श्रीविष्णुपुराण - चतुर्थ अंश - अध्याय १

भारतीय जीवन-धारा में पुराणों का महत्वपूर्ण स्थान है, पुराण भक्ति ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है, वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।


श्रीमैत्रेयजी बोले -

हे भगवान् ! सत्कर्ममें प्रवृत्त रहनेवाले पुरुषींको जो करने चाहिये उन सम्पूर्ण नित्यनैमित्तिक कर्मोका आपने वर्णन कर दिया ॥१॥

हे गुरो ! आपने वर्ण- धर्म और आश्रम - धर्मोकी व्याख्या भी कर दी । अब मुझे राजवंशोंका विवरण सुननेकी इच्छा है, अतः उनका अर्णन कीजिये ॥२॥

श्रीपराशरजी बोले - हे मैत्रेय ! अब तुम अनेकों यज्ञकर्ता, शूरवीर और धैर्यशाली भूपालोंसे सुशोभित इस मनुवंशका वर्णन सुनो जिसके आदिपुरुष श्रीब्रह्माजी हैं ॥३॥

हे मैत्रेय ! अपने वंशके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेके लिये इस वंश - परम्पराकी कथाका क्रमशः श्रवण करो ॥४॥

उसका विवरण इस प्रकार है - सफल संसारके आदिकारण भगवान् विष्णु हैं । वे अनादि तथा ऋकसाम-यजुःस्वरूप हैं । उन ब्रह्मास्वरूप भगवान् विष्णुके मूर्त्तरूप ब्रह्माण्डमय हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए ॥५॥

ब्रह्माजीके दायें अँगूठेसे दक्षप्रजापति हुए, दक्षसे आदिति हुई तथा अदितिसे विवस्वान और विवस्वानसे मनुका जन्म हुआ ॥६॥

मनुके इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्टन्त, प्रांशु, नाभाग, दिष्ट, करुष और पृषध्र नामक दस पुत्र हुए ॥७॥

मनुने पुत्रकी इच्छासे मित्रावरूण नामक दो देवताओंके यज्ञका अनुष्ठान किया ॥८॥

किन्तु होताके विपरित संकल्पसे यज्ञमें विपर्यय हो जानेसे उनके 'इला' नामकी कन्या हुई ॥९॥

हे मैत्रेय ! मित्रावरूणकी कृपासे वह इला ही मनुका 'सुद्युम्र' नामक पुत्र हुई ॥१०॥

फिर महादेवजीके कोप ( कोपप्रयुक्त शाप ) से वह स्त्री होकर चंन्द्रमाके पुत्र बुधके आश्रमके निकट घूमने लगी ॥११॥

बुधने अनुरक्त होकर उस स्त्रीसे पुरूरवा नामक पुत्र उप्तन किया ॥१२॥

पुरूरवाके जन्मके अनन्तर भी परमर्षिगणने सुद्युम्रको पुरुषत्वलाभकी आकांक्षासे क्रतुमय ऋग्यजुःसामाथर्वमय, सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमार्थतः अकित्र्चिन्मय भगवान् यज्ञपुरुषका यथावत् यजन किया । तब उनकी कॄपासे इला फिर भी सुद्युम्र हो गयी ॥१३॥

उस ( सुद्युम्र ) के भी उत्कल, गय और विनत नामक तीन पुत्र हुए ॥१४॥

पहले स्त्री होनेके कारण सुद्युम्रको राज्याधिकार प्रात्प नहीं हुआ ॥१५॥

वसिष्ठजीके कहनेसे उनके पिताने उन्हें प्रतिष्ठान नामक नगर दे दिया था, वही उन्होंने पुरूरवाको दिया ॥१६॥

पुरूरवाकी सन्तान सम्पूर्ण दिशाओंमें फैले हुए क्षत्रियगण हुए । मनुका पूषध्र नामक पुत्र गुरुकी गौफा वध करनेके कारण शूद्र हो गया ॥१७॥

मनुका पुत्र करूष था । करूषसे कारुष नमाक महाबली और पराक्रमी क्षत्रियगण उप्तन्न हुए ॥१८॥

दिष्टका पुत्र नाभाग वैश्य हो गया थाः उससे बलन्धन नामक पुत्र हुआ ॥१९॥

बलन्धनसे महान् कीर्तिमान् वत्सप्रीति, वत्सप्रीतिसे प्रांशु और प्रांशुसे प्रजापति नामक इकलौता पुत्र हुआ ॥२०-२२॥

प्रजापतिसे खनिज, खनित्रसे चाक्षुष तथा चाक्षुषसे अति बल- पराक्रम-सम्पन्न विंश हुआ ॥२३-२५॥

विंशसे विविंशक, विविंशकसे खनिनेत्र, खनिनेत्रसे अतिविभूति और अतिविभूतिसे हुआ ॥२६-२९॥

करन्धमसे अविक्षित हुआ और अविक्षित्‌के मरूत नामक अति बल - पराक्रमयुक्त पुत्र हुआ, जिसके विषयमें आजकल भी ये दो श्‍लोक गाये जाते हैं ॥३०-३१॥

'मरुत्तका जैसा यज्ञ हुआ था वैसा इस पृथिवीपर और किसका हुआ है । जिसकी सभी याज्ञिक वस्तुएँ सुवर्णमय और अति सुन्दर थीं ॥३२॥

उस यज्ञमें इन्द्र सोमरससे और ब्राह्मणगण दक्षिणासे परितृप्त हो गये थे, तथा उसमें मरुद्रण परोसनेवाले और देवगण सदस्य थे' ॥३३॥

उस चक्रवर्तीं मरुत्तके नरिष्यन्त नामक पुत्र हुआ तथा नरिष्यन्तके दम और दमके राजवर्द्धन नामक पुत्र उप्तन्न हुआ ॥३४-३६॥

राजवर्द्धनसे सुवृद्धि, सुवृद्धिसे केवल और केवलसे सुधृतिका जन्म हुआ ॥३७-३९॥

सुधृतिसे नर, नरसे चन्द्र और चन्द्रसे केवल हुआ ॥४०-४२॥

केवलसे बन्धुमान, बन्धुमानुसे वेगवान्. वेगवान्‌से बुध, बुधसे तृणबिन्दु तथा तृणबिन्दुसे पहले तो इलविला नामकी एक कन्या हुई थी, किन्तु पीछे अलम्बुसा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा उसपर अनुरक्त हो गयी । उससे तृणबिन्दके विशाला नामक पुत्र हुआ, जिसने विशाला नामकी पुरी बसायी ॥४३-४९॥

विशालका पुत्र हेमचन्द्र हुआ, हेमचन्द्रका चन्द्र, चन्द्रका धूम्राक्ष, धूम्राक्षका सृत्र्जय, सृत्र्जयका सहदेव और सहदेवका पुत्र कृशाश्व हुआ ॥५०-५५॥

कृशाश्वके सोमदत्त नामक पुत्र हुआ, जिसने सौ अश्वमेध - यज्ञ किये थे । उससे जनमेजय हुआ और जनमेजयसे सुमतिका जन्म हुआ । ये सब विशालवंशीय राजा हुए । इनके विषयमें यह श्‍लोक प्रसिद्ध है ॥५६-६०॥

'तृणबिन्दुके प्रसादसे विशालवंशीय समस्त राजालोग दीर्घायु, महात्मा वीर्यवान् और अति धर्मपरायण हुए ॥६१॥

मनुपुत्र शर्यतिके सुकन्या नामवाली एक कन्य हुई, जिसका विवाह च्यवन ऋषिके साथ हुआ ॥६२॥

शर्यातिके आनर्त नामक एक परम धार्मिक पुत्र हुआ । आनर्त्तके रेवत नामका पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामकी परींमें रहकर आनत्तदेशका राज्यभोग किया ॥६३-६४॥

रेवतका भी रैवत ककुद्मी नामक एक अति धर्मात्मा पुत्र था, जो अपने सौ भाइयोंमें सबसे बड़ा था ॥६५॥

उसके रेवती नामकी एक कन्या हुई ॥६६॥

महाराज रैवत उसे अपने साथ लेकर ब्रह्माजीसे यह पूछनेके लिये कि ' यह कन्या किस वरके योग्य है' ब्रह्मलोकको गये ॥६७॥

उस समय ब्रह्माजीके समीप हाहा और हूहू नामक दो गन्धर्व अतितान नामक दिव्य गान गा रहे थे ॥६८॥

वहाँ ( गान - सम्बन्धी चित्रा, दक्षिणा और धात्री नामक ) त्रिमार्गके परिवर्तके साथ उनका विलक्षण गान सुनते हुए अनेकों युगोंके परिवर्तन - कालतक ठहरनेपर भी रैवतजीको केवल एक मुहूर्त ही बीता-सा मालूम हुआ ॥६९॥

गान समाप्त हो जानेपर रैवतने भगवान् कमलयोनिको प्रणाम कर उनसे अपनी कन्याके योग्य वर पूछा ॥७०॥

भगवान् ब्रह्माने कहा - " तुम्हें जो वर अभिमत हों उन्हें बताओ" ॥७१॥

तब उन्होंने भगवान ब्रह्माजीको पुनः प्रमाण कर अपने समस्त अभिमत वरोंका वर्णन किया और पूछा कि ' इनमेंसे आपको कौन वर पसन्द है जिसे मैं यह कन्या दूँ ?' ॥७२॥

इसपर भगवान् कमलयोनि कुछ सिर झुकाकर मुसकाते हुए बोले - ॥७३॥

" तुमको जो-जो वर अभिमत हैं उनमेंसे तो अब पृथिवीपर किसीके पुत्रपौत्रादिकी सन्तान भी नहीं है ॥७४॥

क्योंकी यहाँ गन्धर्वोंका गान सुनते हुए तुम्हें कई चतुर्युग बीत चुके है ॥७५॥

इस समय पृथिवीतलपर अट्ठाईसवें मनुका चतुर्युग प्रायः समाप्त हो चुका है ॥७६॥

तथा कलियुगका प्रारम्भ होनेवाला है ॥७७॥

अब तुम ( अपने समान ) अकेले ही रह गये हो, अतः यह कन्या-रत्न किसी और योग्य वरको दो । इतने समयमें तुम्हारे पुत्र, मित्र, कलत्र , मत्निवर्ग, भृत्यगण, बन्धुगण, सेना और कोशादिका भी सर्वथा अभाव हो चुका है" ॥७८-७९॥

तब तो राजा रैवतने अत्यन्त भयभीत हो भगवान् ब्रह्माजीको पुनः प्रणाम कर पूछा ॥८०॥

'भगवान् ! ऐसी बात है, तो अब मैं इसे किसको दूँ ? ' ॥८१॥

तब सर्वलोकगुरु भगवान् कमलयोनि कुछ सिर झुकाए हाथ जोड़कर बोले ॥८२॥

श्रीब्रह्माजीने कहा -

जिस अजन्मा, सर्वमय, विधाता परमेश्वरका आदि, मध्य, अन्त, स्वरूप, स्वभाव और सार हम नहीं जान पाते ॥८३॥

कलामुहूर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभुतिके परिणामका कारण नहीं हो सकता, जिसका जन्म और मरण नहीं होता, जो सनातन और सर्वदा एकरूप है तथा जो नाम और रूपसे रहित है ॥८४॥

जिस अच्युतकी कृपासे मैं प्रजाका उप्तत्तिकर्त्ता हूँ, जिसके क्रोधसे उप्तन्न हुआ रुद्र सृष्टिका अन्तकर्त्ता है तथा जिस परमात्मासे मध्यमें जगत्स्थितिकारी विष्णुरूप पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ है ॥८५॥

जो अजन्मा मेरा रुप धारणकर संसारकी रचना करता है, स्थितिके समय जो पुरुषरूप है तथा जो रुद्ररूपसे सम्पूर्ण विश्वका ग्रास कर जाता है एवं अनन्तरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करता है ॥८६॥

जो अव्ययात्मा पाकके लिये अग्निरूपा हो जाता है, पृथिवीरूपसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करता है, इन्द्रादिरूपसे विश्वका पालन करता है और सूर्य तथा चन्द्ररूप होकर सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है ॥८७॥

जो श्वास - प्रश्वासरूपासे जीवोंमें चेष्टा करता है, जल और अन्नरूपसे लोककी तृप्ति करता है तथा विश्वकी स्थितिमें संगग्न रहकर जो आकाशरूपसे सबको अवकाश देता है ॥८८॥

जो सृष्टिकर्ता होकर भी विश्वरूपसे आप ही अपनी रचना करता है, जगत्‌का पालन करनेवाला होकर भी स्वयं ही संहत होता है और जो इन तीनोंसे पृथक इनका अविनाशी आत्मा है ॥८९॥

जिसमें यह जगत् स्थित है, जो आदिपुरुष जगत् - स्वरूप है और इस जगत्‌के ही आश्रित तथा स्वयम्भू है, हे नॄपते ! सम्पूर्ण भूतोंका उद्धवस्थान वह विष्णु धरातलमें अपने अंशसे अवतीर्ण हुआ है ॥९०॥

हे राजन् ! पूर्वकालमें तुम्हारी जो अमरावतीके समान कुशस्थली नामकी पुरी थी वह अब द्वारकापुरी हो गयी है । वहीं वे बलदेव भगवान् विष्णुके अंश विराजमान् हैं ॥९१॥

हे नरेन्द्र ! तुम यह कन्या उन मायामानव श्रीबलदेवजीको पत्नीरुपसे दो । ये बलदेवजी संसारमें अति प्रशंसनीय हैं और तुम्हारी कन्या भी स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा है, अतः इनका योग सर्वथा उपयुक्त है ॥९२॥

श्रीपराशरजी बोले -

भगवान् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर प्रजापति रैवत पृथिवीतलपर आये तो देखा कि सभी मनुष्य छोटे-छोटे, कुरुप, अल्पतेजोमय, अल्पवीर्य तथा विवेकहीन हो गये हैं ॥९३॥

अतुलबुद्धि महाराज रैवतने अपनी कुशस्थली नामकी पुरी और ही प्रकारकी देखी तथा स्फटिक - पर्वतके समान जिनका वक्षःस्थल है उन भगवान् हलायुधको अपनी कन्या दे दी ॥९४॥

भगवान् बलदेवाजीने उसे बहुत ऊँची देखकर अपने हलके अग्रभागसे दबाकर नीची कर ली । तब रेवती भी तत्कालीन अन्य स्त्रियोंके समान ( छोटे शरीरकी ) हो गयी ॥९५॥

तदनन्तर बलरामजीने महराअज रैवतकी कन्या रेवतीसे विधिपूर्वक विवाह किया तथा राजा भी कन्यादान करनेके अनन्तर एकाग्रचितसे तपस्या करनेके लिये हिमालयपर चले गये ॥९६॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थऽशे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

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Last Updated : April 26, 2009

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