पगस्पर्श से वह फूट गया, तथा उससे गंगा की धारा फूट चली [विष्णुधर्म.२१.१];[ पद्म. सृ.३०]

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अंजन II.

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पिंड म्हणजे काय? त्याचे प्रकार किती व कोणते?
Category : Hindu - Philosophy
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