रुक्माङ्गद

भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।


प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीकव्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान् ।

रुक्माङ्गदार्जुनवशिष्ठविभीषणादीन् पुण्यानिमान् परमभागवतान् नमामि ॥

इक्ष्वाकुवंशमें अयोध्यानरेश ऋतध्वजके पुत्र महाराज रुक्माङ्गद हुए । ये धर्मात्मा तथा भगवान् नारायणके प्रिय भक्त थे । इनकी पत्नी सन्ध्यावलीसे एक सुशील पितृभक्त पुत्र हुआ । उसका नाम था - धर्माङ्गद । महाराज रुक्माङ्गदकी निष्ठा एकादशी - व्रतमें थी । एकादशीव्रत श्रीहरिको अत्यन्त प्रिय है । जो दशमीको दोपहरमें एक ही समय भोजन करके रात्रिको ब्रह्मचर्यपूर्वक भूमि या तख्तेपर सोता है, एकादशीको प्रातः व्रतका सङ्कल्प करके निर्जल व्रत करता है और यथासम्भव समस्त उपचारोंसे श्रद्धापूर्वक भगवानका पूजन करता है, रात्रिमें जागरण करते हुए भगवानके नाम एवं गुणोंका कीर्तन करता है और दूसरे दिन भगवानका पूजन करके ब्राह्मणोंको भोजन कराके व्रतका पारण करता है, उसपर सर्वेश्वर विष्णुभगवान् शीघ्र प्रसन्न होते हैं । एकादशी - व्रतके दिन् इन्द्रियोंको संयत करके दिन - रात केवल भगवानके पूजन, अर्चन, कीर्तन तथा भगवानकी कथा सुननेमें ही लगाना चाहिये । उस दिन काम - क्रोध - लोभादिका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये । असत्य तथा कटुवाणी भूलकर भी नहीं बोलनी चाहिये और न किसीकी निन्दा ही करनी चाहिये । धर्मसे द्वेष करनेवाले, नास्तिक, शास्त्रनिन्दक, भगवानमें विश्वास न करनेवाले लोगोंसे उस दिन बात भी नहीं करनी चाहिये । महाराज रुक्माङ्गद बड़ी सावधानीसे इन नियमोंका पालन करते थे । राजाकी धर्मपरायणताके कारण उनकी समस्त प्रजा धार्मिक थी । प्रजाके भी सब लोग एकादशीका व्रत पूरी विधिसे करते थे ।

जो नियमपूर्वक विधिसहित एकादशी - व्रत करता हैं, उसके घरमें यमराजके दूत प्रवेश ही नहीं कर सकते महाराज रुक्माङ्गदके राज्यमें यमदूतोंका प्रवेश नहीं था । परंतु सृष्टि तो जन्म - मरणरुप है । यमराजजीने सृष्टिकर्तामें कहा कि अयोध्याके राज्यभरमें लोग अमर बने रहेगे तो मर्त्यलोककी मर्यादा नष्ट हो जायगी । ब्रह्माजीने एक परम सुन्दर मोहिनी स्त्री बनाकर उसे पृथ्वीपर भेजा । उस स्त्रीको देखकर महाराज मुग्ध हो गये । उसने भी इस शर्तपर राजाको पति बनाना स्वीकार किया कि वह जो कहेगी, उसे ली । एकादशी आनेपर मोहिनीने कहा कि ' राजा व्रत न करे ।' महाराज तो सुनते ही सन्न रह गये । उन्होंने कहा - ' रानी ! तुम कहो तो मैं अपने प्राण भी दे सकता हूँ; किंतु भगवान् नारायणका एकादशी - व्रत मैं नहीं छोड़ सकता । इसके बदले तुम और कुछ माँग लो ।'

मोहिनीने कहा - ' आप एकादशी - व्रत नहीं छोड़ना चाहते तो अपने हाथसे कुमार धर्माङ्गदका मस्तक काटकर मुझे दे दें ।'

महाराज कैसे अपने एकमात्र पुत्रका मस्तक काटे ? इसपर राजकुमारने कहा - ' पिताजी ! आप सङ्कोच न करें । शरीर अमर तो है नही; कल नष्ट हो या आज, यह नष्ट तो होकर रहेगा; फिर इस देहसे धर्मकी रक्षा हो, पिताके व्रत तथा सत्यकी रक्षामें यह देह लगे - इससे बड़ा सौभाग्य कहाँ मिलना है । आप अपने सत्यकी रक्षा करें ।'

राजकुमारकी माता परम सती रानी सन्ध्यावलीने भी पुत्रकी बातका समर्थन किया । अन्तमें महाराज खङ्ग लेकर पुत्रका मस्तक काटनेको उद्यत हुए । जैसे ही राजाने तलवार उठायी, अनन्त करुणाधाम श्रीहरिने प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया । भगवानकी कृपासे विमान आया और उसमें बैठकर सपरिवार महाराज भगवद्धाम पधारे ।

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Last Updated : April 28, 2009

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