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अध्याय ४२

श्रीनरसिंहपुराण - अध्याय ४२

अन्य पुराणोंकी तरह श्रीनरसिंहपुराण भी भगवान् श्रीवेदव्यासरचित ही माना जाता है ।


मार्कण्डेयजी कहते हैं - भगवान् विष्णुकी भक्ति ही जिनका भूषण है, वे दैत्यराजकुमार योगी प्रह्लादजी शीघ्र ही सारथिके साथ गुरुके घर भेजे गये । वहाँ वे कालक्रमसे सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानके साथ कुमारावस्थाको प्राप्त हुए । संसारके अन्य लोग कौमार अवस्थाको पाकर प्रायः नास्तिक विचार और बुरे आचार - व्यवहारके पोषक बन जाते हैं, परंतु उसी उम्रमें प्रह्लादको बाह्य विषयोंसे वैराग्य हुआ और भगवानमें उनकी भक्ति हो गयी - यह अद्भुत बात है । तदनन्तर जब प्रह्लादने गुरुके यहाँ अपनी पढ़ाई समाप्त कर ली, तब एक दिन दैत्यराजने उन्हें अपने पास बुलवाया और ईश्वर - तत्त्वके ज्ञाता प्रह्लादको अपने सामने प्रणाम करके खड़े देख उनसे कहा - ॥१ - ३॥

सुरसूदन ! तुम अज्ञानकी निधिरुपा बाल्यावस्थासे मुक्त हो गये - यह बहुत अच्छा हुआ । इस समय तुम कुहिरेसे निकले हुए सूर्यकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हो । पुत्र ! बचपनमें तुम्हारी ही तरह हमें भी जडबुद्धि सिखानेके लिये ब्राह्मणोंने मोहित कर रखा था; किंतु अवस्था बढ़नेपर जब हम समझदार हुए, तब इस प्रकार अपने कुलके अनुरुप सुन्दर शिक्षा ग्रहण कर सके थे । अतः शत्रुरुपी काँटोंसे युक्त इस राज्य - शासनके भारको, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे धारण कर रखा है, अब तुझ सामर्थ्यवान् पुत्रपर रखकर मैं तुम्हारी राज्य लक्ष्मीको देखते हुए सुखी होना चाहता हूँ । पिता जब - जब अपने पुत्रकी निपुणता देखता है, तब - तब अपनी मानसिक चिन्ता त्यागकर महान् सुखका अनुभव करता है । तुम्हारे गुरुने भी मेरे समक्ष तुम्हारी योग्यताका बड़ा बखान किया है । यह तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । आज मेरे कान तुम्हारी कुछ बातें सुनना चाहते हैं । नेत्रोंके समने शत्रुकी दरिद्रता देखना, कानोंमें पुत्रकी सुन्दर वाणीका पड़ना और अङ्गोंमें युद्धके आघातसे घाव होना - यह सब ऐश्वर्यवान् वीरो अथवा मायावी दैत्योंके लिये महान् उत्सवके समान है ॥४ - ९॥

उस समय दैत्यराजके ये शठतापूर्ण वचन सुनकर योगी प्रह्लादने पिताको प्रणाम करके निर्भीकतापूर्वक कहा - ॥१०॥

' महाराज ! आपका यह कथन सत्य है कि अच्छी बातें सुनना कानोंके लिये महान् उत्सवके समान हैं; किंतु वे बातें भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली हों, तभी ऐसा होता है । उनको छोड़कर दूसरी बातें सुननेका विचार भी नहीं करना चाहिये । जो संसारके दुःखसमुदायरुपी तृणोंको भस्म करने के लिये अग्निके समान हैं, उन भगवानविष्णुका जिसमें गुणगान किया जात हो, वही वचन नीतियुक्त है, वही सूक्ति ( सुन्दर वाक्य ) है, वही सुनने योग्य कथा और श्रवण करने योग्य काव्य है । जिसमें भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले अचिन्त्य परमेश्वरका भक्तिपूर्वक स्तवन किया जाता हो, वही शास्त्र है । तात ! उस अर्थशास्त्रसे क्या लाभ, जिसमें संसार - चक्रमें डालनेवाली ही बातें कही गयी हैं । पिताजी ! उस शास्त्रमें परिश्रम करनेसे क्या सिद्ध होगा, जिससे आत्माका ही हनन होता है; इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको सदा वैष्णव शास्त्रोंका ही श्रवण और सेवन करना चाहिये । अन्यथा सांसारिक कष्टसे छुटकारा नहीं मिलता और न मनुष्य सुखी ही हो पात है ॥११ - १४ १/२॥

जिस प्रकार तपाया हुआ घी जलके छीटे पड़नेसे और अधिक प्रज्वलित हो उठता है, वैसे ही दैत्यराज हिरण्यकशिपु प्रह्लादकी उपर्युक्त बातें सुनकर क्रोधसे जल उठा । जैसे उल्लू सूर्यकी प्रभा नहीं देख सकता, उसी प्रकार वह क्षुद्र असुर जीवके संसार - बन्धनको नष्ट करनेवाली प्रह्लादकी पवित्र वाणी न सह सका । उस क्रोधीने चारों ओर देखकर दैत्य वीरोंसे कहा - ॥१५ - १७॥

' अरे ! इस कुटिलको शस्त्रोंके भयंकर आघातसे मार डालो, इसके मर्मस्थानोंके टुकड़े - टुकड़े कर दो; आज इसका भगवान् स्वयं आकर इसकी रक्षा करे । विष्णुकी स्तुति करनेका फल यह आज इसी समय अपनी आँखोंसे देखे । इसका अङ्ग - अङ्ग काटकर कौओं, काँकों और गिद्धोंको बाँट दो ' ॥१८ - १९॥

तब अपने स्वामी हिरण्यकशिपुद्वारा प्रेरित दैत्यगण अपनी विकट गर्जनासे डराते हुए, हाथमें शस्त्र लेकर भगवानके प्रिय भक्त उन प्रह्लादजीको मारने लगे । प्रह्लादने भी भगवानको नमस्कार करके ध्यानरुपी वज्र ग्रहण किया । तब भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु स्वभावतः प्रेम करनेवाले भक्त प्रह्लादके शरीरमें स्पर्श किये बिना ही नील - कमलके टुकडोंकी भाँति खण्ड - खण्ड होकर गिर जाने लगे । भला, ये प्राकृत शस्त्र भगवानके प्रिय भक्तका क्या कर सकते हैं । उससे तो सम्पूर्ण त्रितापरुपी महान् अस्त्रसमूह भी भय मानता है । व्याधि, राक्षस और ग्रह - ये तभीतक मनुष्योंको पीडा पहुँचाते हैं, जबतक उनका चित्त हदय - गुहामें सूक्ष्मरुपसे स्थित भगवान् विष्णुको नहीं प्राप्त कर लेता । भक्तके अपमानका मानो तत्काल फल देनेवाले वे भग्न अस्त्रखण्ड उलटे चलकर दैत्योंका संहार करने लगे । इनसे पीड़ित होनेके कारण वे दैत्य इधर - उधर भाग गये । विद्वानोंकी दृष्टिमें ऐसा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, अज्ञानीजनोंको ही इस घटनासे विस्मय हो सकता है ॥२० - २६॥

वैष्णवोंका बल देखकर राजा हिरण्यकशिपुको अवश्य ही महान् भय हुआ; कितु उस दुर्बुद्धिने पुनः प्रह्लादके वधका उपाय सोचते हुए, अत्यन्त भयंकर विषवाले सर्पोंको बुलाकर उन्हें आदेश दिया - ' गरलायुधो ! विष्णुको संतुष्ट करनेवाला यह निश्शङ्क बालक किसी शस्त्रसे नहीं मारा जा सकता; अतः तुम सभी मिलकर इसे अति शीघ्र मार डालो ।' हिरण्यकशिपुकी यह बात सुनकर उसकी आज्ञा माननेवाले सभी सर्पोंने उसके आदेशको हर्षपूर्वक शिरोधार्य किया ॥२७ - २९॥

तदनन्तर जिनके दाँत विषसे जल रहे हैं तथा जिनकी दाढ़ें विकराल हैं, जो स्फुट दिखायी देनेवाले हजारों चमकीले दाँतोंके कारण भयानक जान पड़ते हैं, ऐसे सर्पगण क्रोधसे फुफकारते हुए बड़े वेगसे उस हरिभक्तके ऊपर टूट पड़े । भगवानके स्मरणके बलसे जिनका आकार दुर्भेद्य हो गया था, उन प्रह्लादजीके शरीरका थोड़ा - सा चमड़ा भी काटनेमें वे विषधर सर्प समर्थ न हो सके । इतना ही नहीं, जिनका शरीर भगवन्मय हो गया था, उन प्रह्लादजीको केवल डँसनेमात्रसे वे सर्प अपने सारे दाँत खो बैठे । तदनन्तर रक्तकी धारा बहनेसे जिनका आकार विषादग्रस्त हो रहा है, जिनके अद्भुत दाँतोंके दो - दो टुकड़े हो गये हैं तथा बार - बार उच्छवास लेनेके कारण जिनके फन चञ्चल हो रहे हैं, उन भुजंगमोंने परस्पर मिलकर दैत्यराज हिरण्यकशिपुको सूचित किया - ॥३० - ३२॥

' प्रभो ! हम पर्वतोंको भी भस्म करनेमें समर्थ हैं, यदि उनमें हमारी शक्ति न चले तो आप तत्काल हमारा वध कर सकते हैं । परंतु आपके महानुभाव पुत्रका वध करनेमें लगाये जाकर तो हम अपने दाँतोंसे भी हाथ धो बैठे ।' इस प्रकार बड़ी कठिनाईसे निवेदन करके स्वामी हिरण्यकशिपुके आदेश देनेपर भी अपने कार्यमें असफल हुए वे सर्प अत्यन्त आश्चर्यके साथ प्रह्लादके अद्भुत सामर्थ्यका क्या कारण है, इसका विचार करते हुए चले गये ॥३३ - ३४॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - इसके बाद असुरराज हिरण्यकशिपुने मन्त्रियोंके साथ विचारकर अपने पुत्रको दण्डसे अजेय मानकर उसे शान्तिपूर्वक अपने पास बुलाया और जब वह आकर प्रणाम करके खड़ा हो गया, तब उस निर्मल एवं पवित्र हदयवाले अपने पुत्रसे कहा - ' प्रह्लाद ! अपने शरीरसे यदि दुष्ट पुत्र भी उत्पन्न हो जाय तो वह वधके योग्य नहीं है, यह सोचकर अब तुझपर मुझे दया आ गयी हैं ' ॥३५॥

तत्पश्चात् तुरंत ही वहाँ दैत्यराजके पुरोहित आये । शास्त्रविशारद होनेपर भी वे मूढ ही रह गये थे । उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर कहा - ' देव ! तुम्हारी युद्धविषयक इच्छा होते ही सारा त्रिभुवन थरथर काँपने लगता है । यह अल्प बलवाला प्रह्लाद कुपित हुए आप महान् बलशालीको नहीं जानता । अतः देव ! आपको क्रोधका परित्याग करके इसपर दया करनी चाहिये; क्योंकि पुत्र भले ही कुपुत्र हो जाय, परंतु माता - पिता कभी कुमाता अथवा कुपिता नहीं होते ' ॥३६ - ३८॥

दैत्यराजके पुरोहितोंने उस दुर्बुद्धि दैत्य हिरण्यकशिपुसे यों कहकर उसकी आज्ञासे प्रह्लादको साथ लेकर अपने भवनको चले गये ॥३९॥

इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें ' नरसिंहावतारविषयक ' बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥४२॥

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Last Updated : September 22, 2009

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